युवा सेवा संघ
गणित और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में विश्व को प्राचीन भारत की देनें

हज़ारों वर्ष पहले हमारे ऋषि-मुनि विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान के खोज में रत थे | उनका मस्तिष्क सर्जनात्मक और बहुआयामी था| ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में संसार को उनकी कई महत्वपूर्ण देनें हैं, जिसके लिए पूरा विश्व समाज आज भी उनका ऋणी है |

गणित :
विज्ञान की उन्नति विशेष रूप से गणित पर निर्भर है | अब यह निर्विवाद सिद्ध हो गया है कि संसार की संख्याएं लिखने की आधुनिक प्रणाली भारत ने दी | सौ (१००) के ऊपर की गणना भारतीय मस्तिष्क की ही देन है |  यजुर्वेद संहिता (अध्याय १७ मन्त्र २) में तो १० खरब (एक पर १२ शून्य) तक की संख्या का उल्लेख है जबकि यूनानी लोग दस हज़ार तक तथा रोमन लोग एक हज़ार तक की संख्या ही जानते थे | आर्यभट्ट,महावीर, श्रीधर, श्रीपति, भास्कराचार्या आदि गणितज्ञों ने वर्गमूल निकालने की रीतियाँ बतलाय़ीं हैं | आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक "आर्यभटीय" में जो रीति ४९९ई० में दी थी, वह यूरोप में १५वीं शताब्दी में पहुँच पाई | भारतीय मनीषियों को जोड़, घटाना, गुणा, भाग, वर्ग, घन और वर्गमूल आदि अष्टांग पद्धतियाँ ज्ञात थीं |घनमूल निकालने की रीति भी भारतीयों ने संसार को बतलाय़ी | "आर्यभटीय" में इसका उल्लेख है | इस रीति की खोज उससे भी पहले किसी भारतीय मनीषी ने की थी | वर्गमूल और घनमूल की ये दोनो रीतियाँ आठवीं शताब्दी के मध्य में भारतवर्ष से अरबों के पास पहुँची और उनके द्वारा अन्य देशों में गयी | अब्दुल-अल मसूदी एक अरबी विद्वान (९४३ ई.) ने भी यह माना है कि अंकलिपि का अविष्कार भारतीयों ने किया है |

लेखनकला :
भारतवर्ष में लेखन कला चिरकाल से विद्यमान थी | वेदों मे कई स्थानों पर अक्षर, कांड, ग्रंथ शब्दों का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि लेखनकला चिरकाल से भारतवर्ष में थी | ऋग्वेद में भी एक स्थान पर यह मिलता है कि ‘मुझे सहस्र गायें दो ,जिनके कान में ८(आठ) लिखा है |’ पाणिनीय व्याकरण (आज से लगभग २७०० वर्ष पूर्व) में लिपिकारों का ज़िक्र है | वशिष्ठ धर्मसूत्र में लिखित पत्रों को ‘क़ानूनी गवाह’ माना गया है | सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी संख्याएं मिलती हैं | अंकगणित के क्षेत्र में संसार को भारतीयों की जो मुख्य देन है वह है ‘शून्य’ (०) तथा शतोत्तर गणना अर्थात संख्याओं को लिखने की आधुनिक प्रणाली |

बीजगणित :
भारतीयों ने बीजगणित में भी बड़ी दक्षता प्राप्त की थी | हरमन हेकल (एक पश्चिमी गणितज्ञ) तो भारतीय मनीषियों को ही  बीजगणित का आदि रचयिता मानता है | बड़े गणितज्ञों में आर्यभट्ट,ब्रह्मगुप्त, श्रीधराचार्या, भास्कराचार्या इस विषय के बड़े विद्वान थे | 'विश्व शब्दकोष' के अनुसार भारतीय मनीषियों को यूनान के बीजगणितज्ञ डायोफैन्ट्स से कहीं अधिक विषय का ज्ञान था | ब्रह्मगुप्त (६२८ई.) ने 'समीकरण' खोज निकाला | आर्यभट्ट ने वृत्त की परिधि और व्यास की निष्पत्ति का यथार्थ मान निकटतम चतुर्थ दशमलव अंक तक निकाला | मुहम्मद ईब्न मूसा ८२५ई. में (पाई) का मान देते हुए लिखा है : "यह मान भारतीय ज्योतिषाचार्यों का दिया हुआ है।"
 

ज्यामिति :
भारतीयों को भी ज्यामिति का विशेष ज्ञान था | यज्ञ में वेदियों को बनाने में ज्यामिति का प्रयोग पुरातन काल से चला आ रहा है | एक प्राचीन ग्रंथ "शुल्वसूत्र" में वर्ग-आयन बनाने की विधि दी हुई है | भुजा से कर्ण का संबंध, वर्ग के समान आयत, वर्ग के समान वृत्त आदि प्रश्नों का विचार इस ग्रंथ में किया गया है |

ज्योतिष :
ज्योतिष के क्षेत्र में हिंदुओं ने संसार को अमूल्य रत्न भेंट किए | वेली का मत है कि ईसा के हज़ारों वर्ष पूर्व भारतीय मनीषी वैज्ञानिक रूप से ग्रह-गणना करते थे । लैपलेस के मत में ईसा के ३००० वर्ष पूर्व ( आज से ५००० वर्ष पहले ) भारतीय ज्योतिषाचार्य ग्रहों का स्थान एक विकला ( समय का एक छोटा मान ) तक निकाल लेते थे । सर विलियम जेम्स के अनुसार भारतीय मनीषी ईसा से ११८० वर्ष पूर्व ( अर्थात् आज से करीब ३२०० वर्ष पहले ) ग्रहों की ठीक-ठीक गणना करने में समर्थ थे ।

ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन प्रारंभिक वैदिक काल में भी होता था । काल के सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंश क्रति ( एक सेकंड के ३४००० अंशों में से एक अंश के बराबर ) को भास्कराचार्य अपनी गणना में लाये हैं । वैदिक ऋषि यह जानते थे कि सूर्य चन्द्र को प्रकाशित करता है । यह भी जानते थे कि चन्द्रमा २७ दिन में अपनी परिक्रमा पूरी करके फिर उसी स्थान में आ जाता है । ३० दिनों का मास तथा ३६५ दिनों का वर्ष मानते थे । पर जब देखा गया कि ३०-३० दिनों के १२ चान्द्रमासों से वर्ष के ३६५ दिन पूरे नहीं होते तो चन्द्र और सौर वर्षों का हिसाब ठीक रखने के लिए प्रति तीन वर्षों में एक मलमास जोड़ा गया ।

पृथ्वी घूमती है इस कारण दिन और रात का भेद होता है – इस तथ्य को पहले आर्यभट्ट ने जाना, आज से लगभग १५०० वर्ष पूर्व । इसके वर्षों बाद यूरोप में कॉपरनिकस के द्वारा इसका आविष्कार हुआ । आर्यभट्ट सूर्य और चंद्रग्रहणों के कारण जानते थे, इसमें कोई सन्देह नहीं है । उन्होंने यह भी कहा था कि चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों में अपना कोई प्रकाश नहीं है । सूर्य के प्रकाश से वे प्रकाशित होते हैं । ये ग्रह भी पृथ्वी के समान सूर्य की परिक्रमा करते हैं और इनका परिक्रमण पथ वृत्ताकार नहीं, प्रत्युत दीर्घवृत्ताकार है ।

सूर्य-सिद्धान्त ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है कि यदि पृथ्वी का आकार वृत्त न माना जाय तो इस कथन का कुछ अर्थ ही न रह जायेगा कि सूर्योदय के पूर्व उषःकाल होता है । पृथ्वी के ऊपर वायुमण्डल के विस्तार के संबंध में उनके विचार आधुनिक ज्योतिशास्त्र से मिलते-जुलते हैं ।

वेदों में कहा गया है कि ब्रह्माण्ड अनंत है और इसमें अनेकों लोक हैं । कुछ लोकों के विज्ञानी अपनी तश्तरी जैसे आकारवाले विमानों से हमारे धरा पर उतरते हैं और कुछ अनुसंधान करके फिर चले जाते हैं ।

ऐसी उड़न तश्तरियाँ इधर तीन-चार सौ वर्षों के बीच पश्चिम के विभिन्न देशों में अनेकों बार देखी गयीं, जो विज्ञानियों के लिए एक विस्मयकारी घटना है ।

कुछ और जानने योग्य बातें

1.   त्रैराशिक का आविष्कार भारतीय गणितज्ञों ने किया ।

2.   त्रिकोणमिति के क्षेत्र में भारतीय मनीषियों ने जो काम किया है, वह बेजोड़ और मौलिक है । उन्होंने ज्या, कोटिज्या, और उत्क्रमज्या आविष्कृत की ।

3.   आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, श्रीधर, पद्मनाभ और भास्कराचार्य बीजगणित के ऐसे-ऐसे प्रश्न हल करते थे, जैसे १७वीं और १८वीं शताब्दी के पहले तक यूरोप के गणितज्ञ नहीं कर पाते थे ।

4.   भास्कराचार्य की ‘लीलावती’ में यह प्रमाणित किया गया है कि जब किसी अंक को शून्य से भाग दिया जाता है, तब उसका फल अनंत अंक आता है ।

5.   पाइथागोरस को इस सिद्धान्त का आविष्कर्त्ता माना जाता है कि समकोण त्रिभुज की समकोणवाली भुजा पर स्थित वर्ग का क्षेत्र अन्य दो भुजाओं पर स्थित वर्गों के क्षेत्रों के योग के बराबर होता है । परंतु बोधायन ने पाइथागोरस से बहुत पहले ही अर्थात् आज से २८०० वर्ष पूर्व ही यह सिद्धान्त स्थापित किया था ।

6.   गुरुत्वाकर्षण के नियम का आविष्कारक न्यूटन को माना जाता है । किन्तु इससे बहुत पहले ही भास्कराचार्य के ग्रन्थ ‘सिद्धान्त शिरोमणि’ में यह लिखा जा चुका था कि भारी पदार्थ ( अपने भार से ) पृथ्वी पर गिरते मालूम होते हैं, पर यह पृथ्वी का आकर्षण है जो उन्हें नीचे खींच लाता है ।

7.   भारतीयों को पदार्थ विज्ञान ( प्रकाश, उष्णता, ध्वनि, आकर्षण-धर्म और विद्युत आदि ) भली-भाँति ज्ञात था ।

8.   रसायनशास्त्र संबंधी उनका कार्य वैद्यकशास्त्र में स्पष्ट रूप से वर्णित है ।

9.   सूर्य किरणों को केन्द्रीभूत करने के लिए वे गोल और अंडाकार ‘लेंस’ तैयार करते थे ।