युवा सेवा संघ
हिन्दू संस्कृति की महिमा 

किसी भी देश की संस्कृति उसकी आत्मा होती है | वह बनायी नहीं जाती, बल्कि स्वतः बनती है | इसके निर्माण में वहाँ की भौगोलिक परिस्थिति,  सामाजिक मनोदशा, रहन-सहन आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | धर्म, भाषा-साहित्य, कला, दर्शन, चिकित्सा-प्रणाली, रहन-सहन आदि में ही संस्कृति अभिव्यक्त होती है | इसीलिए आचार्य विनोबा भावे ने कहा है :   
          "जिस देश से उसकी अपनी संस्कृति या राष्ट्रीयता नष्ट कर दी जाती है, वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है अर्थात् उसकी आत्मा मर जाती है | उस राष्ट्र में दूसरे राष्ट्र की आत्मा समा जाती है, उसका अपनापन नष्ट हो जाता है | वह निष्प्राण हो जाता है | यही कारण है की जब कोई धूर्त और शक्तिशाली राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र पर राजनैतिक विजय प्राप्त करता है, तो उस विजय को स्थायित्व देने के लिए उस विजित राष्ट्र की राष्ट्रीयता को, उसकी संस्कृति या जातीयता को नष्ट-भ्रष्ट करने की भरपूर कोशिश करता है | वह विजित राष्ट्र की भावना या मनोदशा को बदलना चाहता है, उसके चिरसंरक्षित संस्कारों को कुचलना चाहता है, उसकी संस्कृति का उपहास करता है | 
            भारत, इटली, जर्मनी, हिन्द-चीन, इन्डोनेशिया आदि देशों में विजेता आक्रान्ताओं ने उपरोक्त नीति ही अपनायी थी | अतः इन देशों के नेताओं ने इसकी काट के लिए जनता को अपनी संस्कृति की गौरवमयी परम्परा का पुनर्स्मरण करा कर उसके आत्मबल को जगाया और बढ़ाया | तब कहीं जा कर वहाँ की जनता गुलामी के जुए को उतार फेंकने के लिए तड़प उठी और सफल भी हो गई | 
         हमारे अपने ही देश में देखो | ब्रितानी शासन के दौरान महात्मा गाँधी ने श्रीमद् भगवद् गीता के ज्ञान का आश्रय लेकर देश की स्वतंत्रता की मुहिम चलायी | स्वामी दयानंद सरस्वती ने नारा दिया : "वेदों की ओर लौटो | " श्री बाल गंगाधर तिलक ने भी गीता का सार समझ कर देशवासियों को निष्काम कर्मयोगी बनने का आह्वान किया | स्वामी विवेकानन्द ने ऋग्वेद के इस सूत्रवाक्य 'बल ही जीवन है और निर्बलता ही मृत्यु है' को दुहराया | दूसरी तरफ क्रांतिकारियों ने गीता के 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः' से प्रेरित होकर देश के उद्धार के लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों की बाजी लगा दी |
         कहने का तात्पर्य यह है की जिसने अपनी प्राचीन विरासत से जो कुछ भी पाया, उसी को साधन रूप में अपनाकर विदेशी दासता की जंजीरों से मुक्त होने का प्रयास किया और सफलता भी उनके हाथ लगी |
         अतः हमें अपनी मूल संस्कृति की गरिमा से बालकों को अनभिज्ञ नहीं रखना चाहिए क्योंकि भविष्य में इसके भयंकर दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं | अपनी मूल संस्कृति के बारे में हमारी अज्ञानता या फिर उसकी निंदा-उपेक्षा करना यह दासता को अथवा विदेशी आधिपत्य को खुलेआम आमंत्रण देना है | एक प्रकार से अपने तथा आनेवाली पीढ़ी के प्रति घोर अन्याय करना है | 
         यूनान के प्राचीन दार्शनिक प्लेटो (अफलातून) ने एक बार बड़े दुःख के साथ कहा था :
"जो मनुष्य अपने देश की संस्कृति के प्रति घृणा उत्पन्न करता है, उससे बढ़ कर पापी दूसरा कोई नहीं है | ऐसे मनुष्य का तो मर जाना ही श्रेयस्कर है |"
         फिर भारतीय संस्कृति की तो बात ही निराली है | इसका प्रयोग-सिद्ध अद्वैत दर्शन और 'वसुधैव कुटुम्बकम्‌ ' का सर्वोच्च अनुकरणीय आदर्श किसे आकर्षित नहीं करता ? वस्तुतः यह दर्शन और आदर्श सभी कालों में प्रासंगिक एवं उपादेय है | अद्वैत अर्थात् पूर्ण आतंरिक स्वाधीनता, स्वेच्छाचारिता नहीं | सच तो यह है की भारतीय संस्कृति में विद्यमान आन्तरिक स्वाधीनता के बीज ने ही उसे आज तक अक्षुण्य रखा है और उसका वपन किया है हमारे यहाँ के ब्रह्मज्ञानी संतों-महापुरुषों ने | जब तक आत्मिक स्वाधीनता का ज्ञान बना रहता है, तब तक किसी भी देश के निवासी अपने आहार-विहार, आचार-विचार, वेश-भूषा आदि समस्त विषयों में सचेत रहते हैं अर्थात् इन विषयों पर अपने देश की संस्कृति के अनुसार ही विचार करते हैं |
 

भारतीय और पाश्‍चात्‍य संस्कृति में आधारभूत अंतर 

भारतीयों का मुख्य झुकाव ही आध्यात्मिकता की ओर होता है | वह प्रत्येक स्थिति-परिस्थिति को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखता है | इस क्रम में उसकी अद्वैत धारणा सहज ही बनती है |  अद्वैतभाव अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा का तात्विक अभेदमात्र | इसको और सरल ढंग से कहें  तो दोनों एक ही हैं, इनमे कोई अंतर नहीं | 
          अद्वैत भावना होने की वजह से भारतीयों में कट्टरपन का आभाव पाया जाता है और यह इस संस्कृति की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता है | यही कारण है की परधर्मावलम्बियों  के साथ जैसा उदार व्यवहार भारतीयों ने किया है, वह वस्तुतः अद्वितीय है, बेजोड़ है | भारत का महान सम्राट अशोक इसका एक देदीप्यमान उदाहरण है | अशोक के ही शब्दों में :  "जो दूसरों के धर्मं की निंदा अथवा उपहास करता है, वह वस्तुतः अपने ही धर्मं की हानि करता है |" आगे वह कहता है : "यह मैं कोई नवीन बात नहीं कह रहा हूँ, बल्कि यह तो हमारे अतीत के पूर्वजों के काल से चली आ रही है | मैं तो इसे सिर्फ पुनर्स्थापित करना चाहता हूँ क्योंकि आज वह बहुत कुछ लुप्तप्रायः हो गयी है" 
          अद्वैत भावना के परिणामस्वरूप भारतीयों में अहिंसा भाव और दयालुता पायी जाती है | अज्ञानवश या राग-द्वेष वश वह थोड़ी देर के लिए भले ही निर्दयता का प्रदर्शन कर दे, परन्तु अंततः जीवों के प्रति दयाभाव उसको अधिक रुचता है | 
          भारत का एक अनपढ़ एवं ग्रामीण गँवार भी ऐसा मानता है कि यह जगत माया है, छलावा है | यह बुरी चीज है, अतः इसको तोड़ना चाहिए | इस प्रकार वह सहज में ही त्याग को पसंद करता है |  वह त्यागी को भोगी से ऊँचा मानता है, चाहे स्वयं त्यागी ना हो सके | भारतीय जीवन में इसी कारण तपस्या का थोड़ा-बहुत वातावरण रहता है | हमारे ईशावास्योपनिषद् में मात्र दो शब्दों में अदभुत उपदेश दिया गया है : त्यक्तेन भुंजीथा: अर्थात त्यागपूर्वक उपभोग करो | गीता में भी कहा गया है कि त्याग के ज़रिए ही लक्ष्मी, ऐश्वर्य, शोभा और वैभव प्राप्त होता है | सचमुच, बिना त्याग के समाज आगे नहीं बढ़ सकता | त्याग के अभ्यास से लक्ष्मी हासिल होती हैं | आप आम की एक गुठली बोयें तो सैकड़ों-हज़ारों आम मिलेंगे | क़ुरान में भी लिखा है की त्याग से बेहिसाब मिलता है |

                 हमारे यहाँ जिस वर्ग में त्याग की जितनी ही क्षमता थी, उसे समाज में उतना ही ऊँचा स्थान मिला था | उसके शब्द, उसके आदेश उतने ही मान्य थे | समाज-नीति का नियंत्रण राजा के हाथ में न था बल्कि उन महात्माओं के हाथ में था जो अपने सुखोपभोग के समस्त बाह्य सामग्रियों एवं सुविधाओं का त्याग करके केवल आत्मचिंतन तथा अपने अनुभव एवं ज्ञान से समाज के कल्याण के लिए जीते थे, जो समाज से कम-से-कम लेते थे तथा अधिक-से-अधिक देते थे, जिनको स्वयं किसी बाह्य सुविधा या अधिकार की आवश्यकता न थी, सत्तापक्ष के लिए भी उनके पथ-प्रदर्शन की अवहेलना संभव न थी | यही आत्मबल की प्रतिष्ठा संसार की संपूर्ण शक्तियों अथवा शक्ति-केंद्रों के ऊपर साधुत्व, त्याग, तप कि प्रतिष्ठा भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषता रही है | हमारा प्राचीन समाज जीवन के आदर्शों और उच्च प्रेऱणाऒं के लिए ऋषियों और तपस्वियों की ओर देखता था | इस प्रकार त्याग जीवन का आदर्श था, ना कि भोग | 
                 एक बात और ध्यान  देने योग्य है कि हमारे यहाँ आध्यात्मिकता पर ज़ोर देने के क्रम में विद्या, धन और शक्ति की कभी भी उपेक्षा नही की गयी | इनकी आवश्यकता तो प्रत्येक देश के समाज को थी, है और रहेगी | सिर्फ़ प्रश्न यही है कि मनुष्य इनका उपयोग किस प्रकार करता है | आज संसार में विद्या, धन और बल की कमी नही है, फिर भी इनके द्वारा मानव-जाति और मानव-शक्तियों का भयंकर विनाश हो रहा है | यह इन सब का दुरुपयोग है | किन्तु भारतवर्ष में इन साधनों पर साधुत्व का, आत्मबल का नियंत्रण है जो सिद्ध करता है कि हमारी  संस्कृति न केवल श्रेष्ठ थी, बल्कि व्यवहारिक दृष्टि से भी उसने श्रेष्ठ उदाहरणो एवं प्रतीकों को जन्म दिया था | विद्या, धन और शक्ति के उचित उपयोग के लिए ही हमारे यहाँ उसे अध्यात्मिक आधार पर प्रतिष्ठित किया गया था |

 यह इसी अध्यात्मिक अधिष्ठान का परिणाम है कि मैक्समूलर के शब्दों में ‘प्राचीन वंश  विनष्ट हुए, परिवारों का ह्रास हुआ, नये साम्राज्यों की नींव पड़ी, किन्तु इन आक्रमणों और हलचलों से हिंदुओं के आंतरिक जीवन में परिवर्तन नहीं हुआ ।’  वस्तुतः मनुष्य में परिवर्तन होता है आंतरिक संकल्प से, बाह्य जीवन से नहीं |
भारतीय संस्कृति का मुख्य गुण विषमता, प्रतिस्पर्धा और अशांति को दूर कर समता समानता और शांति का साम्राज्य स्थापित करना है और यही उसका गौरव और उसकी उपयोगिता है | अपनी इस महिमा से मंडित होकर आजकल के जगत में जब तक दुःख, अशांति और भय है तब तक एक माता के तौर पर, एक त्राता के तौर पर भारतीय संस्कृति अन्य सब संस्कृतियों के ओर निहार सकती है और निहारती रहेगी | माता के इसी गौरव की रक्षा करना, अपने आपको इसका सुपात्र बनाना यह प्रत्येक भारतीय का धर्म है | 

             उल्लेखनीय है कि मानव समाज में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं : केंद्रोन्मुखी और वृत्तोंन्मुखी | इनमे से पहली परिधि वृत्त या से केंद्रबिन्दु की ओर जाती है | वह कहीं भी रहे,केन्द्र के साथ वह बँधी है, केंद्र में ध्यानस्थ है | दूसरी केंद्र से परिधि की ओर जाती है | भारतीय संस्कृति अपने मूल रूप में केंद्रोन्मुखी रही है | वह जगत में रहकर आदर्शोन्मुख है | वह बाहर रहकर भी अन्तःस्थ है, आत्मस्थ है | इसके विरुद्ध पाश्चात्य संस्कृति बाह्यप्रसारी है | वह बाहर की ओर जाती है, केंद्र से दूर फैलने की ओर उसकी प्रवृत्ति है | इन दो भिन्न प्रवृत्तियों से दो सभ्यताओं का जन्म हुआ है | जब प्रवृत्तियाँ मूलत: भिन्न थीं तो उनके साधना के रूपों में भी भिन्नता आयी | भारतीय संस्कृति आचरण प्रधान हुई | उसमें अंतर्वृत्तियों  के उत्कर्ष पर ज़ोर दिया गया | उसमें समाज की प्रत्येक इकाई या घटक से आत्मशुद्धि की आशा पहले की गयी | उसमें व्यक्ति के जीवन को त्याग की ओर बढ़ाया गया क्योंकि त्याग और आत्मनियंत्रण एवं आत्मशुद्धि के बिना समाज के घटकों में सच्चे सामाजिक कल्याण की भावना तथा उसके अनुसार आचरण होना कठिन है | इसके विपरीत पाश्चात्य संस्कृति में आत्मशुद्धि के मुख्य दृष्टिबिन्दु पर ज़ोर ना देने के कारण वहाँ  व्यक्तिगत और सामाजिक आचरण या नीति में बहुत बड़ा अंतर आ गया और धीरे-धीरे संस्कृति विकृत होकर नष्ट हो गयी |
             जब व्यक्ति अपने सुधार, अपने दोष-निवारण की  ओर से आँखें मूंद लेता है अथवा अपनी चरित्रगत दुर्बलताओं की ओर से उदासीन हो समाज के उद्धार का प्रयत्न करता है,तब सभ्यता का भ्रष्ट और विकृत होना स्वभाविक है | इसके विपरीत जब समाज का प्रत्येक घटक आत्मशुद्धि पर ध्यान देता है, स्वार्थवृत्ति पर नियंत्रण रखता है तब संपूर्ण समाज अपने-आप निर्मल हो जाता है |

भारतीय संस्कृति व्यवहार के धरातल पर

भारतीय संस्कृति खड़ी तो इसी भूमि पर है पर उसका सिर आकाश की ओर उठा है | वह जीवन के अंतरिक्ष को भेदकर उसके अनंत रहस्यों को जानने के लिए विकल हुई थी | यह शुद्ध वैज्ञानिक वृत्ति थी | उसने अध्यात्म विद्या में जो उन्नति की थी उसमे पदार्थविद्या की उपेक्षा न थी, बल्कि उस मूल प्रवृत्ति को जानने के लिए ये आवश्यक था |
                     हमारी संस्कृति ने पदार्थविद्या, शासन-व्यवस्था, समाज-व्यवस्था, अर्थविद्या, शरीरशास्त्र, चिकित्साशास्त्र, वास्तुकला, युद्धविद्या, जननविज्ञान आदि भौतिक विद्याओं के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रगति की थी | वायुविज्ञान की सहायता से वह समय और दूरी व्यवधान पर विजयी प्राप्त कर सकी थी | सूर्यविज्ञान की सहायता से वस्तुओं के रूप को तुरंत बदल देने, एक जाति के पदार्थ में बदल देने, लोहे को सोना करने तथा एक सीमा तक मृत्यु पर भी विजय प्राप्त करने में समर्थ हुई थी | हमारी समाज व्यवस्था में व्यक्ति के विकास की संपूर्ण व्यवस्थाओं के होते हुए भी समाज या समूह की अंतिम हित की भावना प्रधान थी | हमारी अर्थविद्या  समाज के शोषण का कारण न बन कर उसके सरंक्षण और संवर्धन का कारण बन सकी थी | धन ने जीवन पर प्रभुत्व नही प्राप्त किया था | 
                     हठयोगियों ने शरीर की अनेक ऐसी शक्तियों एवं शक्ति-संस्थानो का पता लगाया था जिनका उचित ज्ञान आधुनिक शरीरशास्त्रियों को अबतक नहीं हो सका है | चिकित्सा के क्षेत्र में हमारा आयुर्वेद आजतक बेजोड़ है | यह बिल्कुल सुरक्षित चिकित्सा प्रणाली  प्रदान करता है,इसमे प्रतिक्रिया का कोई खतरा नही रहता | संक्षेप में जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नही था जो हमारे पूर्वजों ने अछूता छोड़ा हो | हाँ एक बात अवश्य थी | इन सब शास्त्रों अथवा विज्ञानों के मूल में उसी परम पुरुषार्थ अथवा आदर्श की प्रेरणा थी | सब विद्याएँ उसी ओर प्रवाहित थीं | सबका आधार वही था | जीवन का यह आध्यात्मिक आधार ही भारतीय संस्कृति की विशेषता थी |