युवा सेवा संघ
 
 
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विद्यार्थियों, माता-पिता-अभिभावकों व राष्ट्र के कर्णधारों के नाम ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आसारामजी बापू का संदेश हमारे देश का भविष्य हमारी युवा पीढ़ी पर निर्भर है किन्तु उचित मार्गदर्शन के अभाव में वह आज गुमराह हो रही है |
      पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता के दुष्प्रभाव से उसके यौवन का ह्रास होता जा रहा है | विदेशी चैनल, चलचित्र, अशलील साहित्य आदि प्रचार माध्यमों के द्वारा युवक-युवतियों को गुमराह किया जा रहा है | विभिन्न सामयिकों और समाचार-पत्रों में भी तथाकथित पाश्चात्य मनोविज्ञान से प्रभावित मनोचिकित्सक और ‘सेक्सोलॉजिस्ट’ युवा छात्र-छात्राओं को चरित्र, संयम और नैतिकता से भ्रष्ट करने पर
 तुले हुए हैं |
            ब्रितानी औपनिवेशिक संस्कृति की देन इस वर्त्तमान शिक्षा-प्रणाली में जीवन के नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीनता बरती गई है | फलतः आज के विद्यार्थी का जीवन कौमार्यवस्था से ही विलासी और असंयमी हो जाता है |
      पाश्चात्य आचार-व्यवहार के अंधानुकरण से युवानों में जो फैशनपरस्ती, अशुद्ध आहार-विहार के सेवन की प्रवृत्ति कुसंग, अभद्रता, चलचित्र-प्रेम आदि बढ़ रहे हैं उससे दिनोंदिन उनका पतन होता जा रहा है | वे निर्बल और कामी बनते जा रहे हैं | उनकी इस अवदशा को देखकर ऐसा लगता है कि वे ब्रह्मचर्य की महिमा से सर्वथा अनभिज्ञ हैं |
      लाखों नहीं, करोड़ों-करोड़ों छात्र-छात्राएँ अज्ञानतावश अपने तन-मन के मूल ऊर्जा-स्रोत का व्यर्थ में अपक्षय कर पूरा जीवन दीनता-हीनता-दुर्बलता में तबाह कर देते हैं और सामाजिक अपयश  के भय से मन-ही-मन कष्ट झेलते रहते हैं | इससे उनका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है, सामान्य शारीरिक-मानसिक विकास भी नहीं हो पाता | ऐसे युवान रक्ताल्पता, विस्मरण तथा दुर्बलता से पीड़ित
 होते हैं |
     यही वजह है कि हमारे देश में औषधालयों, चिकित्सालयों, हजारों प्रकार की एलोपैथिक दवाइयों, इन्जेक्शनों आदि की लगातार वृद्धि होती जा रही है | असंख्य डॉक्टरों ने अपनी-अपनी दुकानें खोल रखी हैं फिर भी रोग एवं रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है |
      इसका मूल कारण क्या है ? दुर्व्यसन तथा अनैतिक, अप्राकृतिक एवं अमर्यादित मैथुन द्वारा वीर्य की क्षति ही इसका मूल कारण है | इसकी कमी से रोगप्रतिकारक शक्ति घटती है, जीवनशक्ति का ह्रास होता है |
       इस देश को यदि जगदगुरु के पद पर आसीन होना है, विश्व-सभ्यता एवं विश्व-संस्कृति का सिरमौर बनना है, उन्नत स्थान फिर से प्राप्त करना है तो यहाँ की सन्तानों को चाहिए कि वे ब्रह्मचर्य के महत्व को समझें और सतत सावधान रहकर सख्ती से इसका पालन करें |
        ब्रह्मचर्य के द्वारा ही हमारी युवा पीढ़ी अपने व्यक्तित्व का संतुलित एवं श्रेष्ठतर विकास कर सकती है | ब्रह्मचर्य के पालन से बुद्धि कुशाग्र बनती है, रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है तथा महान्-से-महान् लक्ष्य निर्धारित करने एवं उसे सम्पादित करने का उत्साह उभरता है, संकल्प में दृढ़ता आती है, मनोबल पुष्ट होता है |
       आध्यात्मिक विकास का मूल भी ब्रह्मचर्य ही है | हमारा देश औद्योगिक, तकनीकी और आर्थिक क्षेत्र में चाहे कितना भी विकास कर ले , समृद्धि प्राप्त कर ले फिर भी यदि युवाधन की सुरक्षा न हो पाई तो यह भौतिक विकास अंत में महाविनाश की ओर ही ले जायेगा क्योंकि संयम, सदाचार आदि के परिपालन से ही कोई भी सामाजिक व्यवस्था सुचारु रूप से चल सकती है | भारत का सर्वांगीण विकास सच्चरित्र एवं
 संयमी युवाधन पर ही आधारित है |
       अतः हमारे युवाधन छात्र-छात्राओं को ब्रह्मचर्य में प्रशिक्षित करने के लिए उन्हें यौन-स्वास्थ्य, आरोग्यशास्त्र, दीर्घायु-प्राप्ति के उपाय तथा कामवासना नियंत्रित करने की विधि का स्पष्ट ज्ञान प्रदान करना हम सबका अनिवार्य कर्त्तव्य है | इसकी अवहेलना करना हमारे देश व समाज के हित में नहीं है | यौवन सुरक्षा से ही सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण हो सकता है |
यौवन-सुरक्षा
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् |
            धर्म का साधन शरीर है | शरीर से ही सारी साधनाएँ सम्पन्न होती हैं | यदि शरीर कमजोर है तो उसका प्रभाव मन पर पड़ता है, मन कमजोर पड़ जाता है |
     कोई भी कार्य यदि सफलतापूर्वक करना हो तो तन और मन दोनों स्वस्थ होने चाहिए | इसीलिये कई बूढ़े लोग साधना की हिम्मत नहीं जुटा पाते, क्योंकि वैषयिक भोगों से उनके शरीर का सारा ओज-तेज नष्ट हो चुका होता है | यदि मन मजबूत हो तो भी उनका जर्जर शरीर पूरा साथ नहीं दे पाता | दूसरी ओर युवक वर्ग साधना  करने  की क्षमता होते हुए भी संसार की चकाचौंध से प्रभावित होकर वैषयिक सुखों में बह जाता
 है |
      अपनी वीर्यशक्ति का महत्व न समझने के कारण बुरी आदतों में पड़कर उसे खर्च कर देता है, फिर जिन्दगी भर पछताता रहता है |
      मेरे पास कई ऐसे युवक आते हैं, जो भीतर-ही भीतर परेशान रहते हैं | किसीको वे   अपना  दुःख-दर्द सुना नहीं पाते, क्योंकि बुरी आदतों में पड़कर उन्होंने अपनी वीर्यशक्ति को खो दिया है| अब, मन और शरीर कमजोर हो गये गये, संसार उनके लिये  दुःखालय हो गया, ईश्वरप्राप्ति उनके लिए असंभव हो गई | अब संसार में रोते-रोते जीवन घसीटना ही रहा |
      इसीलिए हर युग में महापुरुष लोग ब्रह्मचर्य पर जोर देते हैं | जिस व्यक्ति के जीवन में  संयम नहीं है, वह न तो स्वयं की ठीक से उन्नति कर पाता है और न ही समाज में कोई महान् कार्य कर पाता है | ऐसे व्यक्तियों से बना हुआ समाज और देश भी भौतिक उन्नति व आध्यात्मिक उन्नति में पिछड़ जाता है | उस देश का शीघ्र पतन हो जाता है |
ब्रह्मचर्य क्या है ?
     पहले ब्रह्मचर्य क्या है- यह समझना चाहिए | ‘याज्ञवल्क्य संहिता’ में आया है :
 कर्मणा मनसा वाचा सर्वास्थासु सर्वदा |
सर्वत्र मैथुनतुआगो ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ||
‘सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते हैं |’
 भगवान वेदव्यासजी ने कहा है :
           ब्रह्मचर्यं गुप्तेन्द्रिस्योपस्थस्य संयमः |
 ‘विषय-इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाले सुख का संयमपूर्वक त्याग करना ब्रह्मचर्य है |’
 भगवान शंकर कहते हैं :
           सिद्धे बिन्दौ महादेवि किं न सिद्धयति भूतले |
 ‘हे पार्वती! बिन्दु अर्थात वीर्यरक्षण सिद्ध होने के बाद कौन-सी सिद्धि है, जो साधक को प्राप्त नहीं हो सकती ?’
      साधना द्वारा जो साधक अपने वीर्य को ऊर्ध्वगामी बनाकर योगमार्ग में आगे बढ़ते हैं, वे कई प्रकार की सिद्धियों के मालिक बन जाते हैं | ऊर्ध्वरेता योगी पुरुष के चरणों में समस्त सिद्धियाँ दासी बनकर रहती हैं | ऐसा ऊर्ध्वरेता पुरुष परमानन्द को जल्दी पा सकता है अर्थात् आत्म-साक्षात्कार जल्दी कर सकता है |
      देवताओं को देवत्व भी इसी ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त हुआ है:
           ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत |
           इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरत ||
 ‘ब्रह्मचर्यरूपी तप से देवों ने मृत्यु को जीत लिया है | देवराज इन्द्र ने भी ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही देवताओं से अधिक सुख व उच्च पद को प्राप्त किया है |’
(अथर्ववेद 1.5.19)
ब्रह्मचर्य बड़ा गुण है | वह ऐसा गुण है, जिससे मनुष्य को नित्य मदद मिलती है और जीवन के सब प्रकार के खतरों में सहायता मिलती है |
ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट तप है
      ऐसे तो तपस्वी लोग कई प्रकार के तप करते हैं, परन्तु ब्रह्मचर्य के बारे में भगवान शंकर कहते हैं:
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम् |
ऊर्ध्वरेता भवेद्यस्तु स देवो न तु मानुषः ||
 ‘ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट तप है | इससे बढ़कर तपश्चर्या तीनों लोकों में दूसरी नहीं हो सकती | ऊर्ध्वरेता पुरुष इस लोक में मनुष्यरूप में प्रत्यक्ष देवता ही है |’
 जैन शास्त्रों में भी इसे उत्कृष्ट तप बताया गया है |
           तवेसु वा उत्त्मं बंभचेरम् |
 ‘ब्रह्मचर्य सब तपों में उत्तम तप है |’
 वीर्यरक्षण ही जीवन है
      वीर्य इस शरीररूपी नगर का एक तरह से राजा ही है | यह वीर्यरूपी राजा यदि पुष्ट है, बलवान् है तो रोगरूपी शत्रु कभी शरीररूपी नगर पर आक्रमण नही करते | जिसका वीर्यरूपी राजा निर्बल है, उस शरीररूपी नगर को कई रोगरूपी शत्रु आकर घेर लेते हैं | इसीलिए कहा गया है :
 मरणं बिन्दोपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् |
 ‘बिन्दुनाश (वीर्यनाश) ही मृत्यु है और बिन्दुरक्षण ही जीवन है |’
 जैन ग्रंथों में अब्रह्मचर्य को पाप बताया गया है :
           अबंभचरियं घोरं पमायं दुरहिठ्ठियम् |
 ‘अब्रह्मचर्य घोर प्रमादरूप पाप है |’ (दश वैकालिक सूत्र: 6.17)
 ‘अथर्वेद’ में इसे उत्कृष्ट व्रत की संज्ञा दी गई है:
           व्रतेषु वै वै ब्रह्मचर्यम् |
 वैद्यकशास्त्र में इसको परम बल कहा गया है :
     ब्रह्मचर्यं परं बलम् | ‘ब्रह्मचर्य परम बल है |’
 वीर्यरक्षण की महिमा सभी ने गायी है | योगीराज गोरखनाथ ने कहा है :
     कंत गया कूँ कामिनी झूरै | बिन्दु गया कूँ जोगी ||
 ‘पति के वियोग में कामिनी तड़पती है और वीर्यपतन से योगी पश्चाताप करता है |’
 भगवान शंकर ने तो यहाँ तक कह दिया कि इस ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही मेरी ऐसी महान् महिमा हुई है :
     यस्य प्रसादान्महिमा ममाप्येतादृशो भवेत् |
आधुनिक चिकित्सकों का मत
      यूरोप के प्रतिष्ठित चिकित्सक भी भारतीय योगियों के कथन का समर्थन करते हैं | डॉ. निकोल कहते हैं :
      “यह एक भैषजिक और देहिक तथ्य है कि शरीर के सर्वोत्तम रक्त से स्त्री तथा पुरुष दोनों ही जातियों में प्रजनन तत्त्व बनते हैं | शुद्ध तथा व्यवस्थित जीवन में यह तत्त्व पुनः अवशोषित हो जाता है | यह सूक्ष्मतम मस्तिष्क, स्नायु तथा मांसपेशिय ऊत्तकों (Tissue) का निर्माण करने के लिये तैयार होकर पुनः परिसंचारण में जाता है | मनुष्य का यह वीर्य वापस ऊपर जाकर  शरीर में विकसित होने पर उसे
 निर्भीक, बलवान्, साहसी तथा वीर बनाता है | यदि इसका अपव्यय किया गया तो यह उसको स्त्रैण, दुर्बल, कृशकलेवर एवं कामोत्तेजनशील बनाता है तथा उसके शरीर के अंगों के कार्यव्यापार को विकृत एवं स्नायुतंत्र को शिथिल (दुर्बल) करता है और उसे मिर्गी (मृगी) एवं अन्य अनेक रोगों और मृत्यु का शिकार बना देता है | जननेन्द्रिय के व्यवहार की निवृति से शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक बल में
 असाधारण वृद्धि होती है |”
      परम धीर तथा अध्यवसायी वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि जब कभी भी रेतःस्राव को सुरक्षित रखा जाता तथा इस प्रकार शरीर में उसका पुनर्वशोषण किया जाता है तो वह रक्त को समृद्ध तथा मस्तिष्क को बलवान् बनाता है |
      डॉ. डिओ लुई कहते हैं : “शारीरिक बल, मानसिक ओज तथा बौद्धिक कुशाग्रता के लिये इस तत्त्व का संरक्षण परम आवश्यक है |”
      एक अन्य लेखक डॉ. ई. पी. मिलर लिखते हैं : “शुक्रस्राव का स्वैच्छिक अथवा अनैच्छिक अपव्यय जीवनशक्ति का प्रत्यक्ष अपव्यय है | यह प्रायः सभी स्वीकार करते हैं कि रक्त के सर्वोत्तम तत्त्व शुक्रस्राव की संरचना में प्रवेश कर जाते हैं | यदि यह निष्कर्ष ठीक है तो इसका अर्थ यह हुआ कि व्यक्ति के कल्याण के लिये जीवन में ब्रह्मचर्य परम आवश्यक है |”
      पश्चिम के प्रख्यात चिकित्सक कहते हैं कि वीर्यक्षय से, विशेषकर तरुणावस्था में वीर्यक्षय से विविध प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं | वे हैं : शरीर में व्रण, चेहरे पर मुँहासे अथवा विस्फोट, नेत्रों के चतुर्दिक नीली रेखायें, दाढ़ी का अभाव, धँसे हुए नेत्र, रक्तक्षीणता से पीला चेहरा, स्मृतिनाश, दृष्टि की क्षीणता, मूत्र के साथ वीर्यस्खलन, अण्डकोश की वृद्धि, अण्डकोशों में
 पीड़ा,दुर्बलता, निद्रालुता, आलस्य, उदासी, हृदय-कम्प, श्वासावरोध या कष्टश्वास, यक्ष्मा, पृष्ठशूल, कटिवात, शोरोवेदना, संधि-पीड़ा, दुर्बल वृक्क, निद्रा में मूत्र निकल जाना, मानसिक अस्थिरता, विचारशक्ति का अभाव, दुःस्वप्न, स्वप्न दोष तथा मानसिक अशांति |
      उपरोक्त रोग को मिटाने का एकमात्र ईलाज ब्रह्मचर्य है | दवाइयों से या अन्य उपचारों से ये रोग स्थायी रूप से ठीक नहीं होते |
वीर्य कैसे बनता है
      वीर्य शरीर की बहुत मूल्यवान् धातु है | भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है | श्री सुश्रुताचार्य ने लिखा है :
     रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते |
     मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जाया: शुक्रसंभवः ||
 जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है | पाँच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है | पाँच दिन बाद रक्त में से मांस, उसमें  से 5-5 दिन के अंतर से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से अंत में वीर्य बनता है | स्त्री में जो यह धातु बनती है उसे ‘रज’ कहते हैं |
           वीर्य किस प्रकार छः-सात मंजिलों से गुजरकर अपना यह अंतिम रूप धारण करता है, यह सुश्रुत के इस कथन से ज्ञात हो जाता है | कहते हैं कि इस प्रकार वीर्य बनने में करीब 30 दिन व 4 घण्टे लग जाते हैं | वैज्ञनिक लोग कहते हैं कि 32 किलोग्राम भोजन से 700 ग्राम रक्त बनता है और 700 ग्राम रक्त से लगभग 20 ग्राम वीर्य बनता है |
आकर्षक व्यक्तित्व का कारण
      इस वीर्य के संयम से शरीर में एक अदभुत आकर्षक शक्ति उत्पन्न होती है जिसे प्राचीन वैद्य धन्वंतरि ने ‘ओज’ नाम दिया है | यही ओज मनुष्य को अपने परम-लाभ ‘आत्मदर्शन’ कराने में सहायक बनता है | आप जहाँ-जहाँ भी किसी व्यक्ति के जीवन में कुछ विशेषता, चेहरे पर तेज, वाणी में बल, कार्य में उत्साह पायेंगे, वहाँ समझो इस वीर्य रक्षण का ही चमत्कार है |
      यदि एक साधारण स्वस्थ मनुष्य एक दिन में 700 ग्राम भोजन के हिसाब से चालीस दिन में 32 किलो भोजन करे, तो समझो उसकी 40 दिन की कमाई लगभग 20 ग्राम वीर्य होगी | 30 दिन अर्थात महीने की करीब 15 ग्राम हुई और 15 ग्राम या इससे  कुछ अधिक वीर्य एक बार के मैथुन में पुरुष द्वारा खर्च होता है |
माली की कहानी
      एक था माली | उसने अपना तन, मन, धन लगाकर कई दिनों तक परिश्रम करके एक सुन्दर बगीचा तैयार किया | उस बगीचे में भाँति-भाँति के मधुर सुगंध युक्त पुष्प खिले | उन पुष्पों को चुनकर उसने इकठ्ठा किया और उनका बढ़िया इत्र तैयार किया | फिर उसने क्या किया समझे आप …? उस इत्र को एक गंदी नाली ( मोरी ) में बहा दिया |
            अरे ! इतने दिनों के परिश्रम से तैयार किये गये इत्र को, जिसकी सुगन्ध से सारा घर महकने वाला था, उसे नाली में बहा दिया ! आप कहेंगे कि ‘वह माली बड़ा मूर्ख था, पागल था …’ मगर अपने आपमें ही झाँककर देखें | वह माली कहीं और ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है | हममें से कई  लोग ऐसे ही माली हैं |
      वीर्य बचपन से लेकर आज तक यानी 15-20 वर्षों में तैयार होकर ओजरूप में शरीर में विद्यमान रहकर तेज, बल और स्फूर्ति देता रहा | अभी भी जो करीब 30 दिन के परिश्रम की कमाई थी, उसे यूँ ही सामान्य आवेग में आकर अविवेकपूर्वक खर्च कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है ?
      क्या यह उस माली जैसा ही कर्म नहीं है ? वह माली तो दो-चार बार यह भूल करने के बाद किसी के समझाने पर सँभल भी गया होगा, फिर वही-की-वही भूल नही दोहराई होगी, परन्तु आज तो कई लोग वही भूल दोहराते रहते हैं | अंत में पश्चाताप ही हाथ लगता है |
      क्षणिक सुख के लिये व्यक्ति कामान्ध होकर बड़े उत्साह से इस मैथुनरूपी कृत्य में पड़ता है परन्तु कृत्य पूरा होते ही वह मुर्दे जैसा हो जाता है | होगा ही | उसे पता  ही नहीं कि सुख तो नहीं मिला, केवल सुखाभास हुआ, परन्तु उसमें  उसने 30-40 दिन की अपनी कमाई खो दी |
      युवावस्था आने तक वीर्यसंचय होता है वह शरीर में ओज के रूप में स्थित रहता है | वह तो वीर्यक्षय से नष्ट होता ही है, अति मैथुन से तो हड्डियों में से भी कुछ सफेद अंश निकलने लगता है, जिससे अत्यधिक कमजोर होकर लोग नपुंसक भी बन जाते हैं | फिर वे किसी के सम्मुख आँख उठाकर भी नहीं देख पाते | उनका जीवन नारकीय बन जाता है |
      वीर्यरक्षण का इतना महत्व होने के कारण ही कब मैथुन करना, किससे मैथुन करना, जीवन में कितनी बार करना आदि निर्देशन हमारे ॠषि-मुनियों ने शास्त्रों में दे रखे हैं |
सृष्टि क्रम के लिए मैथुन : एक प्राकृतिक व्यवस्था
      शरीर से वीर्य-व्यय यह कोई क्षणिक सुख के लिये प्रकृति की व्यवस्था नहीं है | सन्तानोत्पत्ति के लिये इसका वास्तविक उपयोग है | यह प्रकृति की व्यवस्था है |
      यह सृष्टि चलती रहे, इसके लिए सन्तानोत्पत्ति होना जरूरी है | प्रकृति में हर प्रकार की वनस्पति व प्राणीवर्ग में यह काम-प्रवृत्ति स्वभावतः पाई जाती है | इस काम- प्रवृत्ति के वशीभूत होकर हर प्राणी मैथुन करता है और उसका रतिसुख भी उसे मिलता है | किन्तु इस प्राकृतिक व्यवस्था को ही बार-बार क्षणिक सुख का आधार बना लेना कहाँ की बुद्धिमानी है ? पशु भी अपनी ॠतु के अनुसार ही इस
 कामवृति में प्रवृत होते हैं और स्वस्थ रहते हैं, तो क्या मनुष्य पशु वर्ग से भी गया बीता है ? पशुओं में तो बुद्धितत्व विकसित नहीं होता, परन्तु मनुष्य में  तो उसका पूर्ण विकास होता है |
आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् |
भोजन करना, भयभीत होना, मैथुन करना और सो जाना यह तो पशु भी करते हैं | पशु शरीर में रहकर हम यह  सब करते आए हैं | अब यह मनुष्य शरीर मिला है | अब भी यदि बुद्धि और विवेकपूर्ण अपने जीवन को नहीं चलाया और क्षणिक सुखों के पीछे ही दौड़ते रहे तो कैसे अपने मूल लक्ष्य पर पहुँच पायेंगे ?
सहजता की आड़ में भ्रमित न होवें
      कई लोग तर्क देने लग जाते हैं : “शास्त्रों में पढ़ने को मिलता है और ज्ञानी महापुरुषों के मुखारविन्द से भी सुनने में आता है कि सहज जीवन जीना चाहिए | काम करने की इच्छा हुई तो काम किया, भूख लगी तो भोजन किया, नींद आई तो सो गये | जीवन में कोई ‘टेन्शन’, कोई तनाव नहीं होना चाहिए | आजकल के तमाम रोग इसी तनाव के ही फल हैं … ऐसा मनोवैज्ञानिक कहते हैं | अतः जीवन सहज और सरल होना चाहिए |
 कबीरदास जी ने भी कहा है : साधो, सहज समाधि भली |”
      ऐसा तर्क देकर भी कई लोग अपने काम-विकार की तृप्ति को सहमति दे देते हैं | परन्तु यह अपने आपको धोखा देने जैसा है | ऐसे लोगों को खबर ही नहीं है कि ऐसा सहज जीवन तो महापुरुषों का होता है, जिनके मन और बुद्धि अपने अधिकार में होते हैं, जिनको अब संसार में अपने लिये पाने को कुछ भी शेष नहीं बचा है, जिन्हें मान-अपमान की चिन्ता नहीं होती है | वे उस आत्मतत्त्व में स्थित हो जाते हैं जहाँ न
 पतन है न उत्थान | उनको सदैव मिलते रहने वाले आनन्द में अब संसार के विषय न तो वृद्धि कर सकते हैं न अभाव | विषय-भोग उन महान् पुरुषों को आकर्षित करके अब बहका या भटका नहीं सकते | इसलिए अब उनके सम्मुख भले ही विषय-सामग्रियों का ढ़ेर लग जाये किन्तु उनकी चेतना इतनी जागृत होती है कि वे चाहें तो उनका उपयोग करें और चाहें तो ठुकरा दें |
      बाहरी विषयों की बात छोड़ो, अपने शरीर से भी उनका ममत्व टूट चुका होता है | शरीर रहे अथवा न रहे- इसमें भी उनका आग्रह नहीं रहता | ऐसे आनन्दस्वरूप में वे अपने-आपको हर समय अनुभव करते रहते हैं | ऐसी अवस्थावालों के लिये कबीर जी ने कहा है :
            साधो, सहज समाधि भली |
अपने को तोलें
      हम यदि ऐसी अवस्था में हैं तब तो ठीक है | अन्यथा ध्यान रहे, ऐसे तर्क की आड़ में हम अपने को धोखा देकर अपना ही पतन कर डालेंगे | जरा, अपनी अवस्था की तुलना उनकी अवस्था से करें | हम तो, कोई हमारा अपमान कर दे तो क्रोधित हो उठते हैं, बदला तक लेने को तैयार हो जाते हैं | हम लाभ-हानि में सम नहीं रहते हैं | राग-द्वेष हमारा जीवन है | ‘मेरा-तेरा’ भी वैसा ही बना हुआ है | ‘मेरा धन … मेरा मकान … मेरी
 पत्नी … मेरा पैसा … मेरा मित्र … मेरा बेटा … मेरी इज्जत … मेरा पद …’ ये सब सत्य भासते हैं कि नहीं ? यही तो देहभाव है, जीवभाव है | हम इससे ऊपर उठ कर व्यवहार कर सकते हैं क्या ? यह जरा सोचें |
      कई साधु लोग भी इस देहभाव से छुटकारा नहीं पा सके, सामान्य जन की तो बात ही क्या ? कई साधु भी ‘मैं स्त्रियों की तरफ देखता ही नहीं हूँ … मैं पैसे को छूता ही नहीं हूँ …’ इस प्रकार की अपनी-अपनी मन और बुद्धि की पकड़ों में उलझे हुए हैं | वे भी अपना जीवन अभी  सहज नहीं कर पाए हैं और हम … ?
      हम अपने साधारण जीवन को ही सहज जीवन का नाम देकर विषयों में पड़े रहना चाहते हैं | कहीं मिठाई देखी तो मुँह में पानी भर आया | अपने संबंधी और रिश्तेदारों को कोई दुःख हुआ तो भीतर से हम भी दुःखी होने लग गये | व्यापार में घाटा हुआ तो मुँह छोटा हो गया | कहीं अपने घर से ज्यादा दिन दूर रहे तो बार-बार अपने घरवालों की, पत्नी और पुत्रों की याद सताने लगी | ये कोई सहज जीवन के लक्षण हैं, जिसकी
 ओर ज्ञानी महापुरुषों का संकेत है ? नहीं |
मनोनिग्रह की महिमा  
      आज कल के नौजवानों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है | उन पर चारों ओर से विकारों को भड़काने वाले आक्रमण होते रहते हैं |
     एक तो वैसे ही अपनी पाशवी वृत्तियाँ यौन उच्छृंखलता की ओर प्रोत्साहित करती हैं और दूसरे, सामाजिक परिस्थितियाँ भी उसी ओर आकर्षण बढ़ाती हैं … इस पर उन प्रवृत्तियों को वौज्ञानिक समर्थन मिलने लगे और संयम को हानिकारक बताया जाने लगे … कुछ तथाकथित आचार्य भी फ्रायड जैसे नास्तिक एवं अधूरे मनोवैज्ञानिक के व्यभिचारशास्त्र को आधार बनाकर ‘संभोग से समाधि’ का उपदेश देने लगें तब
 तो ईश्वर ही ब्रह्मचर्य और दाम्पत्य जीवन की पवित्रता का रक्षक है |
     16 सितम्बर , 1977 के ‘न्यूयॉर्क टाइम्स में छ्पा था:
         “अमेरिकन पेनल कहती है कि अमेरिका में दो करोड़ से अधिक लोगों को मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है |”
      उपरोक्त परिणामों को देखते हुए अमेरिका के  एक महान् लेखक, सम्पादक और शिक्षा विशारद श्री मार्टिन ग्रोस अपनी पुस्तक ‘The Psychological Society’ में लिखते हैं : “हम जितना समझते हैं उससे कहीं ज्यादा फ्रायड के मानसिक रोगों ने हमारे मानस और समाज में गहरा प्रवेश पा लिया है | यदि हम इतना जान लें कि उसकी बातें प्रायः उसके विकृत मानस के ही प्रतिबिम्ब हैं और उसकी मानसिक विकृतियों वाले
    व्यक्तित्व को पहचान लें तो उसके विकृत प्रभाव से बचने में सहायता मिल सकती है | अब हमें डॉ. फ्रायड की छाया में बिल्कुल नहीं रहना चाहिए |”
      आधुनिक मनोविज्ञान का मानसिक विश्लेषण, मनोरोग शास्त्र और मानसिक रोग की चिकित्सा … ये फ्रायड के रुग्ण मन के प्रतिबिम्ब हैं | फ्रायड स्वयं स्फटिक कोलोन, प्रायः सदा रहने वाला मानसिक अवसाद, स्नायविक रोग, सजातीय सम्बन्ध, विकृत स्वभाव, माईग्रेन, कब्ज, प्रवास, मृत्यु और धननाश भय, साईनोसाइटिस, घृणा और खूनी विचारों के दौरे आदि रोगों से पीडित था |
            प्रोफेसर एडलर और प्रोफेसर सी. जी. जुंग जैसे मूर्धन्य मनोवैज्ञानिकों ने फ्रायड के सिद्धांतों का खंडन कर दिया है फिर भी यह खेद की बात है कि भारत में अभी भी कई मानसिक रोग विशेषज्ञ और सेक्सोलॉजिस्ट  फ्रायड जैसे पागल व्यक्ति के सिद्धांतों को आधार लेकर इस देश के जवानों को अनैतिक और अप्राकृतिक मैथुन (Sex) का, संभोग का उपदेश वर्त्तमान पत्रों और सामयोकों के द्वारा देते
 रहते हैं | फ्रायड ने तो मृत्यु के  पहले अपने पागलपन को स्वीकार किया था लेकिन उसके लेकिन उसके स्वयं स्वीकार न भी करें तो भी अनुयायी तो पागल के ही माने जायेंगे | अब वे इस देश के लोगों को चरित्रभ्रष्ट करने का और गुमराह करने का पागलपन छोड़ दें ऐसी हमारी नम्र प्रार्थना है | यह ‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक पाँच बार पढ़ें और पढ़ाएँ- इसी में सभी का कल्याण निहित है |
      आँकड़े बताते हैं कि आज पाश्चात्य देशों में यौन सदाचार की कितनी दुर्गति हुई है ! इस दुर्गति के परिणामस्वरूप वहाँ के निवासियों के व्यक्तिगत जीवन में रोग इतने बढ़ गये हैं कि भारत से 10 गुनी ज्यादा दवाइयाँ अमेरिका में खर्च होती हैं जबकि भारत की आबादी अमेरिका से तीन गुनी ज्यादा है | मानसिक रोग इतने बढ़े हैं कि हर दस अमेरिकन में से एक को मानसिक रोग होता है | दुर्वासनाएँ इतनी बढ़ी
 है कि हर छः सेकण्ड में एक बलात्कार होता है और हर वर्ष लगभग 20 लाख कन्याएँ विवाह के पूर्व ही गर्भवती हो जाती हैं | मुक्त साहचर्य (free sex)  का हिमायती होने के कारण शादी के पहले वहाँ का प्रायः हर व्यक्ति जातीय संबंध बनाने लगता है | इसी वजह से लगभग 65% शादियाँ तलाक में बदल जाती हैं | मनुष्य के लिये प्रकृति द्वारा निर्धारित किये गये संयम का उपहास करने के कारण प्रकृति ने उन लोगों को जातीय
 रोगों का शिकार बना रखा है | उनमें मुख्यतः एड्स (AIDS) की बीमारी दिन दूनी रात चौगुनी फैलती जा रही है | वहाँ के पारिवारिक व सामाजिक जीवन में क्रोध, कलह, असंतोष, संताप, उच्छृंखलता, उद्यंडता और शत्रुता का महा भयानक वातावरण छा गया है | विश्व की लगभग 4% जनसंख्या अमेरिका में है | उसके उपभोग के लिये विश्व की लगभग 40% साधन-सामग्री (जैसे कि कार, टी वी, वातानुकूलित मकान आदि) मौजूद हैं फिर भी वहाँ
 अपराधवृति इतनी बढ़ी है की हर 10 सेकण्ड में एक सेंधमारी होती है, हर लाख व्यक्तियों में से 425 व्यक्ति कारागार में सजा भोग रहे हैं जबकि भारत में हर लाख व्यक्ति में से केवल 23 व्यक्ति ही जेल की सजा काट रहे हैं  
    कामुकता के समर्थक फ्रायड जैसे दार्शनिकों की ही यह देन है कि जिन्होंने पश्चात्य देशों को मनोविज्ञान के नाम पर बहुत प्रभावित किया है और वहीं से यह आँधी अब इस देश में भी फैलती जा रही है | अतः इस देश की भी अमेरिका जैसी अवदशा हो, उसके पहले हमें सावधान रहना पड़ेगा | यहाँ के कुछ अविचारी दार्शनिक भी फ्रायड के मनोविज्ञान के आधार पर युवानों को बेलगाम संभोग की तरफ उत्साहित कर रहे
 हैं, जिससे हमारी युवापीढ़ी गुमराह हो रही है | फ्रायड ने तो केवल मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के आधार पर व्यभिचार शास्त्र बनाया लेकिन तथाकथित दार्शनिक ने तो ‘संभोग से समाधि’ की परिकल्पना द्वारा व्यभिचार को आध्यात्मिक जामा पहनाकर धार्मिक लोगों को भी भ्रष्ट किया है | संभोग से समाधि नहीं होती, सत्यानाश होता है | ‘संयम से ही समाधि होती है …’ इस भारतीय मनोविज्ञान को अब पाश्चात्य
 मनोविज्ञानी भी सत्य मानने लगे हैं |
      जब पश्चिम के देशों में ज्ञान-विज्ञान का विकास प्रारम्भ भी नहीं हुआ था और मानव ने संस्कृति के क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं किया था उस समय भारतवर्ष के दार्शनिक और योगी मानव मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं और समस्याओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर रहे थे | फिर भी पाश्चात्य विज्ञान की छ्त्रछाया में पले हुए और उसके प्रकाश से चकाचौंध वर्त्तमान भारत के मनोवैज्ञानिक भारतीय
 मनोविज्ञान का अस्तित्त्व तक मानने को तैयार नहीं हैं | यह खेद की बात है | भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने चेतना के चार स्तर माने हैं : जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय | पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक प्रथम तीन स्तर को ही जानते हैं | पाश्चात्य मनोविज्ञान नास्तिक है | भारतीय मनोविज्ञान ही आत्मविकास और चरित्र निर्माण में सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है क्योंकि यह धर्म से अत्यधिक प्रभावित
 है | भारतीय मनोविज्ञान आत्मज्ञान और आत्म सुधार में सबसे अधिक सहायक सिद्ध होता है | इसमें बुरी आदतों को छोड़ने और अच्छी आदतों को अपनाने तथा मन की प्रक्रियाओं को समझने तथा उसका नियंत्रण करने के महत्वपूर्ण उपाय बताये गये हैं | इसकी सहायता से मनुष्य सुखी, स्वस्थ और सम्मानित जीवन जी सकता है |
      पश्चिम की मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के आधार पर विश्वशांति का भवन खड़ा करना बालू की नींव पर भवन-निर्माण करने के समान है | पाश्चात्य मनोविज्ञान का परिणाम पिछले दो विश्वयुद्धों के रूप में दिखलायी पड़ता है | यह दोष आज पश्चिम के मनोवैज्ञानिकों की समझ में आ रहा है | जबकि भारतीय मनोविज्ञान मनुष्य का दैवी रूपान्तरण करके उसके विकास को आगे बढ़ाना चाहता है | उसके ‘अनेकता में एकता’
 के सिद्धांत पर ही संसार के विभिन्न राष्ट्रों, सामाजिक वर्गों, धर्मों और प्रजातियों में सहिष्णुता ही नहीं, सक्रिय सहयोग उत्पन्न किया जा सकता है | भारतीय मनोविज्ञान में शरीर और मन पर भोजन का क्या प्रभाव पड़ता है इस विषय से लेकर शरीर में विभिन्न चक्रों की स्थिति, कुण्डलिनी की स्थिति, वीर्य को ऊर्ध्वगामी बनाने की प्रक्रिया आदि विषयों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है |
 पाश्चात्य मनोविज्ञान मानव-व्यवहार का विज्ञान है | भारतीय मनोविज्ञान मानस विज्ञान के साथ-साथ आत्मविज्ञान है | भारतीय मनोविज्ञान इन्द्रियनियंत्रण पर विशेष बल देता है जबकि पाश्चात्य मनोविज्ञान केवल मानसिक क्रियाओं या मस्तिष्क-संगठन पर बल देता है | उसमें मन द्वारा मानसिक जगत का ही अध्ययन किया जाता है | उसमें भी प्रायड का मनोविज्ञान तो एक रुग्ण मन के द्वारा अन्य रुग्ण
 मनों का ही अध्ययन है जबकि भारतीय मनोविज्ञान में इन्द्रिय-निरोध से मनोनिरोध और मनोनिरोध से आत्मसिद्धि का ही लक्ष्य मानकर अध्ययन किया जाता है | पाश्चात्य मनोविज्ञान में मानसिक तनावों से मुक्ति का कोई समुचित साधन परिलक्षित नहीं होता जो उसके व्यक्तित्व में निहित निषेधात्मक परिवेशों के लिए स्थायी निदान प्रस्तुत कर सके | इसलिए प्रायड के लाखों बुद्धिमान अनुयायी भी पागल
 हो गये | संभोग के मार्ग पर चलकर कोई भी व्यक्ति योगसिद्ध महापुरुष नहीं हुआ | उस मार्ग पर चलनेवाले पागल हुए हैं | ऐसे कई नमूने हमने देखे हैं | इसके विपरीत भारतीय मनोविज्ञान में मानसिक तनावों से मुक्ति के विभिन्न उपाय बताये गये हैं यथा योगमार्ग, साधन-चतुष्टय, शुभ-संस्कार, सत्संगति, अभ्यास, वैराग्य, ज्ञान, भक्ति, निष्काम कर्म आदि | इन साधनों के नियमित अभ्यास से संगठित एवं
 समायोजित व्यक्तित्व का निर्माण संभव है | इसलिये भारतीय मनोविज्ञान के अनुयायी पाणिनि और महाकवि कालिदास जैसे प्रारम्भ में अल्पबुद्धि होने पर भी महान विद्वान हो गये | भारतीय मनोविज्ञान ने इस विश्व को हजारों महान भक्त समर्थ योगी तथा ब्रह्मज्ञानी महापुरुष दिये हैं |
अतः पाशचात्य मनोविज्ञान को छोड़कर भारतीय मनोविज्ञान का आश्रय लेने में ही व्यक्ति, कुटुम्ब, समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण निहित है |
भारतीय मनोविज्ञान पतंजलि के सिद्धांतों पर चलनेवाले हजारों योगासिद्ध महापुरुष इस देश में हुए हैं, अभी भी हैं और आगे भी होते रहेंगे जबकि संभोग के मार्ग पर चलकर कोई योगसिद्ध महापुरुष हुआ हो ऐसा हमने तो नहीं सुना बल्कि दुर्बल हुए, रोगी हुए, एड़स के शिकार हुए, अकाल मृत्यु के शिकार हुए, खिन्न मानस हुए, अशांत हुए | उस मार्ग पर चलनेवाले पागल हुए हैं, ऐसे कई नमूने हमने देखे हैं |
 फ्रायड ने अपनी मनःस्थिति की तराजू पर सारी दुनिया के लोगों को तौलने की गलती की है | उसका अपना जीवन-क्रम कुछ बेतुके ढ़ंग से विकसित हुआ है | उसकी माता अमेलिया बड़ी खूबसूरत थी | उसने योकोव नामक एक अन्य पुरुष के साथ अपना दूसरा विवाह किया था | जब फ्रायड जन्मा तब वह २१ वर्ष की थी | बच्चे को वह बहुत प्यार करती थी |
     ये घटनाएँ फ्रायड ने स्वयं लिखी हैं | इन घटनाओं के अधार पर फ्रायड कहता है: “पुरुष बचपन से ही ईडिपस कॉमप्लेक्स (Oedipus Complex) अर्थात अवचेतन मन में अपनी माँ के प्रति यौन-आकांक्षा से आकर्षित होता है तथा अपने पिता के प्रति यौन-ईर्ष्या से ग्रसित रहता है | ऐसे ही लड़की अपने बाप के प्रति आकर्षित होती है तथा अपनी माँ से ईर्ष्या करती है | इसे इलेक्ट्रा कोऊम्प्लेक्स (Electra Complex) कहते हैं | तीन
 वर्ष की आयु से ही बच्चा अपनी माँ के साथ यौन-सम्बन्ध स्थापित करने के लिये लालायित रहता है | एकाध साल के बाद जब उसे पता चलता है कि उसकी माँ के साथ तो बाप का वैसा संबंध पहले से ही है तो उसके मन में बाप के प्रति ईर्ष्या और घृणा जाग पड़ती है | यह विद्वेष उसके अवचेतन मन में आजीवन बना रहता है | इसी प्रकार लड़की अपने बाप के प्रति सोचती है और माँ से ईर्ष्या करती है |"
 फ्रायड आगे कहता है: "इस मानसिक अवरोध के कारण मनुष्य की गति रुक जाती है | 'ईडिपस कोऊम्प्लेक्स' उसके सामने तरह-तरह के अवरोध खड़े करता है | यह स्थिति कोई अपवाद नहीं है वरन साधारणतया यही होता है |
 यह कितना घृणित और हास्यास्पद प्रतिपादन है ! छोटा बच्चा यौनाकांक्षा से पीडित होगा, सो भी अपनी माँ के प्रति ? पशु-पक्षियों के बच्चे के शरीर में भी वासना तब उठती है जब उनके शरीर प्रजनन के योग्य सुदृढ हो जाते हैं | ... तो मनुष्य के बालक में यह वृत्ति इतनी छोटी आयु में कैसे पैदा हो सकती है ? ... और माँ के साथ वैसी तृप्ति करने कि उसकी शारिरिक-मानसिक स्थिति भी नहीं होती | फिर तीन वर्ष के
 बालक को काम-क्रिया और माँ-बाप के रत रहने की जानकारी उसे कहाँ से हो जाती है ? फिर वह यह कैसे समझ लेता है कि उसे बाप से ईर्ष्या करनी चाहिए ?
       बच्चे द्वारा माँ का दूध पीने की क्रिया को ऐसे मनोविज्ञानियों ने रतिसुख के समकक्ष बतलाया है | यदि इस स्तनपान को रतिसुख माना जाय तब तो आयु बढ़ने के साथ-साथ यह उत्कंठा भी प्रबलतर होती जानी चाहिए और वयस्क होने तक बालक को माता का दूध ही पीते रहना चाहिए | किन्तु यह किस प्रकार संभव है ?
... तो ये ऐसे बेतुके प्रतिपादन हैं कि जिनकी भर्त्सना ही की जानी चाहिए | फ्रायड ने अपनी मानसिक विकृतियों को जनसाधारण पर थोपकर मनोविज्ञान को विकृत बना दिया |
 जो लोग मानव समाज को पशुता में गिराने से बचाना चाहते हैं, भावी पीढ़ी का जीवन पिशाच होने से बचाना चाहते हैं, युवानों का शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता और बौद्धिक सामर्थ्य बनाये रखना चाहते हैं, इस देश के नागरिकों को एडस (AIDS) जैसी घातक बीमारियों से ग्रस्त होने से रोकना चाहते हैं, स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहते हैं उन सबका यह नैतिक कर्त्त्व्य है कि वे हमारी गुमराह युवा
 पीढ़ी को 'यौवन सुरक्षा' जैसी पुस्तकें पढ़ायें |
यदि काम-विकार उठा और हमने 'यह ठीक नहीं है ... इससे मेरे बल-बुद्धि और तेज का नाश होगा ...' ऐसा समझकर उसको टाला नहीं और उसकी पूर्ति में लम्पट होकर लग गये, तो हममें और पशुओं में अंतर ही क्या रहा ? पशु तो जब उनकी कोई विशेष ऋतु होती है तभी मैथुन करते हैं, बाकी ऋतुओं में नहीं | इस दृष्टि से उनका जीवन सहज व प्राकृतिक ढ़ंग का होता है | परंतु मनुष्य ... !
 मनुष्य तो बारहों महीने काम-क्रिया की छूट लेकर बैठा है और ऊपर से यह भी कहता है कि यदि काम-वासना की पूर्ति करके सुख नहीं लिया तो फिर ईश्वर ने मनुष्य में जो इसकी रचना की है, उसका क्या मतलब ? ... आप अपने को विवेकपूर्ण रोक नहीं पाते हो, छोटे-छोटे सुखों में उलझ जाते हो- इसका तो कभी ख्याल ही नहीं करते और ऊपर से भगवान तक को अपने पापकर्मों में भागीदार बनाना चाहते हो ?
आत्मघाती तर्क
      अभी कुछ समय पूर्व मेरे पास एक पत्र आया | उसमें एक व्यक्ति ने पूछा था: “आपने सत्संग में कहा और एक पुस्तिका में भी प्रकाशित हुआ कि : ‘बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू आदि मत पियो | ऐसे व्यसनों से बचो, क्योंकि ये तुम्हारे बल और तेज का हरण करते हैं …’ यदि ऐसा ही है तो भगवान ने तम्बाकू आदि पैदा ही क्यों किया ?”
      अब उन सज्जन से ये व्यसन तो छोड़े नहीं जाते और लगे हैं भगवान के पीछे | भगवान ने गुलाब के साथ काँटे भी पैदा किये हैं | आप फूल छोड़कर काँटे तो नहीं तोड़ते ! भगवान ने आग भी पैदा की है | आप उसमें भोजन पकाते हो, अपना घर तो नहीं जलाते ! भगवान ने आक (मदार), धतूरे, बबूल आदि भी बनाये हैं, मगर उनकी तो आप सब्जी नहीं बनाते ! इन सब में तो आप अपनी बुद्धि का उपयोग करके व्यवहार करते हो और जहाँ आप हार
 जाते हो, जब आपका मन आपके कहने में नहीं होता। तो आप लगते हो भगवान को दोष देने ! अरे, भगवान ने तो बादाम-पिस्ते भी पैदा किये हैं, दूध भी पैदा किया है | उपयोग करना है तो इनका करो, जो आपके बल और बुद्धि की वृद्धि करें | पैसा ही खर्चना है तो इनमें खर्चो | यह तो होता नहीं और लगें हैं तम्बाकू के पीछे | यह बुद्धि का सदुपयोग नहीं है, दुरुपयोग है | तम्बाकू पीने  से तो बुद्धि और भी कमजोर हो जायेगी |
      शरीर के बल बुद्धि की सुरक्षा के लिये वीर्यरक्षण बहुत आवश्यक है | योगदर्शन के ‘साधपाद’ में ब्रह्मचर्य की महत्ता इन शब्दों में बतायी गयी है :
           ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ||37||
     ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है |
स्त्री प्रसंग कितनी बार ?
      फिर भी यदि कोई जान-बूझकर अपने सामर्थ्य को खोकर श्रीहीन बनना चाहता हो तो यह यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात के इन प्रसिद्ध वचनों को सदैव याद रखे | सुकरात से एक व्यक्ति ने पूछा :
“पुरुष के लिए कितनी बार स्त्री-प्रसंग करना उचित है ?”
“जीवन भर में केवल एक बार |”
“यदि इससे तृप्ति न हो सके तो ?”
“तो वर्ष में एक बार |”
“यदि इससे भी संतोष न हो तो ?”
“फिर महीने में एक बार |”
इससे भी मन न भरे तो ?”
“तो महीने में दो बार करें, परन्तु मृत्यु शीघ्र आ जायेगी |”
“इतने पर भी इच्छा बनी रहे तो क्या करें ?”
इस पर सुकरात ने कहा :
“तो ऐसा करें कि पहले कब्र खुदवा लें, फिर कफन और लकड़ी घर में लाकर तैयार रखें | उसके पश्चात जो इच्छा हो, सो करें |”
सुकरात के ये वचन सचमुच बड़े प्रेरणाप्रद हैं | वीर्यक्षय के द्वारा जिस-जिसने भी सुख लेने का प्रयास किया है, उन्हें घोर निराशा हाथ लगी है और अन्त में श्रीहीन होकर मृत्यु का ग्रास बनना पड़ा है | कामभोग द्वारा कभी तृप्ति नहीं होती और अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ चला जाता है | राजा ययाति की कथा तो आपने सुनी होगी |
राजा ययाति का अनुभव
      शुक्राचार्य के शाप से राजा ययाति युवावस्था में ही वृद्ध हो गये थे | परन्तु बाद में ययाति के प्रार्थना करने पर शुक्राचार्य ने दयावश उनको यह शक्ति दे दी कि वे चाहें तो अपने पुत्रों से युवावस्था लेकर अपना वार्धक्य उन्हें दे सकते थे | तब ययाति ने अपने पुत्र यदु, तर्वसु, द्रुह्यु और अनु से उनकी जवानी माँगी, मगर वे राजी न हुए | अंत में छोटे पुत्र पुरु ने अपने पिता को अपना यौवन
 देकर उनका बुढ़ापा ले लिया |
      पुनः युवा होकर ययाति ने फिर से भोग भोगना शुरु किया | वे नन्दनवन में विश्वाची नामक अप्सरा के साथ रमण करने लगे | इस प्रकार एक हजार वर्ष तक  भोग भोगने के बाद भी भोगों से जब वे संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने अपना बचा हुआ यौवन अपने पुत्र पुरु को लौटाते हुए कहा :
                न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति |
                हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ||
“पुत्र ! मैंने तुम्हारी जवानी लेकर अपनी रुचि, उत्साह और समय के अनुसार विष्यों का सेवन किया लेकिन विषयों की कामना उनके उपभोग से कभी शांत नहीं होती, अपितु घी की आहुति पड़ने पर अग्नि की भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती  ही  जाती है |
      रत्नों से जड़ी हुई सारी पृथ्वी, संसार का सारा सुवर्ण, पशु और सुन्दर स्त्रियाँ, वे सब एक पुरुष को मिल जायें तो भी वे सबके सब उसके लिये पर्याप्त नहीं होंगे | अतः तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए
      छोटी बुद्धिवाले लोगों के लिए जिसका त्याग करना अत्यंत कठिन है, जो मनुष्य के बूढ़े होने पर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो एक प्राणान्तक रोग है उस तृष्णा को त्याग देनेवाले पुरुष को ही सुख मिलता है |”  (महाभारत : आदिपर्वाणि संभवपर्व : 12)
   ययाति का अनुभव वस्तुतः बड़ा मार्मिक और मनुष्य जाति ले लिये हितकारी है | ययाति आगे कहते हैं :
      “पुत्र ! देखो, मेरे एक हजार वर्ष विषयों को भोगने में बीत गये तो भी तृष्णा शांत नहीं होती और आज भी प्रतिदिन उन विषयों के लिये ही तृष्णा पैदा होती है |
                पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः |
                तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वभिजायते ||
      इसलिए पुत्र ! अब मैं विषयों को छोड़कर ब्रह्माभ्यास में मन लगाऊँगा | निर्द्वन्द्व तथा ममतारहित होकर वन में मृगों के साथ विचरूँगा | हे पुत्र ! तुम्हारा भला हो | तुम पर मैं प्रसन्न हूँ | अब तुम अपनी जवानी पुनः प्राप्त करो और मैं यह राज्य भी तुम्हें ही  अर्पण करता हूँ |
      इस प्रकार अपने पुत्र पुरु को राज्य देकर ययाति ने तपस्या हेतु वनगमन किया | उसी राजा पुरु से पौरव वंश चला | उसी वंश में परीक्षित का पुत्र राजा जन्मेजय पैदा हुआ था |
राजा मुचकन्द का प्रसंग
      राजा मुचकन्द गर्गाचार्य के दर्शन-सत्संग के फलस्वरूप भगवान का दर्शन पाते हैं | भगवान से स्तुति करते हुए वे कहते हैं :
      “प्रभो ! मुझे आपकी दृढ़ भक्ति दो |”
      तब भगवान कहते हैं : “तूने जवानी में खूब भोग भोगे हैं, विकारों में खूब डूबा है | विकारी जीवन जीनेवाले को दृढ़ भक्ति नहीं मिलती | मुचकन्द ! दृढ़ भक्ति के लिए जीवन में संयम बहुत जरूरी है | तेरा यह क्षत्रिय शरीर समाप्त होगा तब दूसरे जन्म में तुझे दृढ़ भक्ति प्राप्त होगी |”
     वही राजा मुचकन्द कलियुग में नरसिंह मेहता हुए |
   जो लोग अपने जीवन में वीर्यरक्षा को महत्व नहीं देते, वे जरा सोचें कि कहीं वे भी राजा ययाति का तो अनुसरण नहीं कर रहे हैं ! यदि कर रहे हों तो जैसे ययाति सावधान हो गये, वैसे आप भी सावधान हो जाओ भैया ! हिम्मत करो | सयाने हो जाओ | दया करो | हम पर दया न करो तो अपने-आप पर तो दया करो भैया ! हिम्मत करो भैया ! सयाने हो जाओ मेरे प्यारे ! जो हो गया उसकी चिन्ता न करो | आज से नवजीवन का प्रारंभ करो |
 ब्रह्मचर्यरक्षा के आसन, प्राकृतिक औषधियाँ इत्यादि जानकर वीर बनो | ॐ … ॐ … ॐ …
गलत अभ्यास का दुष्परिणाम
      आज संसार में कितने ही ऐसे  अभागे लोग हैं, जो शृंगार रस की पुस्तकें पढ़कर, सिनेमाओं के कुप्रभाव के शिकार होकर स्वप्नावस्था या जाग्रतावस्था में अथवा तो हस्तमैथुन द्वारा सप्ताह में कितनी बार वीर्यनाश कर लेते हैं | शरीर और मन को ऐसी आदत डालने से वीर्याशय बार-बार खाली होता रहता है | उस वीर्याशय को भरने में ही शारीरिक शक्ति का अधिकतर भाग व्यय होने लगता है, जिससे शरीर को
 कांतिमान् बनाने वाला ओज संचित ही नहीं हो पाता और व्यक्ति शक्तिहीन, ओजहीन और उत्साहशून्य बन जाता है | ऐसे व्यक्ति  का  वीर्य  पतला  पड़ता  जाता है | यदि वह समय पर अपने को सँभाल नहीं सके तो शीघ्र  ही वह स्थिति आ जाती है कि उसके अण्डकोश वीर्य बनाने में असमर्थ हो जाते हैं | फिर भी यदि थोड़ा बहुत वीर्य बनता है तो वह भी पानी जैसा ही बनता है जिसमें सन्तानोत्पत्ति की ताकत नहीं होती |
 उसका जीवन जीवन नहीं रहता | ऐसे व्यक्ति की हालत मृतक पुरुष जैसी हो जाती है | सब प्रकार के रोग उसे घेर लेते हैं | कोई दवा उस पर असर नहीं कर पाती | वह व्यक्ति जीते जी नर्क का दुःख भोगता रहता है | शास्त्रकारों ने लिखा है :
           आयुस्तेजोबलं वीर्यं प्रज्ञा श्रीश्च महदयशः |
           पुण्यं च प्रीतिमत्वं च हन्यतेऽब्रह्मचर्या ||
     ‘आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, यश तथा पुण्य और प्रीति ये सब ब्रह्मचर्य का पालन न करने से नष्ट हो जाते हैं |’

वीर्यरक्षण सदैव स्तुत्य
      इसीलिए वीर्यरक्षा स्तुत्य है | ‘अथर्ववेद में कहा गया है :
अति सृष्टो अपा वृषभोऽतिसृष्टा अग्नयो दिव्या ||1||
इदं तमति सृजामि तं माऽभ्यवनिक्षि ||2||
      अर्थात् ‘शरीर में व्याप्त वीर्य रूपी जल को बाहर ले जाने वाले, शरीर से अलग कर देने वाले काम को मैंने परे हटा दिया है | अब मैं इस काम को अपने से सर्वथा दूर फेंकता हूँ | मैं इस आरोग्यता, बल-बुद्धिनाशक काम का कभी शिकार नहीं होऊँगा |’
      … और इस प्रकार के संकल्प से अपने जीवन का निर्माण न करके जो व्यक्ति वीर्यनाश करता रहता  है, उसकी क्या गति होगी, इसका भी ‘अथर्ववेद’ में उल्लेख आता है :
रुजन् परिरुजन् मृणन् परिमृणन् |
म्रोको मनोहा खनो निर्दाह आत्मदूषिस्तनूदूषिः ||
यह काम रोगी बनाने वाला है, बहुत बुरी तरह रोगी करने वाला है | मृणन् यानी मार देने वाला है | परिमृणन् यानी बहुत बुरी तरह मारने वाला है |यह टेढ़ी चाल चलता है, मानसिक शक्तियों को नष्ट कर देता है | शरीर में से स्वास्थ्य, बल, आरोग्यता आदि को खोद-खोदकर बाहर फेंक देता है | शरीर की सब धातुओं को जला देता है | आत्मा को मलिन कर देता है | शरीर के वात, पित्त, कफ को दूषित करके उसे तेजोहीन बना देता है |
    ब्रह्मचर्य के बल से ही अंगारपर्ण जैसे बलशाली गंधर्वराज को अर्जुन ने पराजित कर दिया था |
अर्जुन और अंगारपर्ण गंधर्व
      अर्जुन अपने भाईयों सहित द्रौपदी के स्वंयवर-स्थल पांचाल देश की ओर जा रहा था, तब बीच में गंगा तट पर बसे सोमाश्रयाण तीर्थ में गंधर्वराज अंगारपर्ण (चित्ररथ) ने उसका रास्ता रोक दिया | वह गंगा में अपनी स्त्रियों के साथ जलक्रिड़ा कर रहा था | उसने पाँचों पांडवों को कहा : “मेरे यहाँ रहते हुए राक्षस, यक्ष, देवता अथवा मनुष्य कोई भी इस मार्ग से नहीं जा सकता | तुम लोग जान की खैर चाहते
 होतो लौट जाओ | तब अर्जुन कहता है :
      “मैं जानता हूँ कि सम्पूर्ण गंधर्व मनुष्यों से अधिक शक्तिशाली होते हैं, फिर भी मेरे आगे तुम्हारी दाल नहीं गलेगी | तुम्हें जो करना हो सो करो, हम तो इधर से ही जायेंगे |”
      अर्जुन के इस प्रतिवाद से गंधर्व बहुत क्रोधित हुआ और उसने पांडवों पर तीक्ष्ण बाण छोड़े | अर्जुन ने अपने हाथ में जो जलती हुई मशाल पकड़ी थी, उसीसे उसके सभी बाणों को निष्फल कर दिया | फिर गंधर्व पर आग्नेय अस्त्र चला दिया | अस्त्र के तेज से गंधर्व का रथ जलकर भस्म हो गया और वह स्वंय घायल एवं अचेत होकर मुँह के बल गिर पड़ा | यह देखकर उस गंधर्व की पत्नी कुम्मीनसी बहुत घबराई और अपने पति
 की रक्षार्थ युधिष्ठिर से प्रार्थना करने लगी | तब युधिष्ठिर ने अर्जुन से उस गंधर्व को अभयदान दिलवाया |
      जब वह  अंगारपर्ण होश में आया तब बोला ;
      “अर्जुन ! मैं परास्त हो गया, इसलिए अपने पूर्व नाम अंगारपर्ण को छोड़ देता हूँ  | मैं अपने विचित्र रथ के कारण चित्ररथ कहलाता था | वह रथ भी आपने अपने पराक्रम से दग्ध कर दिया है | अतः अब मैं दग्धरथ कहलाऊँगा |
      मेरे पास चाक्षुषी नामक विद्या है जिसे मनु ने सोम को, सोम ने विश्वावसु को और विश्वावसु ने मुझे प्रदान की है | यह गुरु की विद्या यदि किसी कायर को मिल जाय तो नष्ट हो जाती है | जो छः महीने तक एक पैर पर खड़ा रहकर तपस्या करे, वही इस विद्या को पा सकता है | परन्तु अर्जुन ! मैं आपको ऐसी तपस्या के बिना ही यह विद्या प्रदान करता हूँ |
      इस विद्या की विशेषता यह है कि तीनों लोकों में कहीं भी स्थित किसी वस्तु को आँख से देखने की इच्छा हो तो उसे उसी रूप में इस विद्या के प्रभाव से कोई भी व्यक्ति देख सकता है | अर्जुन ! इस विद्या के बल पर हम लोग मनुष्यों से श्रेष्ठ माने जाते हैं और देवताओं के तुल्य प्रभाव दिखा सकते हैं |”
      इस प्रकार अंगारपर्ण ने अर्जुन को चाक्षुषी विद्या, दिव्य घोड़े एवं अन्य वस्तुएँ भेंट कीं |
    अर्जुन ने गंधर्व से पूछा : गंधर्व ! तुमने हम पर एकाएक आक्रमण क्यों किया और फिर हार क्यों गये ?”
    तब गंधर्व ने बड़ा मर्मभरा उत्तर दिया | उसने कहा :
      “शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर ! यदि कोई कामासक्त क्षत्रिय रात में मुझसे युद्ध करने आता तो किसी भी प्रकार जीवित नहीं बच सकता था क्योंकि रात में हम लोगों का बल और भी बढ़ जाता है |
      अपने बाहुबल का भरोसा रखने वाला कोई भी पुरुष जब अपनी स्त्री के सम्मुख किसीके द्वारा अपना तिरस्कार होते देखता है तो सहन नहीं कर पाता | मैं जब अपनी स्त्री के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था, तभी आपने मुझे ललकारा, इसीलिये मैं क्रोधाविष्ट हुआ और आप पर बाणवर्षा की | लेकिन यदि आप यह पूछो कि मैं आपसे पराजित क्यों हुआ तो उसका उत्तर है :
 ब्रह्मचर्यं परो धर्मः स चापि नियतस्व्तयि |
यस्मात् तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मि विजितस्त्वया ||
     “ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा धर्म है और वह आपमें निश्चित रूप से विद्यमान है | हे कुन्तीनंदन ! इसीलिये युद्ध में मैं आपसे हार गया हूँ |”
                       (महाभारत : आदिपर्वणि चैत्ररथ पर्व : 71)
 हम समझ गये कि वीर्यरक्षण अति आवश्यक है | अब वह कैसे हो इसकी चर्चा करने से पूर्व एक बार ब्रह्मचर्य का तात्त्विक अर्थ ठीक से समझ लें |
 
ब्रह्मचर्य का तात्त्विक अर्थ
      ‘ब्रह्मचर्य’ शब्द बड़ा चित्ताकर्षक और पवित्र शब्द है | इसका स्थूल अर्थ तो यही प्रसिद्ध है कि  जिसने शादी नहीं की है, जो काम-भोग नहीं करता है, जो स्त्रियों से दूर रहता है आदि-आदि | परन्तु यह बहुत सतही और सीमित अर्थ है | इस अर्थ में केवल वीर्यरक्षण ही ब्रह्मचर्य है | परन्तु ध्यान रहे, केवल वीर्यरक्षण मात्र साधना है, मंजिल नहीं | मनुष्य जीवन का लक्ष्य है अपने-आपको जानना अर्थात् आत्म-साक्षात्कार करना | जिसने आत्म-साक्षात्कार कर लिया, वह जीवन्मुक्त हो गया | वह आत्मा के आनन्द में, ब्रह्मानन्द में विचरण करता है | उसे अब संसार से कुछ पाना शेष नहीं रहा | उसने आनन्द का स्रोत अपने भीतर ही पा लिया | अब वह आनन्द के लिये किसी भी बाहरी विषय पर निर्भर नहीं है | वह पूर्ण स्वतंत्र है | उसकी क्रियाएँ सहज होती हैं | संसार के विषय उसकी आनन्दमय आत्मिक स्थिति को डोलायमान नहीं कर सकते | वह संसार के तुच्छ विषयों की पोल को समझकर अपने आनन्द में मस्त हो इस भूतल पर विचरण करता है | वह चाहे लँगोटी में हो चाहे बहुत से कपड़ों में, घर में रहता हो चाहे झोंपड़े में, गृहस्थी चलाता हो चाहे एकान्त जंगल में विचरता हो, ऐसा महापुरुष ऊपर से भले कंगाल नजर आता हो, परन्तु भीतर से शहंशाह होता है, क्योंकि उसकी सब वासनाएँ, सब कर्त्तव्य पूरे हो चुके हैं | ऐसे व्यक्ति को, ऐसे महापुरुष को वीर्यरक्षण करना नहीं पड़ता,  सहज ही होता है | सब व्यवहार करते हुए भी उनकी हर समय समाधि रहती है | उनकी समाधि सहज होती है, अखण्ड होती है | ऐसा महापुरुष ही सच्चा ब्रह्मचारी होता है, क्योंकि वह सदैव अपने ब्रह्मानन्द में अवस्थित रहता है |
      स्थूल अर्थ में ब्रह्मचर्य का अर्थ जो वीर्यरक्षण समझा जाता है, उस अर्थ में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ व्रत है, श्रेष्ठ तप है, श्रेष्ठ साधना है और इस साधना का फल है आत्मज्ञान, आत्म-साक्षात्कार | इस फलप्राप्ति के साथ ही ब्रह्मचर्य का पूर्ण अर्थ प्रकट हो जाता है |
      जब तक किसी भी प्रकार की वासना शेष है, तब तक कोई पूर्ण ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं हो सकता | जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक पूर्ण रूप से वासना निवृत्त नहीं होती | इस वासना की निवृत्ति के लिये, अंतःकरण की शुद्धि के लिये, ईश्वर की प्राप्ति के लिये, सुखी जीवन जीने के लिये, अपने मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये या कहो परमानन्द की प्राप्ति के लिये… कुछ भी हो, वीर्यरक्षणरूपी साधना सदैव अब अवस्थाओं में उत्तम है, श्रेष्ठ है और आवश्यक है |
      वीर्यरक्षण कैसे हो, इसके लिये यहाँ हम कुछ स्थूल और सूक्ष्म उपायों की चर्चा करेंगे |
   वीर्यरक्षा के उपाय
सादा रहन-सहन बनायें
      काफी लोगों को यह भ्रम है कि जीवन तड़क-भड़कवाला बनाने से वे समाज में विशेष माने जाते हैं | वस्तुतः ऐसी बात नहीं है | इससे तो केवल अपने अहंकार का ही प्रदर्शन होता है | लाल रंग के भड़कीले एवं रेशमी कपड़े नहीं पहनो | तेल-फुलेल और भाँति-भाँति के इत्रों का प्रयोग करने से बचो | जीवन में जितनी तड़क-भड़क बढ़ेगी, इन्द्रियाँ उतनी चंचल हो उठेंगी, फिर वीर्यरक्षा तो दूर की बात है |
      इतिहास पर भी हम दृष्टि डालें तो महापुरुष हमें ऐसे ही मिलेंगे, जिनका जीवन  प्रारंभ से ही सादगीपूर्ण था | सादा रहन-सहन तो बडप्पन का द्योतक है | दूसरों को देख कर उनकी अप्राकृतिक व अधिक आवश्यकताओंवाली जीवन-शैली का अनुसरण नहीं करो |
उपयुक्त आहार
      ईरान के बादशाह वहमन ने एक श्रेष्ठ वैद्य से पूछा :
      “दिन में मनुष्य को कितना खाना चाहिए?”
      “सौ दिराम (अर्थात् 31 तोला) | “वैद्य बोला |
      “इतने से क्या होगा?” बादशाह ने फिर पूछा |
      वैद्य ने कहा : “शरीर के पोषण के लिये इससे अधिक नहीं चाहिए | इससे अधिक जो कुछ खाया जाता है, वह केवल बोझा ढोना है और आयुष्य खोना है |”
      लोग स्वाद के लिये अपने पेट के साथ बहुत अन्याय करते हैं, ठूँस-ठूँसकर खाते हैं | यूरोप का एक बादशाह स्वादिष्ट पदार्थ खूब खाता था | बाद में औषधियों द्वारा उलटी करके फिर से स्वाद लेने के लिये भोजन करता  रहता था | वह जल्दी मर गया |
      आप स्वादलोलुप नहीं बनो | जिह्वा को नियंत्रण में रखो | क्या खायें, कब खायें, कैसे खायें  और  कितना खायें इसका विवेक नहीं रखा तो पेट खराब होगा, शरीर को रोग घेर लेंगे, वीर्यनाश को प्रोत्साहन मिलेगा और अपने को पतन के रास्ते जाने से नहीं रोक सकोगे |
      प्रेमपूर्वक, शांत मन से, पवित्र स्थान पर बैठ कर भोजन करो | जिस समय नासिका का दाहिना स्वर (सूर्य नाड़ी) चालू हो उस समय किया भोजन शीघ्र पच जाता है, क्योंकि उस समय जठराग्नि बड़ी प्रबल होती है | भोजन के समय यदि दाहिना स्वर चालू नहीं हो तो उसको चालू कर दो | उसकी विधि यह है : वाम कुक्षि में अपने दाहिने हाथ की मुठ्ठी रखकर कुक्षि को जोर से दबाओ या बाँयी (वाम) करवट लेट जाओ | थोड़ी ही देर में दाहिना याने सूर्य स्वर चालू हो जायेगा |
      रात्रि को बाँयी करवट लेटकर ही सोना चाहिए | दिन में सोना उचित नहीं किन्तु यदि सोना आवश्यक हो तो दाहिनी करवट ही लेटना चाहिए |
      एक बात का खूब ख्याल रखो | यदि पेय पदार्थ लेना हो तो जब चन्द्र (बाँया) स्वर चालू हो तभी लो | यदि सूर्य (दाहिना) स्वर चालू हो और आपने दूध, काफी, चाय, पानी या कोई भी पेय पदार्थ लिया तो वीर्यनाश होकर रहेगा | खबरदार ! सूर्य स्वर चल रहा हो तब कोई भी पेय पदार्थ न पियो | उस समय यदि पेय पदार्थ पीना पड़े तो दाहिना नथुना बन्द करके बाँये नथुने से श्वास लेते हुए ही पियो |
      रात्रि को भोजन कम करो | भोजन हल्का-सुपाच्य हो | बहुत गर्म-गर्म और देर से पचने वाला गरिष्ठ भोजन रोग पैदा करता है | अधिक पकाया हुआ, तेल में तला हुआ, मिर्च-मसालेयुक्त, तीखा, खट्टा, चटपटेदार भोजन वीर्यनाड़ियों को क्षुब्ध करता है | अधिक गर्म भोजन और गर्म चाय से दाँत कमजोर होते हैं | वीर्य भी पतला पड़ता है |
      भोजन खूब चबा-चबाकर करो | थके हुए हो तो तत्काल भोजन न करो | भोजन के तुरंत बाद परिश्रम न करो |
      भोजन के पहले पानी न पियो | भोजन के बीच में तथा भोजन के एकाध घंटे के बाद पानी पीना हितकर होता  है |
      रात्रि को संभव हो तो फलाहार लो | अगर भोजन लेना पड़े तो अल्पाहार ही करो | बहुत रात गये भोजन या फलाहार करना हितावह नहीं है | कब्ज की शिकायत हो तो 50 ग्राम लाल फिटकरी तवे पर फुलाकर, कूटकर, कपड़े से छानकर बोतल में भर लो | रात्रि में 15 ग्राम  सौंफ एक गिलास पानी में भिगो दो | सुबह उसे उबाल कर छान लो और ड़ेढ़ ग्राम फिटकरी का पाउडर मिलाकर पी लो | इससे कब्ज व बुखार भी दूर होता है | कब्ज तमाम बिमारियों की जड़ है | इसे दूर करना आवश्यक है  
      भोजन में पालक, परवल, मेथी, बथुआ आदि हरी तरकारियाँ, दूध, घी, छाछ, मक्खन, पके हुए फल आदि विशेष रूप से लो | इससे जीवन में सात्त्विकता बढ़ेगी | काम, क्रोध, मोह आदि विकार घटेंगे | हर कार्य में प्रसन्नता और उत्साह बना रहेगा |
      रात्रि में सोने से पूर्व गर्म-गर्म दूध नहीं पीना चाहिए | इससे रात को स्वप्नदोष हो जाता है |
      कभी भी मल-मूत्र की शिकायत हो तो उसे रोको नहीं | रोके हुए मल से भीतर की नाड़ियाँ क्षुब्ध होकर वीर्यनाश कराती हैं |
      पेट में कब्ज होने से ही  अधिकांशतः रात्रि को वीर्यपात हुआ करता है | पेट में रुका हुआ मल वीर्यनाड़ियों पर दबाव डालता है तथा कब्ज की गर्मी से ही नाड़ियाँ क्षुभित होकर वीर्य को बाहर धकेलती हैं | इसलिये पेट को साफ रखो | इसके लिये कभी-कभी त्रिफला चूर्ण या ‘संतकृपा चूर्ण’ या ‘इसबगुल’ पानी के साथ लिया करो | अधिक तिक्त, खट्टी, चरपरी और बाजारू औषधियाँ उत्तेजक होती हैं, उनसे बचो | कभी-कभी उपवास करो | पेट को आराम देने के लिये कभी-कभी निराहार भी रह सकते हो तो अच्छा है |
आहारं पचति शिखी दोषान् आहारवर्जितः |
अर्थात पेट की अग्नि आहार को पचाती है और उपवास दोषों को पचाता है | उपवास से पाचनशक्ति बढ़ती है |
      उपवास अपनी शक्ति के अनुसार ही करो | ऐसा न हो कि एक दिन तो उपवास किया और दूसरे दिन मिष्ठान्न-लड्डू आदि पेट में ठूँस-ठूँस कर उपवास की सारी कसर निकाल दी | बहुत अधिक भूखा रहना भी ठीक नहीं |
      वैसे उपवास का सही अर्थ तो होता है ब्रह्म के, परमात्मा के निकट रहना | उप यानी समीप और वास यानी रहना | निराहार रहने से भगवद्भजन और आत्मचिंतन में मदद मिलती है | वृत्ति अन्तर्मुख होने से काम-विकार को पनपने का मौका ही नहीं मिल पाता |
      मद्यपान, प्याज, लहसुन और मांसाहार – ये वीर्यक्षय में मदद करते हैं, अतः इनसे अवश्य बचो 
शिश्नेन्द्रिय स्नान
      शौच के समय एवं लघुशंका के समय साथ में गिलास अथवा लोटे में ठंड़ा जल लेकर जाओ और उससे शिश्नेन्द्रिय को धोया करो | कभी-कभी उस पर ठंड़े पानी की धार किया करो | इससे कामवृत्ति का शमन होता है और स्वप्नदोष नहीं होता |
उचित आसन एवं व्यायाम करो
      स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है | अंग्रेजी में कहते हैं : A healthy mind resides in a healthy body.
            जिसका शरीर स्वस्थ नहीं रहता, उसका मन अधिक विकारग्रस्त होता है | इसलिये रोज प्रातः व्यायाम एवं आसन करने का नियम बना लो |
      रोज प्रातः काल 3-4 मिनट दौड़ने और तेजी से टहलने से भी शरीर को अच्छा व्यायाम मिल जाता है |
      सूर्यनमस्कार 13 अथवा उससे अधिक किया करो तो उत्तम है | इसमें आसन व व्यायाम दोनों का समावेश होता है |
      ‘व्यायाम’ का अर्थ पहलवानों की तरह मांसपेशियाँ बढ़ाना नहीं है | शरीर को योग्य कसरत मिल जाय ताकि उसमें रोग प्रवेश न करें और शरीर तथा मन स्वस्थ रहें – इतना ही उसमें हेतु है |
      व्यायाम से भी अधिक उपयोगी आसन हैं | आसन शरीर के समुचित विकास एवं ब्रह्मचर्य-साधना के लिये अत्यंत उपयोगी सिद्ध होते हैं | इनसे नाड़ियाँ शुद्ध होकर सत्त्वगुण की वृद्धि होती है | वैसे तो शरीर के अलग-अलग अंगों की पुष्टि के लिये अलग-अलग आसन होते हैं, परन्तु वीर्यरक्षा की दृष्टि से मयूरासन, पादपश्चिमोत्तानासन, सर्वांगासन थोड़ी बहुत सावधानी रखकर हर कोई कर सकता है | इनमें से पादपश्चिमोत्तानासन तो बहुत ही उपयोगी है | आश्रम में आनेवाले कई साधकों का यह निजी अनुभव है  
      किसी कुशल योग-प्रशिक्षक से ये आसन सीख लो और प्रातःकाल खाली पेट, शुद्ध हवा में किया करो | शौच, स्नान, व्यायाम आदि के पश्चात् ही आसन करने चाहिए |
      स्नान से पूर्व सुखे तौलिये अथवा हाथों से सारे शरीर को खूब रगड़ो | इस प्रकार के घर्षण से शरीर में एक प्रकार की विद्युत शक्ति पैदा होती है, जो शरीर के रोगों को नष्ट करती है | श्वास तीव्र गति से चलने पर शरीर में रक्त ठीक संचरण करता है और अंग-प्रत्यंग के मल को निकालकर फेफड़ों में लाता है | फेफड़ों में प्रविष्ट शुद्ध वायु रक्त को साफ कर मल को अपने साथ बाहर निकाल ले जाती है  | बचा-खुचा मल पसीने के रूप में त्वचा के छिद्रों द्वारा बाहर निकल आता है | इस प्रकार शरीर पर घर्षण करने के बाद स्नान करना  अधिक उपयोगी है, क्योंकि पसीने द्वारा बाहर निकला हुआ मल उससे धुल जाता है, त्वचा के छिद्र खुल जाते हैं और बदन में स्फूर्ति का संचार होता है |
ब्रह्ममुहूर्त में उठो
      स्वप्नदोष अधिकांशतः रात्रि के अंतिम प्रहर में हुआ करता है | इसलिये प्रातः चार-साढ़े चार बजे यानी ब्रह्ममुहूर्त में ही शैया का त्याग कर दो | जो लोग प्रातः काल देरी तक सोते रहते हैं, उनका जीवन निस्तेज हो जाता है |
दुर्व्यसनों से दूर रहो
      शराब एवं बीड़ी-सिगरेट-तम्बाकू का सेवन मनुष्य की कामवासना को उद्यीप्त करता है |
      कुरान शरीफ के अल्लाहपाक त्रिकोल रोशल के सिपारा में लिखा है कि शैतान का भड़काया हुआ मनुष्य ऐसी नशायुक्त चीजों का उपयोग करता है | ऐसे व्यक्ति से अल्लाह दूर रहता है, क्योंकि यह काम शैतान का है और शैतान उस आदमी को जहन्नुम में ले जाता है |
     नशीली वस्तुओं के सेवन से फेफड़े और हृदय कमजोर हो जाते हैं, सहनशक्ति घट जाती है और आयुष्य भी कम हो जाता है | अमरीकी डॉक्टरों ने खोज करके बतलाया है  कि नशीली वस्तुओं के सेवन से कामभाव उत्तेजित होने पर वीर्य पतला और कमजोर पड़ जाता है |
सत्संग करो
      आप सत्संग नहीं करोगे तो कुसंग अवश्य होगा | इसलिये मन, वचन, कर्म से सदैव सत्संग का ही सेवन करो | जब-जब चित्त में पतित विचार डेरा जमाने लगें तब-तब तुरंत सचेत हो जाओ और वह स्थान छोड़कर पहुँच जाओ किसी सत्संग के वातावरण में, किसी सन्मित्र या सत्पुरुष के सान्निध्य में | वहाँ वे कामी विचार बिखर जायेंगे और आपका तन-मन पवित्र हो जायेगा | यदि ऐसा नहीं किया तो वे पतित विचार आपका पतन किये बिना नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि जो मन में होता है, देर-सबेर उसीके अनुसार बाहर की क्रिया होती है | फिर तुम पछताओगे कि हाय ! यह मुझसे क्या हो गया ?
     पानी का स्वभाव है नीचे की ओर बहना | वैसे ही मन का स्वभाव है पतन की ओर सुगमता से बढ़ना | मन हमेशा धोखा देता है | वह विषयों की ओर खींचता है, कुसंगति में सार दिखता है, लेकिन वह पतन का रास्ता है | कुसंगति में कितना ही आकर्षण हो, मगर…
जिसके पीछे हो गम की कतारें, भूलकर उस खुशी से न खेलो |
अभी तक गत जीवन में आपका कितना भी पतन हो चुका हो, फिर भी सत्संगति करो | आपके उत्थान की अभी भी गुंजाइश है | बड़े-बड़े दुर्जन भी सत्संग से सज्जन बन गये हैं |
शठ सुधरहिं सत्संगति पाई |
      सत्संग से वंचित रहना अपने पतन को आमंत्रित करना है | इसलिये अपने नेत्र, कर्ण, त्वचा आदि सभी को सत्संगरूपी गंगा में स्नान कराते रहो, जिससे कामविकार आप पर हावी न हो सके |
शुभ संकल्प करो
      ‘हम ब्रह्मचर्य का पालन कैसे कर सकते हैं? बड़े-बड़े ॠषि-मुनि भी इस रास्ते पर फिसल पड़ते हैं…’ – इस प्रकार के हीन विचारों को तिलांजलि दे दो और अपने संकल्पबल को बढ़ाओ | शुभ संकल्प करो | जैसा आप सोचते हो, वैसे ही आप हो जाते हो | यह सारी सृष्टि ही संकल्पमय है |
      दृढ़ संकल्प करने से वीर्यरक्षण में मदद होती है और वीर्यरक्षण से संकल्पबल बढ़ता है | विश्वासो फलदायकः | जैसा विश्वास और जैसी श्रद्धा होगी वैसा ही फल प्राप्त होगा | ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों में यह संकल्पबल असीम होता है | वस्तुतः ब्रह्मचर्य की तो वे जीती-जागती मुर्ति ही होते हैं |
त्रिबन्धयुक्त प्राणायाम और योगाभ्यास करो
      त्रिबन्ध करके प्राणायाम करने से विकारी जीवन सहज भाव से निर्विकारिता में प्रवेश करने लगता है | मूलबन्ध से विकारों पर विजय पाने का सामर्थ्य आता है | उड्डियानबन्ध से आदमी उन्नति में विलक्षण उड़ान ले सकता है | जालन्धरबन्ध से बुद्धि विकसित होती है |
      अगर कोई व्यक्ति अनुभवी महापुरुष के सान्निध्य में त्रिबन्ध के साथ प्रतिदिन 12 प्राणायाम करे तो प्रत्याहार सिद्ध होने लगेगा | 12 प्रत्याहार से धारणा सिद्ध होने लगेगी | धारणा-शक्ति बढ़ते ही प्रकृति के रहस्य खुलने लगेंगे | स्वभाव की मिठास, बुद्धि की विलक्षणता, स्वास्थ्य की सौरभ आने लगेगी | 12 धारणा सिद्ध होने पर ध्यान लगेगा, सविकल्प समाधि होने लगेगी | सविकल्प समाधि का 12 गुना समय पकने पर निर्विकल्प समाधि लगेगी |
      इस प्रकार छः महीने अभ्यास करनेवाला साधक सिद्ध योगी बन सकता है | रिद्धि-सिद्धियाँ उसके आगे हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं | यक्ष, गंधर्व, किन्नर उसकी सेवा के लिए उत्सुक होते हैं | उस पवित्र पुरुष के निकट संसारी लोग मनौती मानकर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं | साधन करते समय रग-रग में इस महान् लक्ष्य की प्राप्ति के लिए धुन लग जाय|
      ब्रह्मचर्य-व्रत पालने वाला साधक पवित्र जीवन जीनेवाला व्यक्ति महान् लक्ष्य की प्राप्ति में सफल हो सकता है |
      हे मित्र ! बार-बार असफल होने पर भी तुम निराश मत हो | अपनी असफलताओं को याद करके हारे हुए जुआरी की तरह बार-बार गिरो मत | ब्रह्मचर्य की इस पुस्तक को फिर-फिर से पढ़ो | प्रातः निद्रा से उठते समय बिस्तर पर ही बैठे रहो और दृढ़ भावना करो :
      “मेरा जीवन प्रकृति की थप्पड़ें खाकर पशुओं की तरह नष्ट करने के लिए नहीं है | मैं अवश्य पुरुषार्थ करूँगा, आगे बढूँगा | हरि ॐ … ॐ … ॐ …
      मेरे भीतर परब्रह्म परमात्मा का अनुपम बल है | हरि ॐ … ॐ … ॐ …
तुच्छ एवं विकारी जीवन जीनेवाले व्यक्तियों के प्रभाव से मैं अपनेको विनिर्मुक्त करता जाऊँगा | हरि ॐ … ॐ … ॐ …
      सुबह में इस प्रकार का प्रयोग करने से चमत्कारिक लाभ प्राप्त कर सकते हो | सर्वनियन्ता सर्वेश्वर को कभी प्यार करो … कभी प्रार्थना करो … कभी भाव से, विह्वलता से आर्तनाद करो | वे अन्तर्यामी परमात्मा हमें अवश्य मार्गदर्शन देते हैं | बल-बुद्धि बढ़ाते हैं | साधक तुच्छ विकारी जीवन पर विजयी होता जाता है | ईश्वर का असीम बल तुम्हारे साथ है | निराश मत हो भैया ! हताश मत हो | बार-बार फिसलने पर भी सफल होने की आशा और उत्साह मत छोड़ो |
      शाबाश वीर … ! शाबाश … ! हिम्मत करो, हिम्मत करो | ब्रह्मचर्य-सुरक्षा के उपायों को बार-बार पढ़ो, सूक्ष्मता से विचार करो | उन्नति के हर क्षेत्र में तुम आसानी से विजेता हो सकते हो |
      करोगे न हिम्मत ?
      अति खाना, अति सोना, अति बोलना, अति यात्रा करना, अति मैथुन करना अपनी सुषुप्त योग्यताओं को धराशायी कर देता है, जबकि संयम और पुरुषार्थ सुषुप्त योग्यताओं को जगाकर जगदीश्वर से मुलाकात करा देता है |
नीम का पेड चला
हमारे सदगुरुदेव परम पूज्य लीलाशाहजी महाराज के जीवन की एक घटना बताता हूँ:
सिंध में उन दिनों किसी जमीन की बात में हिन्दू और मुसलमानों का झगड़ा चल रहा था |  उस जमीन पर नीम का एक पेड़ खड़ा था, जिससे उस जमीन की सीमा-निर्धारण के बारे में कुछ विवाद था | हिन्दू और मुसलमान कोर्ट-कचहरी के धक्के खा-खाकर थके | आखिर दोनों पक्षों ने यह तय किया कि यह धार्मिक स्थान है | दोनों पक्षों में से जिस पक्ष का कोई पीर-फकीर उस स्थान पर अपना कोई विशेष तेज, बल या  चमत्कार दिखा दे, वह जमीन उसी पक्ष की हो जायेगी |
पूज्य लीलाशाहजी बापू का नाम पहले ‘लीलाराम’ था | लोग पूज्य लीलारामजी के पास पहुँचे और बोले: “हमारे तो आप ही एकमात्र संत हैं | हमसे जो हो सकता था वह हमने किया, परन्तु असफल रहे | अब समग्र हिन्दू समाज की प्रतिष्ठा आपश्री के चरणों में है |
इंसाँ की अज्म से जब दूर किनारा होता है |
तूफाँ में टूटी किश्ती का एक भगवान किनारा होता है ||
अब संत कहो या भगवान कहो, आप ही हमारा सहारा हैं | आप ही कुछ करेंगे तो यह धर्मस्थान हिन्दुओं का हो सकेगा |”
      संत तो मौजी होते हैं | जो अहंकार लेकर किसी संत के पास जाता है, वह खाली हाथ लौटता है और जो विनम्र होकर शरणागति के भाव से उनके सम्मुख जाता  है, वह सब कुछ पा लेता है | विनम्र और श्रद्धायुक्त लोगों पर संत की करुणा कुछ देने को जल्दी उमड़ पड़ती है |
      पूज्य लीलारामजी उनकी बात मानकर उस स्थान पर जाकर भूमि पर दोनों घुटनों के बीच सिर नीचा किये हुए शांत भाव से बैठ गये |
      विपक्ष के लोगों ने उन्हें ऐसी सरल और सहज अवस्था में बैठे हुए देखा तो समझ लिया कि ये लोग इस साधु को व्यर्थ में ही लाये हैं | यह साधु क्या करेगा …? जीत हमारी होगी |
      पहले मुस्लिम लोगों द्वारा आमंत्रित पीर-फकीरों ने जादू-मंत्र, टोने-टोटके आदि किये | ‘अला बाँधूँ बला बाँधूँ… पृथ्वी बाँधूँ… तेज बाँधूँ… वायू बाँधूँ… आकाश बाँधूँ… फूऽऽऽ‘ आदि-आदि किया | फिर पूज्य लीलाराम जी की बारी आई |
      पूज्य लीलारामजी भले ही साधारण से लग रहे थे, परन्तु उनके भीतर आत्मानन्द हिलोरे ले रहा था | ‘पृथ्वी, आकाश क्या समग्र ब्रह्माण्ड में मेरा ही पसारा है… मेरी सत्ता के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता… ये चाँद-सितारे मेरी आज्ञा में ही चल रहे हैं… सर्वत्र मैं ही इन सब विभिन्न रूपों में विलास कर रहा हूँ…’ ऐसे ब्रह्मानन्द में डूबे हुए वे बैठे थे |
      ऐसी आत्ममस्ती में बैठा हुआ किन्तु बाहर से कंगाल जैसा दिखने वाला संत जो बोल दे, उसे घटित होने से कौन रोक सकता है ?
      वशिष्ठ जी कहते हैं : “हे रामजी ! त्रिलोकी में ऐसा कौन है, जो संत की आज्ञा का उल्लंघन कर सके ?”
      जब लोगों ने पूज्य लीलारामजी से आग्रह किया तो उन्होंने धीरे से अपना सिर ऊपर की ओर उठाया | सामने ही नीम का पेड़ खड़ा था | उस पर दृष्टि डालकर गर्जना करते हुए आदेशात्मक भाव से बोल उठे :
      “ऐ नीम ! इधर क्या खड़ा है ? जा उधर हटकर खड़ा रह |”
      बस उनका कहना ही था कि नीम का पेड ‘सर्रर्र… सर्रर्र…’ करता हुआ दूर जाकर पूर्ववत् खड़ा हो गया |
      लोग तो यह देखकर आवाक रह गये ! आज तक किसी ने ऐसा चमत्कार नहीं देखा था | अब विपक्षी लोग भी उनके पैरों पड़ने लगे | वे भी समझ गये कि ये कोई सिद्ध महापुरुष हैं |
      वे हिन्दुओं से बोले : “ये आपके  ही पीर नहीं हैं बल्कि आपके और हमारे सबके पीर हैं | अब से ये ‘लीलाराम’ नहीं किंतु ‘लीलाशाह’ हैं |
      तब से लोग उनका ‘लीलाराम’ नाम भूल ही गये और उन्हें ‘लीलाशाह’ नाम से ही पुकारने लगे | लोगों ने उनके जीवन में ऐसे-ऐसे और भी कई चमत्कार देखे |
      वे 13 वर्ष की उम्र पार करके ब्रह्मलीन हुए | इतने वृद्ध होने पर भी उनके सारे दाँत सुरक्षित थे, वाणी में तेज और बल था | वे नियमित रूप से आसन एवं प्राणायाम करते थे | मीलों पैदल यात्रा करते थे | वे आजन्म ब्रह्मचारी रहे | उनके कृपा-प्रसाद द्वारा कई पुत्रहीनों को पुत्र मिले, गरीबों को धन मिला, निरुत्साहियों को उत्साह मिला और जिज्ञासुओं का साधना-मार्ग प्रशस्त हुआ | और भी क्या-क्या हुआ यह बताने जाऊँगा तो विषयान्तर होगा और  समय भी अधिक नहीं है | मैं यह बताना चाहता हूँ कि उनके द्वारा इतने चमत्कार होते हुए भी उनकी महानता चमत्कारों में निहित नहीं है | उनकी महानता तो उनकी ब्रह्मनिष्ठता में निहित थी |
      छोटे-मोटे चमत्कार तो थोड़े बहुत अभ्यास के द्वारा हर कोई कर लेता है, मगर ब्रह्मनिष्ठा तो चीज ही कुछ और है | वह तो सभी साधनाओं की अंतिम निष्पति है | ऐसा ब्रह्मनिष्ठ होना ही तो वास्तविक ब्रह्मचारी होना है | मैंने पहले भी कहा है कि केवल वीर्यरक्षा ब्रह्मचर्य नहीं है | यह तो ब्रह्मचर्य की साधना है | यदि शरीर द्वारा वीर्यरक्षा हो और मन-बुद्धि में विषयों का चिंतन चलता रहे, तो ब्रह्मनिष्ठा कहाँ हुई ? फिर भी वीर्यरक्षा द्वारा ही उस ब्रह्मानन्द का द्वार खोलना शीघ्र संभव होता है | वीर्यरक्षण हो और कोई समर्थ ब्रह्मनिष्ठ गुरु मिल जायें तो बस, फिर और कुछ करना शेष नहीं रहता | फिर वीर्यरक्षण करने में परिश्रम नहीं करना पड़ता, वह सहज होता है | साधक सिद्ध बन जाता है | फिर तो उसकी दृष्टि मात्र से कामुक भी संयमी बन जाता है |
      संत ज्ञानेश्वर महाराज जिस चबूतरे पर बैठे थे, उसीको कहा: ‘चल…’ तो  वह चलने लगा | ऐसे ही पूज्यपाद लीलाशाहजी बापू ने नीम के पेड़ को कहा : ‘चल…’ तो वह चलने लगा और जाकर दूसरी जगह खड़ा हो गया | यह सब संकल्प बल का चमत्कार है | ऐसा संकल्प बल आप भी बढ़ा सकते हैं |
      विवेकानन्द कहा करते थे कि भारतीय लोग अपने संकल्प बल को भूल गये हैं, इसीलिये गुलामी का दुःख भोग रहे हैं | ‘हम क्या कर सकते हैं…’ ऐसे नकारात्मक चिंतन द्वारा वे संकल्पहीन हो गये हैं जबकि अंग्रेज का बच्चा भी अपने को बड़ा उत्साही समझता है और कार्य में सफल हो जाता है, क्योंकि वे ऐसा विचार करता है : ‘मैं अंग्रेज हूँ | दुनिया के बड़े भाग पर हमारी जाति का शासन रहा है | ऐसी गौरवपूर्ण जाति का अंग होते हुए मुझे कौन रोक सकता है सफल होने से ? मैं क्या नहीं कर सकता ?’ ‘बस, ऐसा विचार ही उसे सफलता दे देता है |
      जब अंग्रेज का बच्चा भी अपनी जाति के गौरव का स्मरण कर दृढ़ संकल्पवान् बन सकता है, तो आप क्यों नहीं बन सकते ?
      “मैं ॠषि-मुनियों की संतान हूँ | भीष्म जैसे दृढ़प्रतिज्ञ पुरुषों की परम्परा में मेरा जन्म हुआ है | गंगा को पृथ्वी पर उतारनेवाले राजा भगीरथ जैसे दृढ़निश्चयी महापुरुष का रक्त मुझमें बह रहा है | समुद्र को भी पी जानेवाले अगस्त्य ॠषि का मैं वंशज हूँ | श्री राम और श्रीकृष्ण की अवतार-भूमि भारत में, जहाँ देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं वहाँ मेरा जन्म हुआ है, फिर मैं ऐसा दीन-हीन क्यों? मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ | आत्मा की अमरता का, दिव्य ज्ञान का, परम निर्भयता का संदेश सारे संसार को जिन ॠषियों ने दिया, उनका वंशज होकर मैं दीन-हीन नहीं रह सकता | मैं अपने रक्त के निर्भयता के संस्कारों को जगाकर रहूँगा | मैं वीर्यवान् बनकर रहूँगा |” ऐसा दृढ़ संकल्प हरेक भारतीय बालक को करना चाहिए |
स्त्री-जाति के प्रति मातृभाव प्रबल करो
      श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे : “ किसी सुंदर स्त्री पर नजर पड़ जाए तो उसमें माँ जगदम्बा के दर्शन करो | ऐसा विचार करो कि यह अवश्य देवी का अवतार है, तभी तो इसमें इतना सौंदर्य है | माँ प्रसन्न होकर इस रूप में दर्शन दे रही है, ऐसा समझकर सामने खड़ी स्त्री को मन-ही-मन प्रणाम करो | इससे तुम्हारे भीतर काम विकार नहीं उठ सकेगा |
मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् |
      पराई स्त्री को माता के समान और पराए धन को मिट्टी के ढेले के समान समझो |
शिवाजी का प्रसंग
      शिवाजी के पास कल्याण के सूबेदार की स्त्रियों को लाया गया था तो उस समय उन्होंने यही आदर्श उपस्थित किया था | उन्होंने उन स्त्रियों को ‘माँ’ कहकर पुकारा तथा उन्हें कई उपहार देकर सम्मान सहित उनके घर वापस भेज दिया | शिवाजी परम गुरु समर्थ रामदास के शिष्य थे |
भारतीय सभ्यता और संस्कृति में 'माता' को इतना पवित्र स्थान दिया गया है कि यह मातृभाव मनुष्य को पतित होते-होते बचा लेता है | श्री रामकृष्ण एवं अन्य पवित्र संतों के समक्ष जब कोई स्त्री कुचेष्टा करना चाहती तब वे सज्जन, साधक, संत यह पवित्र मातृभाव मन में लाकर विकार के फंदे से बच जाते | यह मातृभाव मन को विकारी होने से बहुत हद तक रोके रखता है | जब भी किसी स्त्री को देखने पर मन में विकार उठने लगे, उस समय सचेत रहकर इस मातृभाव का प्रयोग कर ही लेना चाहिए |
अर्जुन और उर्वशी
अर्जुन सशरीर इन्द्र सभा में गया तो उसके स्वागत में उर्वशी, रम्भा आदि अप्सराओं ने नृत्य किये | अर्जुन के रूप सौन्दर्य पर मोहित हो उर्वशी रात्रि के समय उसके निवास स्थान पर गई और प्रणय-निवेदन किया  तथा साथ ही 'इसमें कोई दोष नहीं लगता' इसके पक्ष में अनेक दलीलें भी कीं | किन्तु अर्जुन ने अपने दृढ़ इन्द्रियसंयम का परिचय देते हुए कह :
गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनी | त्वं हि में मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया ||
( महाभारत : वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्व : ४६.४७)
 "मेरी दृष्टि में कुन्ती, माद्री और शची का जो स्थान है, वही तुम्हारा भी है | तुम मेरे लिए माता के समान पूज्या हो | मैं तुम्हारे चरणों में प्रणाम करता हूँ | तुम अपना दुराग्रह छोड़कर लौट जाओ |" इस पर उर्वशी ने क्रोधित होकर उसे नपुंसक होने का शाप दे दिया | अर्जुन ने उर्वशी से शापित होना स्वीकार किया, परन्तु संयम नहीं तोड़ा | जो अपने आदर्श से नहीं हटता, धैर्य और सहनशीलता को अपने चरित्र का भूषण बनाता है, उसके लिये शाप भी वरदान बन जाता है | अर्जुन के लिये भी ऐसा ही हुआ | जब इन्द्र तक यह बात पहुँची तो उन्होंने  अर्जुन को कहा : "तुमने इन्द्रिय संयम के द्वारा ऋषियों को भी पराजित कर दिया | तुम जैसे पुत्र को पाकर कुन्ती वास्तव में श्रेष्ठ पुत्रवाली है | उर्वशी का शाप तुम्हें वरदान सिद्ध होगा | भूतल पर वनवास के १३वें वर्ष में अज्ञातवास करना पड़ेगा उस समय यह सहायक होगा | उसके बाद तुम अपना पुरुषत्व फिर से प्राप्त कर लोगे |" इन्द्र के कथनानुसार अज्ञातवास के समय अर्जुन ने विराट के महल में नर्तक वेश में रहकर विराट की राजकुमारी को संगीत और नृत्य विद्या सिखाई थी और इस प्रकार वह शाप से मुक्त हुआ था | परस्त्री के प्रति मातृभाव रखने का यह एक सुंदर उदाहरण है | ऐसा ही एक उदाहरण वाल्मीकिकृत रामायण में भी आता है | भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण को जब सीताजी के गहने पहचानने को कहा गया तो लक्ष्मण जी बोले : हे तात ! मैं तो सीता माता के पैरों के गहने और नूपुर ही पहचानता हूँ, जो मुझे उनकी चरणवन्दना के समय दृष्टिगोचर होते रहते थे | केयूर-कुण्डल आदि दूसरे गहनों को मैं नहीं जानता |" यह मातृभाववाली दृष्टि ही इस बात का एक बहुत बड़ा कारण था कि लक्ष्मणजी इतने काल तक ब्रह्मचर्य का पालन किये रह सके | तभी रावणपुत्र मेघनाद को, जिसे इन्द्र भी नहीं हरा सका था, लक्ष्मणजी हरा पाये | पवित्र मातृभाव द्वारा वीर्यरक्षण का यह अनुपम उदाहरण है जो ब्रह्मचर्य की महत्ता भी प्रकट करता है |
सत्साहित्य पढ़ो
जैसा साहित्य हम पढ़ते हैं, वैसे ही विचार मन के भीतर चलते रहते हैं और उन्हींसे हमारा सारा व्यवहार प्रभावित होता है | जो लोग कुत्सित, विकारी और कामोत्तेजक साहित्य पढ़ते हैं, वे कभी ऊपर नही उठ सकते | उनका मन सदैव काम-विषय के चिंतन में ही उलझा रहता है और इससे वे अपनी वीर्यरक्षा करने में असमर्थ रहते हैं | गन्दे साहित्य कामुकता का भाव पैदा करते हैं | सुना गया है कि पाश्चात्य जगत से प्रभावित कुछ  नराधम चोरी-छिपे गन्दी फिल्मों का प्रदर्शन करते हैं जो अपना और अपने संपर्क में आनेवालों का विनाश करते हैं | ऐसे लोग महिलाओं, कोमल वय की कन्याओं तथा किशोर एवं युवावस्था में पहुँचे हुए बच्चों के साथ बड़ा अन्याय करते हैं | 'ब्ल्यू फिल्म' देखने-दिखानेवाले महा अधम कामान्ध लोग मरने के बाद शूकर, कूकर आदि योनियों में जन्म लेकर अथवा गन्दी नालियों के कीड़े बनकर छटपटाते हुए दु:ख भोगेंगे ही | निर्दोष कोमलवय के नवयुवक उन दुष्टों के शिकार न बनें, इसके लिए सरकार और समाज को सावधान रहना चाहिए |
            बालक देश की संपत्ति हैं | ब्रह्मचर्य के नाश से उनका विनाश हो जाता है | अतः नवयुवकों को मादक द्रव्यों, गन्दे साहित्यों व गन्दी फिल्मों के द्वारा बर्बाद होने से बचाया जाये | वे ही तो राष्ट्र के भावी कर्णधार हैं | युवक-युवतियाँ तेजस्वी हों, ब्रह्मचर्य की महिमा समझें इसके लिए हम सब लोगों का कर्त्तवय है कि स्कूलों-कालेजों में विद्यार्थियों तक ब्रह्मचर्य पर लिखा गया साहित्य पहुँचायें | सरकार का यह नैतिक  कर्त्तव्य है कि वह शिक्षा प्रदान कर ब्रह्मचर्य विशय पर विद्यार्थियों को सावधान करे ताकि वे तेजस्वी बनें | जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनके जीवन पर दृष्टिपात करो तो उन पर किसी-न-किसी सत्साहित्य की छाप मिलेगी | अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक इमर्सन के गुरु थोरो ब्रह्मचर्य का पालन करते थे | उन्हों ने लिखा है : "मैं प्रतिदिन गीता के पवित्र जल से स्नान करता हूँ | यद्यपि इस पुस्तक को लिखनेवाले देवताओं को अनेक वर्ष व्यतीत हो गये, लेकिन इसके बराबर की कोई पुस्तक अभी तक नहीं निकली है |"
                योगेश्वरी माता गीता के लिए दूसरे एक विदेशी विद्वान्, इंग्लैण्ड के एफ. एच. मोलेम कहते हैं : "बाइबिल का मैंने यथार्थ अभ्यास किया है | जो ज्ञान गीता में है, वह ईसाई या यदूही बाइबिलों में नहीं है | मुझे यही आश्चर्य होता है कि भारतीय नवयुवक यहाँ इंग्लैण्ड तक पदार्थ विज्ञान सीखने क्यों आते हैं ? नि:संदेह पाश्चात्यों के प्रति उनका मोह ही इसका कारण है | उनके भोलेभाले हृदयों ने निर्दय और अविनम्र पश्चिमवासियों के दिल अभी पहचाने नहीं हैं | इसीलिए उनकी शिक्षा से मिलनेवाले पदों की लालच से वे उन स्वार्थियों के इन्द्रजाल में फंसते हैं | अन्यथा तो जिस देश या समाज को गुलामी से छुटना हो उसके लिए तो यह अधोगति का ही मार्ग है |
मैं ईसाई होते हुए भी गीता के प्रति इतना आदर-मान इसलिए रखता हूँ कि जिन गूढ़ प्रश्नों का हल पाश्चात्य वैज्ञानिक अभी तक नहीं कर पाये, उनका हल इस गीता ग्रंथ ने शुद्ध और सरल रीति से दे दिया है | गीता में कितने ही सूत्र आलौकिक उपदेशों से भरपूर देखे, इसी कारण गीताजी मेरे लिए साक्षात योगेश्वरी माता बन गई हैं | विश्व भर में सारे धन से भी न मिल सके, भारतवर्ष का यह ऐसा अमूल्य खजाना है |
सुप्रसिद्ध पत्रकार पॉल ब्रिन्टिन सनातन धर्म की ऐसी धार्मिक पुस्तकें पढ़कर जब प्रभावित हुआ तभी वह हिन्दुस्तान आया था और यहाँ के रमण महर्षि जैसे महात्माओं के दर्शन करके धन्य हुआ था | देशभक्तिपूर्ण साहित्य पढ़कर ही चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, वीर सावरकर जैसे रत्न अपने जीवन को देशाहित में लगा पाये |
इसलिये सत्साहित्य की तो जितनी महिमा गाई जाये, उतनी कम है | श्रीयोगवशिष्ठ महारामायण, उपनिषद, दासबोध, सुखमनि, विवेकचूड़ामणि, श्री रामकृष्ण साहित्य, स्वामी रामतीर्थ के प्रवचन आदि भारतीय संस्कृति की ऐसी कई पुस्तकें हैं जिन्हें पढ़ो और उन्हें अपने दैनिक जीवन का अंग बना लो | ऐसी-वैसी विकारी और कुत्सित पुस्तक-पुस्तिकाएँ हों तो उन्हें उठाकर कचरे ले ढ़ेर पर फेंक दो या चूल्हे में डालकर आग तापो, मगर न तो स्वयं पढ़ो और न दूसरे के हाथ लगने दो |
        इस प्रकार के आध्यात्मिक सहित्य-सेवन में ब्रह्मचर्य मजबूत करने की अथाह शक्ति होती है | प्रातःकाल स्नानादि के पश्चात दिन के व्यवसाय में लगने से पूर्व एवं रात्रि को सोने से पूर्व कोई-न-कोई आध्यात्मिक पुस्तक पढ़ना चाहिए | इससे वे ही सतोगुणी विचार मन में घूमते रहेंगे जो पुस्तक में होंगे और हमारा मन विकारग्रस्त होने से बचा रहेगा |
कौपीन (लंगोटी) पहनने का भी आग्रह रखो | इससे अण्डकोष स्वस्थ रहेंगे और वीर्यरक्षण में मदद मिलेगी |
वासना को भड़काने वाले नग्न व अश्लील पोस्टरों एवं चित्रों को देखने का आकर्षण छोड़ो | अश्लील शायरी और गाने भी जहाँ गाये जाते हों, वहाँ न रुको |
वीर्यसंचय के चमत्कार
      वीर्य के एक-एक अणु में बहुत महान् शक्तियाँ छिपी हैं | इसीके द्वारा शंकराचार्य, महावीर, कबीर, नानक जैसे महापुरुष धरती पर अवतीर्ण हुए हैं | बड़े-बड़े वीर, योद्धा, वैज्ञानिक, साहित्यकार- ये सब वीर्य की एक बूँद  में  छिपे थे … और अभी आगे भी पैदा होते रहेंगे | इतने बहुमूल्य वीर्य का सदुपयोग जो व्यक्ति नहीं कर पाता, वह अपना पतन आप आमंत्रित करता है |
वीयं वै भर्गः |                    (शतपथ ब्राह्मण )
      वीर्य ही तेज है, आभा है, प्रकाश है |
      जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने वाली ऐसी बहुमूल्य वीर्यशक्ति को जिसने भी खोया, उसको कितनी हानि उठानी पड़ी, यह कुछ उदाहरणों के द्वारा हम समझ सकते हैं |
भीष्म पितामह और  वीर  अभिमन्यु
      महाभारत में ब्रह्मचर्य से संबंधित दो प्रसंग आते हैं : एक भीष्म पितामह का और दूसरा वीर अभिमन्यु का | भीष्म पितामह बाल ब्रह्मचारी थे, इसलिये उनमें अथाह सामर्थ्य था | भगवान श्री कृष्ण का यह व्रत था कि ‘मैं युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊँगा |’ किन्तु यह भीष्म की ब्रह्मचर्य शक्ति का ही चमत्कार था कि उन्होंने श्री कृष्ण को अपना  व्रत भंग करने के  लिए मजबूर कर दिया | उन्होंने अर्जुन पर ऐसी बाण वर्षा की कि दिव्यास्त्रों से सुसज्जित अर्जुन जैसा धुरन्धर धनुर्धारी भी उसका प्रतिकार करने में असमर्थ हो गया जिससे उसकी रक्षार्थ भगवान श्री कृष्ण को रथ का पहिया लेकर भीष्म की ओर दौड़ना पड़ा |
      यह ब्रह्मचर्य का ही प्रताप था कि भीष्म मौत पर भी विजय प्राप्त कर सके | उन्होंने ही यह स्वयं तय किया कि उन्हें कब शरीर छोड़ना है | अन्यथा शरीर में प्राणों का टिके रहना असंभव था, परन्तु भीष्म की बिना आज्ञा के मौत भी उनसे प्राण कैसे छीन सकती थी ! भीष्म ने स्वेच्छा से शुभ मुहूर्त में अपना शरीर छोड़ा |
      दूसरी ओर अभिमन्यु का प्रसंग आता है | महाभारत के युद्ध में अर्जुन का वीर पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह का भेदन करने के लिए अकेला ही निकल पड़ा था | भीम भी पीछे रह गया था | उसने जो शौर्य दिखाया, वह प्रशंसनीय था | बड़े-बड़े महारथियों से घिरे होने पर भी वह रथ का पहिया लेकर अकेला युद्ध करता रहा, परन्तु आखिर में मारा गया | उसका कारण यह था कि युद्ध में जाने से पूर्व वह अपना ब्रह्मचर्य खण्डित कर चुका था | वह उत्तरा के गर्भ में पाण्डव वंश का बीज डालकर आया था | मात्र इतनी छोटी सी कमजोरी के कारण वह पितामह भीष्म की तरह अपनी मृत्यु का आप मालिक नहीं बन सका |
पृथ्वीराज चौहान क्यों हारा ?
भारात में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को सोलह बार हराया किन्तु सत्रहवें युद्ध में वह खुद हार गया और उसे पकड़ लिया गया | गोरी ने बाद में उसकी आँखें लोहे की गर्म सलाखों से फुड़वा दीं | अब यह एक बड़ा आश्चर्य है कि सोलह बार जीतने वाला वीर योद्धा हार कैसे गया ? इतिहास बताता है कि जिस दिन वह हारा था उस दिन वह अपनी पत्नी से अपनी कमर कसवाकर अर्थात अपने वीर्य का सत्यानाश करके युद्धभूमि में आया था | यह है वीर्यशक्ति के व्यय का दुष्परिणाम |
रामायण महाकाव्य के पात्र रामभक्त हनुमान के कई अदभुत पराक्रम तो हम सबने सुने ही हैं जैसे- आकाश में उड़ना, समुद्र लाँघना, रावण की भरी सभा में से छूटकर लौटना, लंका जलाना, युद्ध में रावण को मुक्का मार कर मूर्छित कर देना, संजीवनी बूटी के लिये पूरा पहाड़ उठा लाना आदि | ये सब ब्रह्मचर्य की शक्ति का ही प्रताप था |
फ्रांस का सम्राट नेपोलियन कहा करता था : "असंभव शब्द ही मेरे शब्दकोष में नहीं है |" परन्तु वह भी हार गया | हारने के मूल कारणों में एक कारण यह भी था कि युद्ध से पूर्व ही उसने स्त्री के आकर्षण में अपने वीर्य का क्षय कर दिया था |
सेम्सन भी शूरवीरता के क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध था | "बाइबिल" में उसका उल्लेख आता है | वह भी स्त्री के मोहक आकर्षण से नहीं बच सका और उसका भी पतन हो गया |
स्वामी रामतीर्थ का अनुभव
स्वामी रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे तब उन्होंने एक प्रयोग किया और बाद में निष्कर्षरूप में बताया कि जो विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में या परीक्षा के कुछ दिन पहले विषयों में फंस जाते हैं, वे परीक्षा में प्रायः असफल हो जाते हैं, चाहे वर्ष भर अपनी कक्षा में अच्छे विद्यार्थी क्यों न रहे हों | जिन विद्यार्थियों का चित्त परीक्षा के दिनों में एकाग्र और शुद्ध रहा करता है, वे ही सफल होते हैं | काम विकार को रोकना वस्तुतः बड़ा दुःसाध्य है |
यही कारण है कि मनु महाराज ने यहां तक कह दिया है :
"माँ, बहन और पुत्री के साथ भी व्यक्ति को एकान्त में नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि मनुष्य की इन्द्रियाँ बहुत बलवान्  होती हैं | वे विद्वानों के मन को भी समान रूप से अपने वेग में खींच ले जाती हैं |"
युवा वर्ग से दो बातें
मैं युवक वर्ग से विशेषरूप से दो बातें कहना चाहता हूं क्योंकि यही वह वर्ग है जो अपने देश के सुदृढ़ भविष्य का आधार है | भारत का यही युवक वर्ग जो पहले देशोत्थान एवं  आध्यात्मिक रहस्यों की खोज में लगा रहता था, वही अब कामिनियों के रंग-रूप के पीछे पागल होकर अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ में खोता जा रहा है | यह कामशक्ति मनुष्य के लिए अभिशाप नहीं, बल्कि वरदान स्वरूप है | यह जब युवक में खिलने लगती है तो उसे उस समय इतने उत्साह से भर देती है कि वह संसार में सब कुछ कर सकने की स्थिति में अपने को समर्थ अनुभव करने लगता है, लेकिन आज के अधिकांश युवक दुर्व्यसनों में फँसकर हस्तमैथुन एवं स्वप्नदोष के शिकार बन जाते हैं |
हस्तमैथुन का दुष्परिणाम
इन दुर्व्यस्नों से युवक अपनी वीर्यधारण की शक्ति खो बैठता है और वह तीव्रता से नपुसंकता की ओर अग्रसर होने लगता है | उसकी आँखें और चेहरा निस्तेज और कमजोर हो जाता है | थोड़े परिश्रम से ही वह हाँफने लगता है, उसकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगता है | अधिक कमजोरी से मूर्च्छा भी आ जाती है | उसकी संकल्पशक्ति कमजोर हो जाती  है |
अमेरिका में किया गया प्रयोग
अमेरिका में एक विज्ञानशाला में ३० विद्यार्थियों को भूखा रखा गया | इससे उतने समय के लिये तो उनका काम विकार दबा रहा परन्तु भोजन करने के बाद उनमें फिर से काम-वासना जोर पकड़ने लगी | लोहे की लंगोट पहन कर भी कुछ लोग कामदमन की  चेष्टा करते पाए जाते हैं | उनको 'सिकडिया बाबा' कहते हैं | वे लोहे या पीतल की लंगोट पहन कर उसमें ताला लगा देते हैं | कुछ ऐसे भी लोग हुए हैं, जिन्होंने इस काम-विकार से छुट्टी पाने के लिये अपनी जननेन्द्रिय ही काट दी और बाद में बहुत पछताये | उन्हें मालूम नहीं था कि जननेन्द्रिय तो काम विकार प्रकट होने का एक साधन है | फूल-पत्त्ते तोड़ने से पेड़ नष्ट नहीं होता | मार्गदर्शन के अभाव में लोग कैसी-कैसी भूलें करते हैं, ऐसा ही यह एक उदाहरण है |
जो युवक १७ से २४ वर्ष की आयु तक संयम रख लेता है, उसका मानसिक बल एवं बुद्धि बहुत तेजस्वी हो जाती है | जीवनभर उसका उत्साह एवं स्फूर्ति बनी रहती है | जो युवक बीस वर्ष की आयु पूरी होने से पूर्व ही अपने वीर्य का नाश करना शुरू कर देता है, उसकी स्फूर्ति और होसला पस्त हो जाता है तथा सारे जीवनभर के लिये उसकी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है | मैं चाहता हूँ कि युवावर्ग वीर्य के संरक्षण के कुछ ठोस प्रयोग सीख ले | छोटे-मोटे प्रयोग, उपवास, भोजन में सुधार आदि तो ठीक है, परन्तु वे अस्थाई लाभ ही दे पाते हैं | कई प्रयोगों से यह बात सिद्ध हुई है |
कामशक्ति का दमन या ऊर्ध्वगमन  ?
कामशक्ति का  दमन सही हल नहीं है | सही हल है इस शक्ति को ऊर्ध्वमुखी बनाकर शरीर में ही इसका उपयोग करके परम सुख को प्राप्त करना | यह युक्ति जिसको आ गई, उसे सब आ गया और जिसे यह नहीं आई वह समाज में कितना भी सत्तावान्, धनवान्, प्रतिश्ठावान् बन जाय, अन्त में मरने पर अनाथ ही रह जायेगा, अपने-आप को नहीं मिल पायेगा | गौतम बुद्ध यह युक्ति जानते थे, तभी अंगुलीमाल जैसा निर्दयी हत्यारा भी सारे दुष्कृत्य छोड़कर उनके आगे भिक्षुक बन गया | ऐसे महापुरुषों में वह शक्ति होती है, जिसके प्रयोग से साधक के लिए ब्रह्मचर्य की साधना एकदम सरल हो जाती है | फिर काम-विकार से लड़ना नही पड़ता है, बल्कि जीवन में ब्रह्मचर्य सहज ही फलित होने लगता है |
मैंने ऐसे लोगों को देखा है, जो थोड़ा सा जप करते हैं और बहुत पूजे जाते हैं | और ऐसे लोगों को भी देखा है, जो बहुत जप-तप करते हैं, फिर भी समाज पर उनका कोई प्रभाव नहीं, उनमें आकर्षण नहीं | जाने-अनजाने, हो-न-हो, जागृत अथवा निद्रावस्था में या अन्य किसी प्रकार से उनकी वीर्य शक्ति अवशय नष्ट होती रहती है |
एक साधक का अनुभव
एक साधक ने, यहाँ उसका नाम नहीं लूँगा, मुझे स्वयं ही बताया : "स्वामीजी ! यहाँ आने से पूर्व मैं महीने में एक दिन भी पत्नी के बिना नहीं रह सकता था ... इतना अधिक काम-विकार में फँसा हुआ था, परन्तु अब ६-६ महीने बीत जाते हैं पत्नी के बिना और काम-विकार भी पहले की भाँति नहीं सताता |"
दूसरे साधक का अनुभव
दूसरे एक और सज्जन यहाँ आते हैं, उनकी पत्नी की शिकायत मुझे सुनने को मिली  है | वह स्वयं तो यहाँ आती नहीं, मगर लोगों से कहा है कि : "किसी प्रकार मेरे पति को समझायें कि वे आश्रम में नहीं जाया करें |"
वैसे तो आश्रम  में जाने के लिए  कोई क्यों मना करेगा ? मगर उसके इस प्रकार मना करने का कारण जो उसने लोगों को बताया और लोगों ने मुझे बताया वह इस प्रकार है : वह कहती है : "इन बाबा ने मेरे पति पर न जाने क्या जादू किया है कि पहले तो वे रात में मुझे पास में सुलाते थे, परन्तु अब मुझसे दूर सोते हैं | इससे तो वे सिनेमा में जाते थे, जैसे-तैसे दोस्तों के साथ घूमते रहते थे, वही ठीक था | उस समय कम से कम मेरे कहने में तो चलते थे, परन्तु अब तो..."
कैसा दुर्भाग्य है मनुष्य का ! व्यक्ति भले ही पतन के रास्ते चले, उसके जीवन का भले ही सत्यानाश होता रहे, परन्तु "वह मेरे कहने में चले ..." यही संसारी प्रेम का ढ़ाँचा है | इसमें प्रेम दो-पांच प्रतिशत हो सकता है, बाकी ९५ प्रतिशत तो मोह ही होता है, वासना ही होती है | मगर मोह भी प्रेम का चोला ओढ़कर फिरता रहता है और हमें पता नहीं चलता कि हम पतन की ओर जा रहे हैं या उत्थान की ओर |
योगी का संकल्पबल
ब्रह्मचर्य उत्थान का मार्ग है | बाबाजी ने कुछ जादू-वादू नहीं किया| केवल उनके द्वारा उनकी यौगिक शक्ति का सहारा उस व्यक्ति को मिला, जिससे उसकी कामशक्ति ऊर्ध्वगामी हो गई | इस कारण उसका मन संसारी काम सुख से ऊपर उठ गया | जब असली रस मिल गया तो गंदी नाली द्वारा मिलने वाले रस की ओर कोई क्यों ताकेगा ? ऐसा कौन मूर्ख होगा जो ब्रह्मचर्य का पवित्र और असली रस छोड़कर घृणित और पतनोन्मुख करने वाले संसारी कामसुख की ओर दौड़ेगा ?
क्या यह चमत्कार है ?
सामान्य लोगों के लिये तो यह मानों एक बहुत बड़ा चमत्कार है, परन्तु इसमें चमत्कार जैसी कोई बात नहीं है | जो महापुरुष योगमार्ग से परिचित हैं और अपनी आत्ममस्ती में मस्त रहते हैं उनके लिये तो यह एक खेल मात्र है | योग का भी अपना एक विज्ञान है, जो स्थूल विज्ञान से भी सूक्ष्म और अधिक प्रभावी होता है | जो लोग ऐसे किसी योगी महापुरुष के सान्निध्य का लाभ लेते हैं, उनके लिये तो ब्रह्मचर्य का पालन सहज हो जाता है | उन्हें अलग से कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती |
हस्तमैथुन व स्वप्नदोष से कैसे बचें
यदि कोई हस्त मैथुन या स्वप्नदोष की समस्या से ग्रस्त है और वह इस रोग से छुटकारा पाने को वस्तुतः इच्छुक है, तो सबसे पहले तो मैं यह कहूँगा कि अब वह यह  चिंता छोड़ दे कि 'मुझे यह रोग है और अब मेरा क्या होगा ? क्या मैं फिर से स्वास्थ्य लाभ कर सकूँगा ?' इस प्रकार के निराशावादी विचारों को वह जड़मूल से उखाड़ फेंके |
सदैव प्रसन्न रहो
जो हो चुका वह बीत गया | बीती सो बीती, बीती ताही बिसार दे, आगे की सुधि लेय | एक तो रोग, फिर उसका चिंतन और भी रुग्ण बना देता है | इसलिये पहला काम तो यह करो कि दीनता के विचारों को तिलांजलि देकर प्रसन्न और प्रफुल्लित रहना प्रारंभ कर दो |
पीछे कितना वीर्यनाश हो चुका है, उसकी चिंता छोड़कर अब कैसे वीर्यरक्षण हो सके, उसके लिये उपाय करने हेतु कमर कस लो |
ध्यान रहे: वीर्यशक्ति का दमन नहीं करना है, उसे ऊर्ध्वगामी बनाना है | वीर्यशक्ति का उपयोग हम ठीक ढ़ंग से नहीं कर पाते | इसलिये इस शक्ति के ऊर्ध्वगमन के कुछ प्रयोग हम समझ लें |
वीर्य का ऊर्ध्वगमन क्या है ?
वीर्य के ऊर्ध्वगमन का अर्थ यह नहीं है कि वीर्य स्थूल रूप से ऊपर सहस्रार की ओर जाता है | इस विषय में कई लोग भ्रमित हैं | वीर्य तो वहीं रहता है, मगर उसे संचालित करनेवाली जो कामशक्ति है, उसका ऊर्ध्वगमन होता है | वीर्य को ऊपर चढ़ाने की नाड़ी शरीर के भीतर नहीं है | इसलिये शुक्राणु ऊपर नहीं जाते बल्कि हमारे भीतर एक वैद्युतिक चुम्बकीय शक्ति होती है जो नीचे की ओर बहती है, तब शुक्राणु सक्रिय होते हैं |
      इसलिये जब पुरुष की दृश्टि भड़कीले वस्त्रों पर पड़ती है या उसका मन स्त्री का चिंतन करता है, तब यही शक्ति उसके चिंतनमात्र से नीचे मूलाधार केन्द्र के नीचे जो कामकेन्द्र है, उसको सक्रिय कर, वीर्य को बाहर धकेलती है | वीर्य स्खलित होते ही उसके जीवन की उतनी कामशक्ति व्यर्थ में खर्च हो जाती है | योगी और तांत्रिक लोग इस सूक्ष्म बात से परिचित थे | स्थूल विज्ञानवाले जीवशास्त्री और डॉक्टर लोग इस बात को ठीक से समझ नहीं पाये इसलिये आधुनिकतम औजार होते हुए भी कई गंभीर रोगों को वे ठीक नहीं कर पाते जबकि योगी के दृष्टिपात मात्र या आशीर्वाद से ही रोग ठीक होने के चमत्कार हम प्रायः देखा-सुना करते हैं |
      आप बहुत योगसाधना करके ऊर्ध्वरेता योगी न भी बनो फिर भी वीर्यरक्षण के लिये इतना छोटा-सा प्रयोग तो कर ही सकते हो :
वीर्यरक्षा का महत्त्वपूर्ण प्रयोग
      अपना जो ‘काम-संस्थान’ है, वह जब सक्रिय होता है तभी वीर्य को बाहर धकेलता है | किन्तु निम्न प्रयोग द्वारा उसको सक्रिय होने से बचाना है |
      ज्यों ही किसी स्त्री के दर्शन से या कामुक विचार से आपका ध्यान अपनी जननेन्द्रिय की तरफ खिंचने लगे, तभी आप सतर्क हो जाओ | आप तुरन्त जननेन्द्रिय को भीतर पेट की तरफ़ खींचो | जैसे पंप का पिस्टन खींचते हैं उस प्रकार की क्रिया मन को जननेन्द्रिय में केन्द्रित करके करनी है | योग की भाषा में इसे योनिमुद्रा कहते हैं |
      अब आँखें बन्द करो | फिर ऐसी भावना करो कि मैं अपने जननेन्द्रिय-संस्थान से ऊपर सिर में स्थित सहस्रार चक्र की तरफ देख रहा हूँ | जिधर हमारा मन लगता है, उधर ही यह शक्ति बहने लगती है | सहस्रार की ओर वृत्ति लगाने से जो शक्ति मूलाधार में सक्रिय होकर वीर्य को स्खलित करनेवाली थी, वही शक्ति ऊर्ध्वगामी बनकर आपको वीर्यपतन से बचा लेगी | लेकिन ध्यान रहे : यदि आपका मन काम-विकार का मजा लेने में अटक गया तो आप सफल नहीं हो पायेंगे | थोड़े संकल्प और विवेक का सहारा लिया तो कुछ ही दिनों के प्रयोग से महत्त्वपूर्ण फायदा होने लगेगा | आप स्पष्ट महसूस करेंगे कि एक आँधी की तरह काम का आवेग आया और इस प्रयोग से वह कुछ ही क्षणों में शांत हो गया |
दूसरा प्रयोग
      जब भी काम का वेग उठे, फेफड़ों में भरी वायु को जोर से बाहर फेंको | जितना अधिक बाहर फेंक सको, उतना उत्तम | फिर नाभि और पेट को भीतर की ओर खींचो | दो-तीन बार के प्रयोग से ही काम-विकार शांत हो जायेगा और आप वीर्यपतन से बच जाओगे |
      यह प्रयोग दिखता छोटा-सा है, मगर बड़ा महत्त्वपूर्ण यौगिक प्रयोग है | भीतर का श्वास कामशक्ति को नीचे की ओर धकेलता है | उसे जोर से और अधिक मात्रा में बाहर फेंकने से वह मूलाधार चक्र में कामकेन्द्र को सक्रिय नहीं कर पायेगा | फिर पेट व नाभि को भीतर संकोचने से वहाँ खाली जगह बन जाती है | उस खाली जगह को भरने के लिये कामकेन्द्र के आसपास की सारी शक्ति, जो वीर्यपतन में सहयोगी बनती है, खिंचकर नाभि की तरफ चली जाती है और इस प्रकार आप वीर्यपतन से बच जायेंगे |
      इस प्रयोग को करने में न कोई खर्च है, न कोई विशेष स्थान ढ़ूँढ़ने की जरूरत है | कहीं भी बैठकर कर सकते हैं | काम-विकार न भी उठे, तब भी यह प्रयोग करके आप अनुपम लाभ उठा सकते हैं | इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है, पेट की  बीमारियाँ मिटती हैं, जीवन तेजस्वी बनता है और वीर्यरक्षण सहज में होने लगता है |
वीर्यरक्षक चूर्ण
      बहुत कम खर्च में आप यह चूर्ण बना सकते हैं | कुछ सुखे आँवलों से बीज अलग  करके उनके छिलकों को कूटकर उसका चूर्ण बना लो | आजकल बाजार में आँवलों का तैयार चूर्ण भी मिलता है | जितना चूर्ण हो, उससे दुगुनी मात्रा में मिश्री का चूर्ण उसमें मिला दो | यह चूर्ण उनके लिए भी हितकर है जिन्हें स्वप्नदोष नहीं होता हो |
 रोज रात्रि को सोने से आधा घंटा पूर्व पानी के साथ एक चम्मच यह चूर्ण ले लिया करो | यह चूर्ण वीर्य को गाढ़ा करता है, कब्ज दूर करता है, वात-पित्त-कफ के दोष मिटाता है और संयम को मजबूत करता है |
गोंद का प्रयोग
            6 ग्राम खेरी गोंद रात्रि को पानी में भिगो दो | इसे सुबह खाली पेट ले लो | इस प्रयोग के दौरान अगर भूख कम लगती हो तो दोपहर को भोजन के पहले अदरक व नींबू का रस मिलाकर लेना चाहिए |
 तुलसी: एक अदभुत औषधि
      प्रेन्च डॉक्टर विक्टर रेसीन ने कहा है : “तुलसी एक अदभुत औषधि है | तुलसी पर किये गये प्रयोगों ने यह सिद्ध कर दिया है कि रक्तचाप और पाचनतंत्र के नियमन में तथा मानसिक रोगों में तुलसी अत्यंत लाभकारी है | इससे रक्तकणों की वृद्धि होती है | मलेरिया तथा अन्य प्रकार के बुखारों में तुलसी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई है |
      तुलसी रोगों को तो दूर करती ही है, इसके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य की रक्षा करने एवं यादशक्ति बढ़ाने में भी अनुपम सहायता करती है | तुलसीदल एक उत्कृष्ट रसायन है | यह त्रिदोषनाशक है | रक्तविकार, वायु, खाँसी, कृमि आदि की निवारक है तथा हृदय के लिये बहुत हितकारी है |
ब्रह्मचर्य रक्षा हेतु मंत्र
      एक कटोरी दूध में निहारते हुए इस मंत्र का इक्कीस बार जप करें | तदपश्चात उस दूध को पी लें, ब्रह्मचर्य रक्षा में सहायता मिलती है | यह मंत्र सदैव मन में धारण करने योग्य है :
ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय
मनोभिलाषितं मनः स्तंभ कुरु कुरु स्वाहा |
 
 

पादपश्चिमोत्तानासन
विधि: जमीन पर आसन बिछाकर दोनों पैर सीधे करके बैठ जाओ | फिर दोनों हाथों से पैरों के अगूँठे पकड़कर झुकते हुए सिर को दोनों घुटनों से मिलाने का प्रयास करो | घुटने जमीन पर सीधे रहें | प्रारंभ में घुटने जमीन पर न टिकें तो कोई हर्ज नहीं | सतत अभ्यास से यह आसन सिद्ध हो जायेगा | यह आसन करने के 15 मिनट बाद एक-दो कच्ची भिण्डी खानी चाहिए | सेवफल का सेवन भी फायदा करता है |
लाभ: इस आसन से नाड़ियों की विशेष शुद्धि होकर हमारी कार्यक्षमता बढ़ती है और शरीर की बीमारियाँ दूर होती हैं | बदहजमी, कब्ज जैसे पेट के सभी रोग, सर्दी-जुकाम, कफ गिरना, कमर का दर्द, हिचकी, सफेद कोढ़, पेशाब की  बीमारियाँ, स्वप्नदोष, वीर्य-विकार, अपेन्डिक्स, साईटिका, नलों की सुजन, पाण्डुरोग (पीलिया), अनिद्रा, दमा, खट्टी ड्कारें, ज्ञानतंतुओं की कमजोरी, गर्भाशय के रोग, मासिकधर्म की अनियमितता व अन्य तकलीफें, नपुंसकता, रक्त-विकार, ठिंगनापन व अन्य कई प्रकार की बीमारियाँ यह आसन करने से दूर होती हैं |
      प्रारंभ में यह आसन आधा मिनट से शुरु करके प्रतिदिन थोड़ा बढ़ाते हुए 15 मिनट तक कर सकते हैं | पहले 2-3 दिन तकलीफ होती है, फिर सरल हो जाता है |
      इस आसन से शरीर का कद लम्बा होता है | यदि शरीर में मोटापन है तो वह दूर होता है और यदि दुबलापन है तो वह दूर होकर शरीर सुडौल, तन्दुरुस्त अवस्था में आ जाता है | ब्रह्मचर्य पालनेवालों के लिए यह आसन भगवान शिव का प्रसाद है | इसका प्रचार पहले शिवजी ने और बाद में जोगी गोरखनाथ ने किया था |
पादांगुष्ठानासन
 इस में शरीर का भार केवल पाँव के अँगूठे पर आने से इसे 'पादाँगुष्ठानासन' कहते हैं। वीर्य की रक्षा व ऊर्ध्वगमन हेतु महत्त्वपूर्ण होने से सभी को विशेषतः बच्चों व युवाओं को यह आसन अवश्य करना चाहिए।
लाभः अखण्ड ब्रह्मचर्य की सिद्धि, वज्रनाड़ी (वीर्यनाड़ी) व मन पर नियंत्रण तथा वीर्यशक्ति को ओज में रूपांतरित करने में उत्तम है। मस्तिष्क स्वस्थ रहता है व बुद्धि की स्थिरता व प्रखरता शीघ्र प्राप्त होती है। रोगी-नीरोगी सभी के लिए लाभप्रद है।
रोगों में लाभः स्वप्नदोष, मधुमेह, नपुंसकता व समस्त वीर्योदोषों में लाभप्रद है।
विधिः पंजों के बल बैठ जायें। बायें पैर की एड़ी सिवनी (गुदा व जननेन्द्रिये के बीच का स्थान) पर लगायें। दोनों हाथों की उंगलियाँ ज़मीन पर रखकर दायाँ पैर बायीं जंघा पर रखें। सारा भार बायें पंजे पर (विशेषतः अँगुठे पर) संतुलित करके हाथ कमर पर या नमस्कार की मुद्रा में रखें। प्रारम्भ में कुछ दिन आधार लेकर कर सकते हैं। कमर सीधी व शरीर स्थिर रहे। श्वास सामान्य, दृष्टि आगे किसी बिंदु पर एकाग्र व ध्यान संतुलन रखने में हों। यही क्रिया पैर बदल कर भी करें।
समयः प्रारंभ में दोनों पैरों से आधा-एक मिनट। दोनों पैरों को एक समान समय देकर यथासंभव बढ़ा सकते हैं।
सावधानीः अंतिम स्थिती में आने की शीघ्रता न करें, क्रमशः अभ्यास बढ़ायें। इसे दिन भर में दो-तीन बार कभी भी कर सकते हैं। किन्तु भोजन के तुरन्त बाद न करें।
बुद्धिशक्तिवर्धक प्रयोगः
लाभः इसके नियमित अभ्यास से ज्ञानतन्तु पुष्ट होते हैं। चोटी के स्थान के नीचे गाय के खुर के आकार वाला बुद्धिमंडल है, जिस पर इस प्रयोग का विशेष प्रभाव पड़ता है और बुद्धि ब धारणाशक्ति का विकास होता है।
विधिः सीधे खड़े हो जायें। हाथों की मुट्ठियाँ बंद करके हाथों को शरीर से सटाकर रखें। सिर पीछे की तरफ ले जायें। दृष्टि आसमान की ओर हो। इस स्थिति में 25 बार गहरा श्वास लें और छोड़ें। मूल स्थिती में आ जायें।
मेधाशक्तिवर्धक प्रयोगः
 लाभः इसके नियमित अभ्यास से मेधाशक्ति बढ़ती है।
विधिः सीधे खड़े हो जायें। हाथों की मुट्ठियाँ बंद करके हाथों को शरीर से सटाकर रखें।
आँखें बंद करके सिर को नीचे की तरफ इस तरफ झुकायें कि ठोढ़ी कंठकूप से लगी रहे और कंठकूप पर हलका-सा दबाव पड़े। इस स्थिती में 25 बार गहरा श्वास लें और छोड़ें। मूल स्थिती में आ जायें।
विशेषः श्वास लेते समय मन में 'ॐ' का जप करें व छोड़ते समय उसकी गिनती करें।
ध्यान दें- प्रत्येक प्रयोग सुबह खाली पेट 15 बार करें, फिर धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 25 बार तक कर सकते हैं।
हमारे अनुभव
महापुरुष के दर्शन का चमत्कार
      “पहले मैं कामतृप्ति में ही जीवन का आनन्द मानता था | मेरी दो शादियाँ हुईं परन्तु दोनों पत्नियों के देहान्त के कारण अब तीसरी शादी 17 वर्ष की लड़की से करने को तैयार हो गया | शादी से पूर्व मैं परम पूज्य स्वामी श्री लीलाशाहजी महारज का आशीर्वाद लेने डीसा आश्रम में जा पहुँचा |
      आश्रम में वे तो नहीं मिले मगर जो महापुरुष मिले उनके दर्शनमात्र से न जाने क्या हुआ कि मेरा सारा भविष्य ही बदल गया | उनके योगयुक्त विशाल नेत्रों में न जाने कैसा तेज चमक रहा था कि मैं अधिक देर तक उनकी ओर देख नहीं सका और मेरी नजर उनके चरणों की ओर झुक गई | मेरी कामवासना तिरोहित हो गई | घर पहुँचते ही शादी से इन्कार कर दिया | भाईयों ने एक कमरे में उस 17 वर्ष की लड़की के साथ मुझे बन्द कर दिया |
      मैंने कामविकार  को  जगाने के कई उपाय किये, परन्तु सब निरर्थक सिद्ध हुआ … जैसे, कामसुख की चाबी उन महापुरुष के पास ही रह गई हो ! एकान्त कमरे में आग और पेट्रोल जैसा संयोग था फिर भी !
      मैंने निश्चय किया कि अब मैं उनकी छ्त्रछाया को नहीं छोड़ूँगा, भले कितना ही विरोध सहन करना पड़े | उन महापुरुष को मैंने अपना मार्गदर्शक बनाया | उनके सान्निध्य में रहकर कुछ यौगिक क्रियाएँ सीखीं | उन्होंने मुझसे ऐसी साधना करवाई कि जिससे शरीर की सारी पुरानी व्याधियाँ जैसे मोटापन, दमा, टी.बी., कब्ज और छोटे-मोटे कई रोग आदि निवृत हो गये |
      उन महापुरुष का नाम है परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू | उन्हींके सान्निध्य में मैं अपना जीवन धन्य कर रहा हूँ | उनका जो अनुपम उपकार मेरे ऊपर हुआ है, उसका बदला तो मैं अपना सम्पूर्ण लौकिक वैभव समर्पण करके भी चुकाने में असमर्थ हूँ |”
                              -महन्त चंदीराम ( भूतपूर्व चंदीराम कृपालदास )
संत श्री आसारामजी आश्रम, साबरमति, अमदावाद |
मेरी वासना उपासना में बदली
“आश्रम द्वारा प्रकाशित “यौवन सुरक्षा” पुस्तक पढ़ने से मेरी दृष्टि अमीदृष्टि हो गई | पहले परस्त्री को एवं हम उम्र की लड़कियों को देखकर मेरे मन में वासना और कुदृष्टि का भाव पैदा होता था लेकिन यह पुस्तक पढ़कर मुझे जानने को मिला कि: ‘स्त्री एक वासनापूर्ति की वस्तु नहीं है, परन्तु शुद्ध प्रेम और शुद्ध भावपूर्वक जीवनभर साथ रहनेवाली एक शक्ति है |’ सचमुच इस ‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक को पढ़कर मेरे अन्दर की वासना, उपासना में बदल गयी है |”
                                                -मकवाणा रवीन्द्र रतिभाई
                                    एम. के. जमोड हाईस्कूल, भावनगर (गुज)
‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक आज के युवा वर्ग के लिये एक अमूल्य भेंट है
      “सर्वप्रथम मैं पूज्य बापू का एवं श्री योग वेदान्त सेवा समिति का आभार प्रकट करता हूँ |
      ‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक आज के युवा वर्ग के लिये अमूल्य भेंट है | यह पुस्तक युवानों के लिये सही दिशा दिखानेवाली है |
      आज के युग में युवानों के लिये वीर्यरक्षण अति कठिन है | परन्तु इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि वीर्यरक्षण करना सरल है | ‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक आज  के युवा वर्ग को सही युवान बनने की प्रेरणा देती है | इस पुस्तक में मैने ‘अनुभव-अमृत’ नामक पाठ पढ़ा | उसके बाद ऐसा लगा कि संत दर्शन करने से वीर्यरक्षण की प्रेरणा मिलती है | यह बात नितांत सत्य है | मैं हरिजन जाति का हूँ | पहले मांस, मछली, लहसुन, प्याज आदि सब खाता था लेकिन ‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक पढ़ने के बाद मुझे मांसाहार से सख्त नफरत हो गई है | उसके बाद मैंने इस पुस्तक को दो-तीन बार पढ़ा है | अब मैं मांस नहीं खा सकता हूँ | मुझे मांस से नफरत सी हो गई है | इस पुस्तक को पढ़ने से मेरे मन पर काफी प्रभाव पड़ा है | यह पुस्तक मनुष्य के जीवन को समृद्ध बनानेवाली है और वीर्यरक्षण की शक्ति प्रदान करने वाली है |
      यह पुस्तक आज के युवा वर्ग के लिये एक अमूल्य भेंट है | आज के युवान जो कि 16 वर्ष से 17 वर्ष की उम्र तक ही वीर्यशक्ति का व्यय कर देते हैं और दीन-हीन, क्षीणसंकल्प, क्षीणजीवन होकर अपने लिए व औरों के लिए भी खूब दुःखद हो जाते हैं, उनके लिए यह पुस्तक सचमुच प्रेरणादायक है | वीर्य ही शरीर का तेज है, शक्ति है, जिसे आज का युवा वर्ग नष्ट कर देता है | उसके लिए जीवन में विकास करने का उत्तम मार्ग तथा दिग्दर्शक यह ‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक है | तमाम युवक-युवतियों को यह पुस्तक पूज्य  बापू  की आज्ञानुसार पाँच बार अवश्य पढ़नी चाहिए | इससे बहुत लाभ होता है |”
-राठौड निलेश दिनेशभाई
‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक नहीं, अपितु एक शिक्षा ग्रन्थ है
      “यह ‘यौवन सुरक्षा’ एक पुस्तक नहीं अपितु एक शिक्षा ग्रन्थ है, जिससे हम विद्यार्थियों को संयमी जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है | सचमुच इस अनमोल ग्रन्थ को पढ़कर एक अदभुत प्रेरणा तथा उत्साह मिलता है | मैंने इस पुस्तक में कई ऐसी बातें पढ़ीं जो शायद ही कोई हम बालकों को बता व समझा सके | ऐसी शिक्षा मुझे आज तक किसी दूसरी पुस्तक से नहीं मिली | मैं इस पुस्तक को जनसाधारण तक पहुँचाने वालों को प्रणाम करता हूँ तथा उन महापुरुष महामानव को शत-शत प्रणाम करता हूँ जिनकी प्रेरणा तथा आशीर्वाद से इस पुस्तक की रचना हुई |”
हरप्रीत सिंह अवतार सिंह
कक्षा-7, राजकीय हाईस्कूल, सेक्टर-24 चण्डीगढ़
ब्रह्मचर्य ही जीवन है
ब्रह्मचर्य के बिना जगत में, नहीं किसीने यश पाया |
ब्रह्मचर्य से परशुराम ने, इक्कीस बार धरणी जीती |
ब्रह्मचर्य से वाल्मीकी ने, रच दी रामायण नीकी |
ब्रह्मचर्य के बिना जगत में, किसने जीवन रस पाया ?
ब्रह्मचर्य से रामचन्द्र ने, सागर-पुल बनवाया था |
ब्रह्मचर्य से लक्ष्मणजी ने मेघनाद मरवाया था |
ब्रह्मचर्य के बिना जगत में, सब ही को परवश पाया |
ब्रह्मचर्य से महावीर ने, सारी लंका जलाई थी |
ब्रह्मचर्य से अगंदजी ने, अपनी पैज जमाई थी |
ब्रह्मचर्य के बिना जगत में, सबने ही अपयश पाया |
ब्रह्मचर्य से आल्हा-उदल ने, बावन किले गिराए थे |
पृथ्वीराज दिल्लीश्वर को भी, रण में मार भगाए थे |
ब्रह्मचर्य के बिना जगत में, केवल विष ही विष पाया |
ब्रह्मचर्य से भीष्म पितामह, शरशैया पर सोये थे |
ब्रह्मचारी वर शिवा वीर से, यवनों के दल रोये थे |
ब्रह्मचर्य के रस के भीतर, हमने तो षटरस पाया |
ब्रह्मचर्य से राममूर्ति ने, छाती पर पत्थर तोड़ा |
लोहे की जंजीर तोड़ दी, रोका मोटर का जोड़ा |
ब्रह्मचर्य है सरस जगत में, बाकी को करकश पाया |
शास्त्रवचन
राजा जनक शुकदेवजी से बोले :
      “बाल्यावस्था में विद्यार्थी को तपस्या, गुरु की सेवा, ब्रह्मचर्य का पालन एवं वेदाध्ययन करना चाहिए |”
तपसा गुरुवृत्त्या च ब्रह्मचर्येण वा विभो |
- महाभारत में मोक्षधर्म पर्व
संकल्पाज्जायते कामः सेव्यमानो विवर्धते |
यदा प्राज्ञो विरमते तदा सद्यः प्रणश्यति ||
     “काम संकल्प से उत्पन्न होता है | उसका सेवन किया जाये तो बढ़ता है और जब बुद्धिमान् पुरुष उससे विरक्त हो जाता है, तब वह काम तत्काल नष्ट हो जाता है |”
-महाभारत में आपद्धर्म पर्व
“राजन्  (युधिष्ठिर)! जो मनुष्य आजन्म पूर्ण ब्रह्मचारी रहता है, उसके लिये इस संसार में कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है, जो वह प्राप्त न कर सके | एक मनुष्य चारों वेदों को जाननेवाला हो और दूसरा पूर्ण ब्रह्मचारी हो तो इन दोनों में ब्रह्मचारी ही श्रेष्ठ है |”
-भीष्म पितामह
“मैथुन संबंधी ये प्रवृतियाँ सर्वप्रथम तो तरंगों की भाँति ही प्रतीत होती हैं, परन्तु आगे चलकर ये कुसंगति के कारण एक विशाल समुद्र का रूप धारण कर लेती हैं | कामसबंधी वार्तालाप कभी श्रवण न करें |”
-नारदजी
“जब कभी भी आपके मन में अशुद्ध विचारों के साथ किसी स्त्री के स्वरूप की कल्पना उठे तो आप ‘ॐ दुर्गा देव्यै नमः’ मंत्र का बार-बार उच्चारण करें और मानसिक प्रणाम करें |”
-शिवानंदजी
“जो विद्यार्थी ब्रह्मचर्य के द्वारा भगवान के लोक को प्राप्त कर लेते हैं, फिर उनके लिये ही   वह स्वर्ग है | वे किसी भी लोक में क्यों न हों, मुक्त हैं |”
-छान्दोग्य उपनिषद
“बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि वह विवाह न करे | विवाहित जीवन को एक प्रकार का दहकते हुए अंगारों से भरा हुआ खड्डा समझे | संयोग या संसर्ग से इन्द्रियजनित ज्ञान की उत्पत्ति होती है, इन्द्रिजनित ज्ञान से तत्संबंधी सुख को प्राप्त करने की अभिलाषा दृढ़ होती है, संसर्ग से दूर रहने पर जीवात्मा सब प्रकार के पापमय जीवन से मुक्त रहता है |”
-महात्मा बुद्ध
भृगुवंशी ॠषि जनकवंश के राजकुमार से कहते हैं :
मनोऽप्रतिकूलानि प्रेत्य चेह च वांछसि |
भूतानां प्रतिकूलेभ्यो निवर्तस्व यतेन्द्रियः ||
“यदि तुम इस लोक और परलोक में अपने मन के अनुकूल वस्तुएँ पाना चाहते हो तो अपनी इन्द्रियों को संयम में रखकर समस्त प्राणियों के प्रतिकूल आचरणों से दूर हट जाओ |”
                                    –महाभारत में मोक्षधर्म पर्व: 3094
भस्मासुर क्रोध से बचो
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार- ये सब विकार आत्मानंदरूपी धन को हर लेनेवाले शत्रु हैं | उनमें भी क्रोध सबसे अधिक हानिकर्त्ता है | घर में चोरी हो जाए तो कुछ-न-कुछ सामान बच जाता है, लेकिन घर में यदि आग लग जाये तो सब भस्मीभूत हो जाता है | भस्म के सिवा कुछ नही बचता |
इसी प्रकार हमारे अंतःकरण में लोभ, मोहरूपी चोर आये तो कुछ पुण्य क्षीण होते हैं लेकिन क्रोधरूपी आग लगे तो हमारा तमाम जप, तप, पुण्यरूपी धन भस्म हो जाता है | अंतः सावधान होकर क्रोधरूपी भस्मासुर से बचो | क्रोध का अभिनय करके फुफकारना ठीक है, लेकिन क्रोधाग्नि तुम्हारे अतःकरण को जलाने न लगे, इसका ध्यान रखो |
25 मिनट तक चबा-चबाकर भोजन करो | सात्त्विक आहर लो | लहसुन, लाल मिर्च और तली हुई चीजों से दूर रहो | क्रोध आवे तब हाथ की अँगुलियों के नाखून हाथ की गद्दी पर दबे, इस प्रकार मुठ्ठी बंद करो |
एक महीने तक किये हुए जप-तप से चित्त की जो योग्यता बनती है वह एक बार क्रोध करने से नष्ट हो जाती है | अतः मेरे प्यारे भैया ! सावधान रहो | अमूल्य मानव देह ऐसे ही व्यर्थ न खो देना |
दस ग्राम शहद, एक गिलास पानी, तुलसी के पत्ते और संतकृपा चूर्ण मिलाकर बनाया हुआ शर्बत यदि हररोज सुबह में लिया जाए तो चित्त की प्रसन्नता बढ़ती है | चूर्ण और तुलसी नहीं मिले तो केवल शहद ही लाभदायक है | डायबिटिज के रोगियों को शहद नहीं लेना चाहिए |
हरि ॐ
ब्रह्माचर्य-रक्षा का मंत्र
ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय मनोभिलाषतं मनः स्तंभ कुरु कुरु स्वाहा।
रोज दूध में निहार कर 21 बार इस मंत्र का जप करें और दूध पी लें। इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है। स्वभाव में आत्मसात् कर लेने जैसा यह नियम है।
पावन उदगार
सुख-शांति व स्वास्थ्य का प्रसाद बाँटने के लिए ही बापू जी का अवतरण हुआ है।
"मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र श्री आसाराम जी बापू से मैं पूर्वकाल से हृदयपूर्वक परिचित हूँ। संसार में सुखी रहने के लिए समस्त जनता को शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शांति दोनों आवश्यक हैं। सुख-शांति व स्वास्थ्य का प्रसाद बाँटने के लिए ही इन संत का, महापुरुष का अवतरण हुआ है। आज के संतों-महापुरुषों में प्रमुख मेरे प्रिय मित्र बापूजी हमारे भारत देश के, हिन्दू जनता के, आम जनता के, विश्ववासियों के उद्धार के लिए रात-दिन घूम-घूमकर सत्संग, भजन, कीर्तन आदि द्वारा सभी विषयों पर मार्गदर्शन दे रहें हैं। अभी में गले में थोड़ी तकलीफ है तो उन्होंने तुरन्त मुझे दवा बताई। इस प्रकार सबके स्वास्थ्य और मानसिक शांति, दोनों के लिए उनका जीवन समर्पित है। वे धनभागी हैं जो लोगों को बापूजी के सत्संग व सान्निध्य में लाने का दैवी कार्य करते हैं।"
काँची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जगदगुरु श्री जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज।
हर व्यक्ति जो निराश है उसे आसाराम जी की ज़रूरत है
"श्रद्धेय-वंदनीय जिनके दर्शन से कोटि-कोटि जनों के आत्मा को शांति मिली है व हृदय उन्नत हुआ है, ऐसे महामनीषि संत श्री आसारामजी के दर्शन करके आज मैं कृतार्थ हुआ। जिस महापुरुष ने, जिस महामानव ने, जिस दिव्य चेतना से संपन्न पुरुष ने इस धरा पर धर्म, संस्कृति, अध्यात्म और भारत की उदात्त परंपराओं को पूरी ऊर्जा (शक्ति) से स्थापित किया है, उस महापुरुष के मैं दर्शन न करूँ ऐसा तो हो ही नहीं सकता। इसलिए मैं स्वयं यहाँ आकर अपने-आपको धन्य और कृतार्थ महसूस कर रहा हूँ। मेरे प्रति इनका जो स्नेह है यह तो मुझ पर इनका आशीर्वाद है और बड़ों का स्नेह तो हमेशा रहता ही है छोटों के प्रति। यहाँ पर मैं आशीर्वाद लेने के लिए आया हूँ।
मैं समझता हूँ कि जीवन में लगभग हर व्यक्ति निराश है और उसको आसारामजी की ज़रूरत है। देश यदि ऊँचा उठेगा, समृद्ध बनेगा, विकसित होगा तो अपनी प्राचीन परंपराओं, नैतिक मूल्यों और आदर्शों से ही होगा और वह आदर्शों, नैतिक मूल्यों, प्राचीन सभ्यता, धर्म-दर्शन और संस्कृति का जो जागरण है, वह आशाओ के राम बनने से ही होगा। इसलिए श्रद्धेय, वंदनीय महाराज श्री 'आसाराम जी' की सारी दुनिया को जरूरत है। बापू जी के चरणों में प्रार्थना करते हुए कि आप दिशा देते रहना, राह दिखाते रहना, हम भी आपके पीछे-पीछे चलते रहेंगे और एक दिन मंजिल मिलेगी ही, पुनः आपके चरणों में वंदन!"
प्रसिद्ध योगाचार्य श्री रामदेव जी महाराज।
बापू नित्य नवीन, नित्य वर्धनीय आनंदस्वरूप हैं
"परम पूज्य बापू के दर्शन करके मैं पहले भी आ चुका हूँ। दर्शन करके 'दिने-दिने नवं-नवं प्रतिक्षण वर्धनाम्' अर्थात बापू नित्य नवीन, नित्य वर्धनीय आनंदस्वरूप हैं, ऐसा अनुभव हो रहा है और यह स्वाभाविक ही है। पूज्य बापू जी को प्रणाम!"
सुप्रसिद्ध कथाकार संत श्री मोरारी बापू।
पुण्य संचय व ईश्वर की कृपा का फलः ब्रह्मज्ञान का दिव्य सत्संग
"ईश्वर की कृपा होती है तो मनुष्य जन्म मिलता है। ईश्वर की अतिशय कृपा होती है तो मुमुक्षत्व का उदय होता है परन्तु जब अपने पूर्वजन्मों के पुण्य इकट्ठे होते हैं और ईश्वर की परम कृपा होती है तब ऐसा ब्रह्मज्ञान का दिव्य सत्संग सुनने को मिलता है, जैसा पूज्यपाद बापूजी के श्रीमुख से आपको यहाँ सुनने को मिल रहा है।"
प्रसिद्ध कथाकार सुश्री कनकेश्वरी देवी।
बापू जी का सान्निध्य गंगा के पावन प्रवाह जैसा है
"कल-कल करती इस भागीरथी की धवल धारा के किनारे पर पूज्य बापू जी के सान्निध्य में बैठकर मैं बड़ा ही आह्लादित व प्रमुदित हूँ... आनंदित हूँ... रोमाँचित हूँ...
गंगा भारत की सुषुम्ना नाड़ी है। गंगा भारत की संजीवनी है। श्री विष्णुजी के चरणों से निकलकर ब्रह्माजी के कमण्डलु व जटाधर के माथे पर शोभायमान गंगा त्रैयोगसिद्धिकारक है। विष्णुजी के चरणों से निकली गंगा भक्तियोग की प्रतीति कराती है और शिवजी के मस्तक पर स्थित गंगा ज्ञानयोग की उच्चतर भूमिका पर आरूढ़ होने की खबर देती है। मुझे ऐसा लग रहा है कि आज बापूजी के प्रवचनों को सुनकर मैं गंगा में गोता लगा रहा हूँ क्योंकि उनका प्रवचन, उनका सान्निध्य गंगा के पावन प्रवाह जैसा है।
वे अलमस्त फकीर हैं। वे बड़े सरल और सहज हैं। वे जितने ही ऊपर से सरल हैं, उतने ही अंतर में गूढ़ हैं। उनमें हिमालय जैसी उच्चता, पवित्रता, श्रेष्ठता है और सागरतल जैसी गम्भीरता है। वे राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। उन्हें देखकर ऋषि-परम्परा का बोध होता है। गौतम, कणाद, जैमिनि, कपिल, दादू, मीरा, कबीर, रैदास आदि सब कभी-कभी उनमें दिखते हैं।
रे भाई! कोई सत्गुरु संत कहावे, जो नैनन अलख लखावे।
धरती उखाड़े, आकाश उखाड़े, अधर मड़इया धावे।
शून्य शिखर के पार शिला पर, आसन अचल जमावे।।
रे भाई! कोई सत्गुरु संत कहावे.....
ऐसे पावन सान्निध्य में हम बैठे हैं जो बड़ा दुर्लभ व सहज योगस्वरूप है। ऐसे महापुरुष के लिए पंक्तियाँ याद आ रही हैं- तुम चलो तो चले धरती, चले अंबर, चले दुनिया...
ऐसे महापुरुष चलते हैं तो उनके लिए सूर्य, चंद्र, तारे, ग्रह, नक्षत्र आदि सब अनुकूल हो जाते हैं। ऐसे इन्द्रियातीत, गुणातीत, भावातीत, शब्दातीत और सब अवस्थाओं से परे किन्हीं महापुरुष के श्रीचरणों में जब बैठते हैं तो .... भागवत कहता हैः साधुनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धिकरं परम्। साधुओं के दर्शनमात्र से विचार, विभूति, विद्वता, शक्ति, सहजता, निर्विषयता, प्रसन्नता, सिद्धियाँ व आत्मानंद की प्राप्ति होती है।
देश के महान संत यहाँ सहज ही आते हैं, भारत के सभी शंकराचार्य भी आते हैं। मेरे मन में भी विचार आया कि जहाँ सब आते हैं, वहाँ जाना चाहिए क्योंकि यही वह ठौर-ठिकाना है, जहाँ मन का अभिमान मिटाया जा सकता है। ऐसे महापुरुषों के दर्शन से केवल आनंद व मस्ती ही नहीं बल्कि वह सब कुछ मिल जाता है जो अभिलषित है, आकांक्षित है, लक्षित है। यहाँ मैं करुणा, कर्मठता, विवेक-वैराग्य व ज्ञान के दर्शन कर रहा हूँ। वैराग्य और भक्ति के रक्षण, पोषण व संवर्धन क लिए यह सप्तऋषियों का उत्तम ज्ञान जाना जाता है। आज गंगा अगर फिर से साकार दिख रही है तो वे बापू जी के विचार व वाणी में दिख रही है। अलमस्तता, सहजता, उच्चता, श्रेष्ठता, पवित्रता, तीर्थ-सी शुचिता, शिशु-सी सरलता, तरुणों-सा जोश, वृद्धों-सा गांभीर्य और ऋषियों जैसा ज्ञानावबोध मुझे जहाँ हो रहा है, वह पंडाल है। इसे आनंदगर कहूँ या प्रेमनगर? करुणा का सागर कहूँ या विचारों का समन्दर?... लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि मेरे मन का कोना-कोना आह्लादित हो रहा है। आपलोग बड़भागी है जो ऐसे महापुरुष के श्रीचरणों में बैठे हैं, जहाँ भाग्य का, दिव्य व्यक्तित्व का निर्माण होता है। जीवन की कृतकृत्यता जहाँ प्राप्त हो सकती है वह यही दर है।
मिले तुम मिली मंजिल, मिला मकसद और मुद्दा भी।
न मिले तुम तो रह गया मुद्दा, मकसद और मंजिल भी।।
आपका यह भावराज्य व प्रेमराज्य देखकर मैं चकित भी हूँ और आनंद का भी अनुभव कर रहा हूँ। मुझे लगता है कि बापू जी सबके आत्मसूर्य हैं। आपके प्रति मेरा विश्वास व अटूट निष्ठा बढ़े इस हेतु मेरा नमन स्वीकार करें।"
स्वामी अवधेशानंदजी महाराज, हरिद्वार।
भगवन्नाम का जादू
"संतश्री आसारामजी बापू के यहाँ सबसे अधिक जनता आती है कारण कि इनके पास भगवन्नाम-संकीर्तन का जादू, सरल व्यवहार, प्रेमरसभरी वाणी तथा जीवन के मूल प्रश्नों का उत्तर भी है।"
विरक्तशिरोमणि श्री वामदेवजी महाराज।
"स्वामी आसारामजी के पास भ्रांति तोड़ने की दृष्टि मिलती है।"
युगपुरुष स्वामी श्री परमानंदजी महाराज।
"आसारामजी महाराज ऐसी शक्ति के धनी हैं कि दृष्टिपातमात्र से लाखों लोगों के ज्ञानचक्षु खोलने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।"
लोकलाडले स्वामी श्री ब्रह्मानंदगिरीजी महाराज।
"हमारे पूज्य आसारामजी बापू बहुत ही कम समय में संस्कृति का जतन और उत्थान करने वाले संत हैं।"
आचार्य श्री गिरीराज किशोरजी, विश्वहिन्दू परिषद।
पूज्यश्री के सत्संग में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयीजी के उदगार
"पूज्य बापूजी के भक्तिरस में डूबे हुए श्रोता भाई-बहनों! मैं यहाँ पर पूज्य बापूजी का अभिनंदन करने आया हूँ.... उनका आशीर्वचन सुनने आया हूँ.... भाषण देने य बकबक करने नहीं आया हूँ। बकबक तो हम करते रहते हैं। बापू जी का जैसा प्रवचन है, कथा-अमृत है, उस तक पहुँचने के लिए बड़ा परिश्रम करना पड़ता है। मैंने पहले उनके दर्शन पानीपत में किये थे। वहाँ पर रात को पानीपत में पुण्य प्रवचन समाप्त होते ही बापूजी कुटीर में जा रहे थे.. तब उन्होंने मुझे बुलाया। मैं भी उनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए लालायित था। संत-महात्माओँ के दर्शन तभी होते हैं, उनका सान्निध्य तभी मिलता है जब कोई पुण्य जागृत होता है।
इस जन्म में मैंने कोई पुण्य किया हो इसका मेरे पास कोई हिसाब तो नहीं है किंतु जरुर यह पूर्व जन्म के पुण्यों का फल है जो बापू जी के दर्शन हुए। उस दिन बापूजी ने जो कहा, वह अभी तक मेरे हृदय-पटल पर अंकित हैं। देशभर की परिक्रमा करते हुए जन-जन के मन में अच्छे संस्कार जगाना, यह एक ऐसा परम राष्ट्रीय कर्तव्य है, जिसने हमारे देश को आज तक जीवित रखा है और इसके बल पर हम उज्जवल भविष्य का सपना देख रहे हैं... उस सपने को साकार करने की शक्ति-भक्ति एकत्र कर रहे हैं।
पूज्य बापूजी सारे देश में भ्रमण करके जागरण का शंखनाद कर रहे हैं, सर्वधर्म-समभाव की शिक्षा दे रहे हैं, संस्कार दे रहे हैं तथा अच्छे और बुरे में भेद करना सिखा रहे हैं।
हमारी जो प्राचीन धरोहर थी और हम जिसे लगभग भूलने का पाप कर बैठे थे, बापू जी हमारी आँखों में ज्ञान का अंजन लगाकर उसको फिर से हमारे सामने रख रहे हैं। बापूजी ने कहा कि ईश्वर की कृपा से कण-कण में व्याप्त एक महान शक्ति के प्रभाव से जो कुछ घटित होता है, उसकी छानबीन और उस पर अनुसंधान करना चाहिए।
पूज्य बापूजी ने कहा कि जीवन के व्यापार में से थोड़ा समय निकाल कर सत्संग में आना चाहिए। पूज्य बापूजी उज्जैन में थे तब मेरी जाने की बहुत इच्छा थी लेकिन कहते हैं न, कि दाने-दाने पर खाने वाले की मोहर होती है, वैसे ही संत-दर्शन के लिए भी कोई मुहूर्त होता है। आज यह मुहूर्त आ गया है। यह मेरा क्षेत्र है। पूज्य बापू जी ने चुनाव जीतने का तरीका भी बता दिया है।
आज देश की दशा ठीक नहीं है। बापू जी का प्रवचन सुनकर बड़ा बल मिला है। हाल में हुए लोकसभा अधिवेशन के कारण थोड़ी-बहुत निराशा हुई थी किन्तु रात को लखनऊ में पुण्य प्रवचन सुनते ही वह निराशा भी आज दूर हो गयी। बापू जी ने मानव जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति-शक्ति की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ चतुष्टय, भक्ति के लिए समर्पण की भावना तथा ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों का उल्लेख किया है। भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं है। ज्ञान अभिमान पैदा करता है। भक्ति में पूर्ण समर्पण होता है। 13 दिन के शासनकाल के बाद मैंने कहाः "मेरा जो कुछ है, तेरा है।" यह तो बापू जी की कृपा है कि श्रोता को वक्ता बना दिया और वक्ता को नीचे से ऊपर चढ़ा दिया। जहाँ तक ऊपर चढ़ाया है वहाँ तक ऊपर बना रहूँ इसकी चिंता भी बापू जी को करनी पड़ेगी।
राजनीति की राह बड़ी रपटीली है। जब नेता गिरता है तो यह नहीं कहता कि मैं गिर गया बल्कि कहता हैः "हर हर गंगे।" बापू जी का प्रवचन सुनकर बड़ा आनंद आया। मैं लोकसभा का सदस्य होने के नाते अपनी ओर से एवं लखनऊ की जनता की ओर से बापू जी के चरणों में विनम्र होकर नमन करना चाहता हूँ।
उनका आशीर्वाद हमें मिलता रहे, उनके आशीर्वाद से प्रेरणा पाकर बल प्राप्त करके हम कर्तव्य के पथ पर निरन्तर चलते हुए परम वैभव को प्राप्त करें, यही प्रभु से प्रार्थना है।"
श्री अटल बिहारी वाजपेयी, प्रधानमंत्री, भारत सरकार।
परम पूज्य बापू संत श्री आसारामजी बापू के कृपा-प्रसाद से परिप्लावित हृदयों के उदगार
पू. बापूः राष्ट्रसुख के संवर्धक
"पूज्य बापू द्वारा दिया जाने वाला नैतिकता का संदेश देश के कोने-कोने में जितना अधिक प्रसारित होगा, जितना अधिक बढ़ेगा, उतनी ही मात्रा में राष्ट्रसुख का संवर्धन होगा, राष्ट्र की प्रगति होगी। जीवन के हर क्षेत्र में इस प्रकार के संदेश की जरूरत है।"
(श्री लालकृष्ण आडवाणी, उपप्रधानमंत्री एवं केन्द्रीय गृहमंत्री, भारत सरकार।)
राष्ट्र उनका ऋणी है
भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर, दिल्ली के स्वर्ण जयन्ती पार्क में 25 जुलाई 1999 को बापू जी की अमृतवाणी का रसास्वादन करने के पश्चात बोलेः
"आज पूज्य बापू जी की दिव्य वाणी का लाभ लेकर मैं धन्य हो गया। संतों की वाणी ने हर युग में नया संदेश दिया है, नयी प्रेरणा जगायी है। कलह, विद्रोह और द्वेष से ग्रस्त वर्तमान वातावरण में बापू जिस तरह सत्य, करुणा और संवेदनशीलता के संदेश का प्रसार कर रहे हैं, इसके लिए राष्ट्र उनका ऋणी है।"
(श्री चन्द्रशेखर, भूतपूर्व प्रधानमंत्री, भारत सरकार।)
गरीबों व पिछड़ों को ऊपर उठाने के कार्य चालू रहें
"गरीबों और पिछड़ों को ऊपर उठाने का कार्य आश्रम द्वारा चलाये जा रहे हैं, मुझे प्रसन्नता है। मानव-कल्याण के लिए, विशेषतः, प्रेम व भाईचारे के संदेश के माध्यम से किये जा रहे विभिन्न आध्यात्मिक एवं मानवीय प्रयास समाज की उन्नति के लिए सराहनीय हैं।"
डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम, राष्ट्रपति, भारत गणतंत्र।
सराहनीय प्रयासों की सफलता के लिए बधाई
"मुझे यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई है कि 'संत श्री आसारामजी आश्रम न्यास' जन-जन में शांति, अहिंसा और भ्रातृत्व का संदेश पहुँचाने के लिए देश भर में सत्संग का आयोजन कर रहा है। उसके सराहनीय प्रयासों की सफलता के लिए मैं बधाई देता हूँ।"
श्री के. आर. नारायणन्, तत्कालीन राष्ट्रपति, भारत गणतंत्र, नई दिल्ली।
आपने दिव्य ज्ञान का प्रकाशपुंज प्रस्फुटित किया है
"आध्यात्मिक चेतना जागृत और विकसित करने हेतु भारतीय एवं वैश्विक समाज में दिव्य ज्ञान का जो प्रकाशपुंज आपने प्रस्फुटित किया है, संपूर्ण मानवता उससे आलोकित है। मूढ़ता, जड़ता, द्वंद्व और त्रितापों से ग्रस्त इस समाज में व्याप्त अनास्था तथा नास्तिकता का तिमिर समाप्त कर आस्था, संयम, संतोष और समाधान का जो आलोक आपने बिखेरा है, संपूर्ण समाज उसके लिए कृतज्ञ है।"
श्री कमलनाथ, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, भारत सरकार।
आप समाज की सर्वांगीण उन्नति कर रहे हैं
"आज के भागदौड़ भरे स्पर्धात्मक युग में लुप्तप्राय-सी हो रही आत्मिक शांति का आपश्री मानवमात्र को सहज में अनुभव करा रहे हैं। आप आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा समाज की सर्वांगीण उन्नति कर रहे हैं व उसमें धार्मिक एवं नैतिक आस्था को सुदृढ़ कर रहे हैं।
श्री कपिल सिब्बल, विज्ञान व प्रौद्योगिकी तथा महासागर विकास राज्यमंत्री, भारत सरकार।
'योग व उच्च संस्कार शिक्षा' हेतु भारतवर्ष आपका चिर-आभारी रहेगा
"देश विदेश में भारतीय संस्कृति की ज्ञानगंगाधारा बच्चे-बच्चे के दिल-दिमाग में बापू जी के निर्देश पर परिचालित होना शुभंकर है। विद्यार्थियों में संस्कार सिंचन द्वारा हमारी संस्कृति और नैतिक शिक्षा सुदृढ़ बन जायेगी। देश को संस्कारित बनाने के लिए चलाये जाने वाले 'योग व उच्च संस्कार शिक्षा' कार्यक्रम हेतु भारतवर्ष आप जैसे महात्माओं का चिरआभारी रहेगा।"
श्री चन्द्रशेखर साहू, ग्रामीण विकास राज्यमन्त्री, भारत सरकार।
आपने जो कहा है हम उसका पालन करेंगे
"आज तक केवल सुना था कि 'तेरा साँई तुझमें है।' लेकिन आज पूज्य बापू जी के सत्संग सुनकर आज लगा - 'मेरा साँई मुझमें है।' बापूजी! आपको देखकर ही शक्ति आ गयी, आपको सुनकर भक्ति प्रकट हो गयी और आपके दर्शन और आशीर्वाद से मुक्ति अब सुनिश्चित हो गयी। प्रार्थना करता हूँ कि यहीं बस जाओ। हम बार-बार आपके दर्शन करते रहें और भक्ति, शक्ति प्राप्त करते हुए मुक्ति की ओर बढ़ते रहें। अब ह्रदय से कभी निकल न पाओगे बापू जी! जो भक्ति रस की सरिता और ज्ञान की गंगा आपने बहायी है वह मध्य प्रदेश वासियों को हमेशा प्रेरणा देती रहेगी। हम तो भक्त हैं, शिष्य हैं। आपने जो कुछ बातें कहीं हैं, हम उनका पालन करेंगे। हम विशेषरूप से ध्यान रखेंगे कि आपने जो आज्ञा की है नीम, पीपल, आँवला जगह-जगह लगे और तुलसी मैया का पौधा हर घर में लहराये, उस आज्ञा का पालन हो। फिर मध्य-प्रदेश नंदनवन की तरह महकेगा।
तीन चीज़ें आपसे माँगता हूँ – सत् बुद्धि, सत् मार्ग और सामर्थ्य देना ताकि जनता की सुचारू रूप से सेवा कर सकूँ।"
श्री शिवराजसिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश
जब गुरु के साक्षात दर्शन हो गये हैं तो कुछ बदलाव ज़रूर आयेगा
"राजमाता की वजह से महाराज बापूजी से हमारा बहुत पुराना रिश्ता है। आज रामनवमी के दिन मैं तो मानती हूँ कि मैं तो धन्य हो गयी क्योंकि सुबह से लेकर दर्शन हो रहे हैं। महाराज! आपका आशीर्वाद बना रहे क्योंकि मैं राज करने के लिए नहीं आयी, धर्म और कर्म को एक साथ जोड़कर मैं सेवा करने के लिए आयी हूँ और वह मैं करती रहूँगी। आप आते रहोगे, आशीर्वाद देते रहोगे तो हममें ऊर्जा भी पैदा होगी। आप रास्ता बताते रहो और इस राज्यरूपी परिवार की सेवा करने की शक्ति देते रहो।
मैं माफी चाहती हूँ कि आपके चरणों में इतनी देर से पहुँची लेकिन मैं मानती हूँ कि जब गुरु के साक्षात दर्शन हो गये हैं तो कुछ बदलाव ज़रूर आयेगा, राज्य की समस्याएँ हल होंगी व हम लोग जनसेवा के काम कर सकेंगे।"
वसुन्धराराजे सिंधिया, मुख्यमंत्री, राजस्थान।
बापूजी सर्वत्र संस्कार धरोहर को पहुँचाने के लिए अथक तपश्चर्या कर रहे हैं
"पूज्य बापू जी! आप देश और दुनिया – सर्वत्र ऋषि-परम्परा की संस्कार-धरोहर को पहुँचाने के लिए अथक तपश्चर्या कर रहे हैं। अनेक युगों से चलते आये मानव-कल्याण के इस तपश्चर्या-यज्ञ में आप अपने पल-पल की आहूति देते रहे हैं। उसमें से जो संस्कार की दिव्य ज्योति प्रकट हुई है, उसके प्रकाश में मैं और जनता – सब चलते रहे हैं। मैं संतों के आशीर्वाद से जी रहा हूँ। मैं यहाँ इसलिए आया हूँ कि लासेन्स रिन्यू हो जाये। जैसे नेवला अपने घर में जाकर औषधि सूँघकर ताकत लेकर आता है, वैसे ही मैं समय निकाल कर ऐसा अवसर खोज लेता हूँ।"
श्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री, गुजरात।
आपके दर्शनमात्र से मुझे अदभुत शक्ति मिलती है
"पूज्य बापू जी के लिए मेरे दिल में जो श्रद्धा है, उसको बयान करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है। आज के भटके समाज में भी यदि कुछ लोग सन्मार्ग पर चल रहे हैं तो यह इन महापुरुषों के अमृतवचनों का ही प्रभाव है। बापूजी की अमृतवाणी का विशेषकर मुझ पर तो बहुत प्रभाव पड़ता है। मेरा तो मन करता है कि बापू जी जहाँ कहीं भी हों वहीं पर उड़कर उनके दर्शन करने के लिए पहुँच जाऊँ व कुछ पल ही सही, उनके सान्निध्य का लाभ लूँ। आपके दर्शनमात्र से ही मुझे एक अदभुत शक्ति मिलती है।"
श्री प्रकाश सिंह बादल, मुख्यमंत्री, पंजाब।
हम सभी का कर्तव्य होगा कि आपके बताये रास्ते पर चलें
"हम सबका परम सौभाग्य है कि बापू जी के दर्शन हुए। कल आपसे मुलाकात हुई, आशीर्वाद मिला, मार्गदर्शन भी मिला और इशारों-इशारों में आपने वह सब कुछ जो सदगुरुदेव एक शिष्य को बता सकते हैं, मेरे जैसे एक शिष्य को आशीर्वाद रूप में प्रदान किया। आपके आशीर्वाद व कृपादृष्टि से छत्तीसगढ़ में सुख-शांति व समृद्धि रहे। यहाँ के एक-एक व्यक्ति के घर में विकास की किरण आये।
आपने जो ज्ञानोपदेश दिया है हम सभी का कर्तव्य होगा कि उस रास्ते पर चलें। बापूजी से खासतौर से पीपल, नीम, आँवला व तुलसी के वृक्ष लगाने के बारे में कहा है। हम इस पर विशेषरूप से ध्यान रखेंगे।"
डॉ. रमन सिंह, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़।
आपका मंत्र हैः 'आओ, सरल रास्ता दिखाऊँ, राम को पाने के लिए'
"पूज्य बाबा आसारामजी बापू! आपका नाम आसारामजी बापू इसलिए निकला है क्योंकि आपका यही मंत्र है कि 'आओ, सरल रास्ता दिखाऊँ राम को पाने के लिए।' आज हम धन्य हैं कि सत्संग में आये। सत्संग उसे कहते हैं जिसके संग में हम सत् हो जायें। पूज्य बापू जी ने हमें भगवान को पाने का सरल रास्ता दिखाया है, इसलिए मैं जनता की ओर से बापूजी का धन्यवाद करता हूँ।"
श्री ई.एस.एल. नरसिम्हन, राज्यपाल, छत्तीसगढ़।
संतों के मार्गदर्शन में देश चलेगा तो आबाद होगा
"पूज्य बापू जी में कर्मयोग, भक्तियोग तथा ज्ञानयोग तीनों का ही समावेश है। आप आज करोड़ों-करोड़ों भक्तों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। संतों के मार्गदर्शन में देश चलेगा तो आबाद होगा। मैं तो बड़े-बड़े नेताओं से यही कहता हूँ कि आप संतों का आशीर्वाद जरूर लो। इनके चरणों में अगर रहेंगे तो सत्ता रहेगी, टिकेगी तथा उसी से धर्म की स्थापना होगी।"
श्री अशोक सिंघल, अध्यक्ष, विश्व हिन्दू परिषद।
सत्य का मार्ग कभी न छूटे ऐसा आशीर्वाद दो
"हमें आपके मार्गदर्शन की जरूरत है, वह सतत मिलता रहे। आपने हमारे कंधों पर जो जवाबदारी दी है उसे हम भली प्रकार निभायें। बुरे मार्ग पर न जायें, सत्य के मार्ग पर चलें। लोगों की अच्छे ढंग से सेवा करें। संस्कृति की सेवा करें। सत्य का मार्ग कभी न छूटे, ऐसा आशीर्वाद दो।"
श्री उद्धव ठाकरे, कार्यकारी अध्यक्ष, शिवसेना।
पुण्योदय पर संत समागम
"जीवन की दौड़-धूप से क्या मिलता है यह हम सब जानते हैं। फिर भी भौतिकवादी संसार में हम उसे छोड़ नहीं पाते। संत श्री आसारामजी जैसे दिव्य शक्तिसम्पन्न संत पधारें और हमको आध्यात्मिक शांति का पान कराकर जीवन की अंधी दौड़ से छुड़ायें, ऐसे प्रसंग कभी-कभी ही प्राप्त होते हैं। ये पूजनीय संतश्री संसार में रहते हुए भी पूर्णतः विश्वकल्याण के लिए चिन्तन करते हैं, कार्य करते हैं। लोगों को आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करने की कलाएँ और योगसाधना की युक्तियाँ बताते हैं।
आज उनके समक्ष थोड़ी ही देर बैठने से एवं सत्संग सुनने से हमलोग और सब भूल गये हैं तथा भीतर शांति व आनंद का अनुभव कर रहे हैं। ऐसे संतों के दरबार में पहुँचना पुण्योदय का फल है। उन्हे सुनकर हमको लगता है कि प्रतिदिन हमें ऐसे सत्संग के लिए कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। पूज्य बापू जी जैसे महान संत व महापुरुष के सामने मैं अधिक क्या कहूँ? चाहे कुछ भी कहूँ, वह सब सूर्य के सामने चिराग दिखाने जैसा है।"
श्री मोतीलाल वोरा, अखिल भारतीय काँग्रेस कोषाध्यक्ष, पूर्व मुख्यमंत्री (म.प्र.), पूर्व राज्यपाल (उ.प्र.)।
बापूजी जहाँ नहीं होते वहाँ के लोगों के लिए भी बहुत कुछ करते हैं
"सारे देश के लोग पूज्य बापूजी के आशीर्वचनों की पावन गंगा में नहा कर धन्य हो रहे हैं। आज बापूजी यहाँ उड़ीसा में सत्संग-अमृत पिलाने के लिए उपस्थित हैँ। वे जब यहाँ नहीं होते हैं तब भी उड़ीसा के लोगों के बहुत कुछ करते हैं, उनको सब समय याद करते हैं। उड़ीसा के दरिद्रनारायणों की तन-मन-धन से सेवा दूर-दराज में भी चलाते हैं।"
श्री जानकीवल्लभ पटनायक, मुख्यमंत्री, उड़ीसा।
जीवन की सच्ची शिक्षा तो पूज्य बापूजी ही दे सकते हैं
"बापूजी कितने प्रेमदाता हैं कि कोई भी व्यक्ति समाज में दुःखी न रहे इसलिए सतत प्रयत्न करते रहते हैं। मैं हमेशा 'संस्कार चैनल' चालू करके आपके आशीर्वाद लेने के बाद ही सोती हूँ। जीवन की सच्ची शिक्षा तो हम भी नहीं दे पा रहे हैं, ऐसी शिक्षा तो पूज्य संत श्री आसारामजी बापू जैसे संत शिरोमिणी ही दे सकते हैं।"
आनंदीबहन पटेल, शिक्षामंत्री (पूर्व), राजस्व एवं मार्ग व मकान मंत्री (वर्तमान), गुजरात।
आपकी कृपा से योग की अणुशक्ति पैदा हो रही है....
"अनेक प्रकार की विकृतियाँ मानव के मन पर, सामाजिक जीवन पर, संस्कार और संस्कृति पर आक्रमण कर रही हैं। वस्तुतः इस समय संस्कृति और विकृति के बीच एक महासंघर्ष चल रहा है जो किसी सरहद के लिए नहीं बल्कि संस्कारों के लिए लड़ा जा रहा है। इसमें संस्कृति को जिताने का बम है योगशक्ति। हे गुरुदेव! आपकी कृपा से इस योग की दिव्य अणुशक्ति लाखों लोगों में पैदा हो रही है... ये संस्कृति के सैनिक बन रहे हैं।
गुरुदेव! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि शासन के अंदर भी धर्म और वैराग्य के संस्कार उत्पन्न हों। आपसे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मैं आपके चरणों में आया हूँ।"
(श्री अशोकभाई भट्ट, कानूनमंत्री, गुजरात राज्य)
धरती तो बापू जैसे संतों के कारण टिकी है
"मुझे सत्संग में आने का मौका पहली बार मिला है और पूज्य बापूजी से एक अदभुत बात मुझे और आप सब को सुनने को मिली है, वह है प्रेम की बात। इस सृष्टि का जो मूल तत्त्व है, वह है प्रेम। यह प्रेम नाम का तत्त्व यदि न हो तो सृष्टि नष्ट हो जाएगी। लेकिन संसार में कोई प्रेम करना नहीं जानता, या तो भगवान प्यार करना जानते हैं या संत प्यार करना जानते हैं। जिसको संसारी लोग अपनी भाषा में प्रेम कहते हैं, उसमें तो कहीं-न-कहीं स्वार्थ जुड़ा होता है लेकिन भगवान, संत और गुरु का प्रेम ऐसा होता है जिसको हम सचमुच प्रेम की परिभाषा में बाँध सकते हैं। मैं यह कह सकती हूँ कि साधू संतों को देश की सीमाएँ नहीं बाँधतीं। जैसे नदियों की धाराएँ देश और जाति की सीमाओं में नहीं बाँधती, उसी प्रकार परमात्मा का प्रेम और संतों का आशीर्वाद भी कभी देश, जाति और संप्रदाय की सीमाओं में नहीं बंधता। कलियुग में हृदय की निष्कपटता, निःस्वार्थ प्रेम, त्याग और तपस्या का क्षय होने लगा है, फिर भी धरती टिकी है तो बापू! इसलिए कि आप जैसे संत भारतभूमि पर विचरण करते हैं। बापू की कथा में ही मैंने यह विशेषता देखी है कि गरीब और अमीर, दोनों को अमृत के घूँट एक जैसे पीने को मिलते हैं। यहाँ कोई भेदभाव नहीं है।"
(सुश्री उमा भारती, मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश।)
मैं कमनसीब हूँ जो इतने समय तक गुरुवाणी से वंचित रहा
"परम पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में सादर प्रणाम! मैंने अभी तक महाराजश्री का नाम भर सुना था। आज दर्शन करने का अवसर मिला है लेकिन मैं अपने-आपको कमनसीब मानता हूँ क्योंकि देर से आने के कारण इतने समय तक गुरुदेव की वाणी सुनने से वंचित रहा। अब मेरी कोशिश रहेगी कि मैं महाराजश्री की अमृतवाणी सुनने का हर अवसर यथासम्भव पा सकूँ। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि वे हमें ऐसा मौका दें कि हम गुरु की वाणी को सुनकर अपने-आपको सुधार सकें। गुरु जी के श्री चरणों में सादर समर्पित होते हुए मध्यप्रदेश की जनता की ओर से प्रार्थना करता हूँ कि गुरुदेव! आप इस मध्यप्रदेश में बार-बार पधारें और हम लोगों को आशीर्वाद देते रहें ताकि परमार्थ के उस कार्य में, जो आपने पूरे देश में ही नहीं, देश के बाहर भी फैलाया है, मध्यप्रदेश के लोगों को भी जुड़ने का ज्यादा-से-ज्यादा अवसर मिले।"
(श्री दिग्विजय सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश।)
इतनी मधुर वाणी! इतना अदभुत ज्ञान!
"मैं अपनी ओर से तथा यहाँ उपस्थित सभी महानुभावों की ओर से परम श्रद्धेय संतशिरोमणि बापू जी का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मैंने कई बार टी.वी. पर आपको देखा सुना है और दिल्ली में एक बार आपका प्रवचन भी सुना है। इतनी मधुर वाणी! इतना मधुर ज्ञान! अगर आपके प्रवचन पर गहराई से विचार करके अमल किया जाये तो इन्सान को ज़िंदगी में सही रास्ता मिल सकता है। वे लोग धन भागी हैं जो इस युग में ऐसे महापुरुष के दर्शन व सत्संग से अपने जीवन-सुमन खिलाते हैं।"
(श्री भजनलाल, तत्कालीन मुख्यमत्री, हरियाणा।)
सत्संग श्रवण से मेरे हृदय की सफाई हो गयी....
पूज्यश्री के दर्शन करने व आशीर्वाद लेने हेतु आये हुए उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री सूरजभान ने कहाः "स्मशानभूमि से आने के बाद हम लोग शरीर की शुद्धि के लिए स्नान कर लेते हैं। ऐसे ही विदेशों में जाने के कारण मुझ पर दूषित परमाणू लग जाते थे, परंतु वहाँ से लौटने के बाद यह मेरा परम सौभाग्य है कि यहाँ महाराज श्री के दर्शन व पावन सत्संग-श्रवण करने से मेरे चित्त की सफाई हो गयी। विदेशों में रह रहे अनेकों भारतवासी पूज्य बापू के प्रवचनों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सुन रहे हैं। मेरा यह सौभाग्य है कि मुझे यहाँ महाराजश्री को सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ।"
(श्री सूरजभान, तत्कालीन राज्यपाल, उत्तरप्रदेश।)
ज्ञानरूपी गंगाजी स्वयं बहकर यहाँ आ गयीं...
उत्तरांचल राज्य का सौभाग्य है कि इस देवभूमी में देवता स्वरुप पूज्य बापूजी का आश्रम बन रहा है | आप ऐसा आश्रम बनाये जैसा कहीं भी न हो | यह हम लोगों का सौभाग्य है कि अब पूज्य बापूजी की ज्ञानरूपी गंगाजी स्वयं बहकर यहां आ गयी है | अब गंगा जाकर दर्शन करने व स्नान करने की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी संत श्री आसारामजी बापू के चरणों में बैठकर उनके आशीर्वाद लेने की है |
-श्री नित्यानंद स्वामीजी,
तत्कालीन, मुख्यमंत्री, उत्तरांचल
बापू जी के सत्संग से विश्वभर के लोग लाभान्वित...
भारतभूमि सदैव से ही ऋषि-मुनियों तथा संत-महात्माओं की भूमि रही है, जिन्होंने विश्व को शांति एवं अध्यात्म का संदेश दिया है। आज के युग में पूज्य संत श्री आसारामजी अपनी अमृतवाणी द्वारा दिव्य आध्यात्मिक संदेश दे रहे हैं, जिससे न केवल भारत वरन् विश्वभर में लोग लाभान्वित हो रहे हैं।
(श्री सुरजीत सिंह बरनाला, राज्यपाल, आन्ध्रप्रदेश)
पूरी डिक्शनरी याद कर विश्व रिकॉर्ड बनाया
ऑक्सफोर्ड एडवांस लर्नर्स डिक्शनरी (अंग्रेजी छठा संस्करण) के 80000 शब्दों को उनकी पृष्ठ संख्या सहित मैंने याद कर लिया, जो कि समस्त विश्व के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। फलस्वरूप मेरा नाम 'लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस' में दर्ज हो गया। यही नहीं 'जी' टी.वी. पर दिखाये जाने वाले रियालिटी शो में 'शाबाश इंडिया' में भी मैंने विश्व रिकॉर्ड बनाया। 'द वीक' पत्रिका के एक सर्वेक्षण में भी मेरा नाम 25 अदभुत व्यक्तियों की सूची में है।
मुझे पूज्य गुरुदेव से मंत्रदीक्षा प्राप्त होना, 'भ्रामरी प्राणायाम' सीखने को मिलना तथा अपनी कमजोरी को ही महानता प्राप्त करने का साधन बनाने की प्रेरणा, कला, बल एवं उत्साह प्राप्त होना – यह सब तो गुरुदेव की अहैतुकी कृपा का ही चमत्कार है। "गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।"
विरेन्द्र मेहता, अर्जनु नगर, रोहतक (हरि.)।
मंत्रदीक्षा व यौगिक प्रयोगों से बुद्धि का अप्रतिम विकास
"पहले मैं एक साधारण छात्र था। मुझे लगभग 50-55 प्रतिशत अंक ही मिलते थे। 11वीं कक्षा में तो ऐसी स्थिति हुई कि स्कूल का नाम खराब न हो इसलिए प्रधानाध्यापक ने मेरे अभिभावकों को बुलाकर मुझे स्कूल से निकाल देने तक की बात कही थी। बाद में मुझे पूज्य बापू जी से सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा मिली। इस मंत्र के जप व बापूजी द्वारा बताये गये प्रयोगों के अभ्यास से कुछ ही समय में मेरी बुद्धिशक्ति का अप्रतिम विकास हुआ। तत्पश्चात 'नोकिया' मोबाइल कंपनी में 'ग्लोबल सर्विसेस प्रोडक्ट मैनेजर' के पद पर मेरी नियुक्ति हुई और मैंने एक पुस्तक लिखी जो अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को सेल्युलर नेटवर्क की डिज़ाईन बनाने में उपयोगी हो रही है। एक विदेशी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की कीमत 110 डॉलर (करीब 4500 रुपये) है। इसके प्रकाशन के बाद मेरी पदोन्नती हुई और अब विश्व के कई देशों में मोबाइल के क्षेत्र में प्रशिक्षण देने हेतु मुझे बुलाते हैं। फिर मैंने एक और पुस्तक लिखी, जिसकी 150 डॉलर (करीब 6000 रुपये) है। यह पूज्यश्री से प्राप्त सारस्वत्य मंत्रदीक्षा का ही परिणाम है।"
अजय रंजन मिश्रा, जनकपुरी, दिल्ली।
सत्संग व मंत्रदीक्षा ने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया
"पहले मैं भैंसे चराता था। रोज सुबह रात की रखी रोटी, प्याज, नमक और मोबिल ऑयल के डिब्बे में पानी लेकर निकालता व दोपहर को वही खाता था। आर्थिक स्थिति ठीक न होने से टायर की ढाई रुपये वाली चप्पल पहनता था।
12वीं में मुझे केवल 60 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे। उसके बाद मैंने इलाहाबाद में इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया। तब मैं अज्ञानवश संतों का विरोध करता था। संतों के लिए जहर उगलने वाले मूर्खों के संग में आकर मैं कुछ-का-कुछ बकता था लेकिन इलाहाबाद में पूज्य बापू जी का सत्संग आयोजित हुआ तो सोचा, '5 मिनट बैठते हैं।' वहाँ बैठा तो बैठ ही गया। फिर मुझे बापूजी द्वारा सारस्वत्य मंत्र मिला। मेरी सूझबूझ में सदगुरु की कृपा का संचार हुआ। मैंने सविधि मंत्र-अनुष्ठान किया। छठे दिन मेरे आज्ञाचक्र में कम्पन होने लगा था। मैं एक साल तक एकादशी के निर्जल व्रत व जागरण करते हुए "श्री आसारामायण", "श्री विष्णु सहस्रनाम", "गजेन्द्रमोक्ष" का पाठ व सारस्वत्य मंत्र का जप करता था। रात भर मैं यही प्रार्थना करता था, 'बस, प्रभु! मुझे गुरु जी से मिला दो।'
प्रभुकृपा से अब मेरा उद्देश्य पूरा हो गया है। इस समय मैं 'गो एयर' (हवाई जहाज कम्पनी) में इंजीनियर हूँ। महीने भर का करीब एक लाख 80 हजार पाता हूँ। कुछ दिनों में तनख्वाह ढाई लाख हो जायेगी। गुरु जी ने भैंसे चराने वाले एक गरीब लड़के को आज स्थिति में पहुँचा दिया है।"
क्षितिज सोनी (एयरक्राफट इंजीनियर), दिल्ली।
5 वर्ष के बालक ने चलायी जोखिम भरी सड़कों पर कार
"मैंने पूज्य बापूजी से 'सारस्वत्य मंत्र' की दीक्षा ली है। जब मैं पूजा करता हूँ, बापूजी मेरी तरफ पलक झपकाते हैं। मैं बापूजी से बातें करता हूँ। मैं रोज़ दस माला करता हूँ। मैं बापूजी से जो माँगता हूँ, वह मुझे मिल जाता है। मुझे हमेशा ऐसा एहसास होता है कि बापूजी मेरे साथ हैं।
5 जुलाई 2005 को मैं अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था। मेरा छोटा भाई छत से नीचे गिर गया। उस समय हमारे घर में कोई बड़ा नहीं था। इसलिए हम सब बच्चे डर गये। इतने में पूज्य बापूजी की आवाज़ आयी कि ताशु! इसे वैन में बिठा और वैन चलाकर हॉस्पिटल ले जा।' उसके बाद मैंने अपनी दीदियों की मदद से हिमांशु को वैन में लिटाया। गाड़ी कैसी चली और अस्पताल कैसे पहुँची, मुझे नहीं पता। मुझे रास्ते भर ऐसा एहसास रहा कि बापूजी मेरे साथ बैठे हैं और गाड़ी चलवा रहे हैं।" (घर से अस्पताल का 5 कि.मी. से अधिक है।)
तांशु बेसोया, राजवीर कॉलोनी, दिल्ली – 16.
ऐसे संतों का जितना आदर किया जाय, कम है
"किसी ने मुझसे कहा थाः ध्यान की कैसेट लगाकर सोयेंगे तो स्वप्न में गुरुदेव के दर्शन होंगे...’
मैंने उसी रात ध्यान की कैसेट लगायी और सुनते-सुनते सो गया। उस वक्त रात्रि के बारह-साढ़े बारह बजे होंगे। वक्त का पता नहीं चला। ऐसा लगा मानों, किसी ने मुझे उठा दिया। मैं गहरी नींद से उठा एवं गुरु जी की लैंपवाले फोटो की तरफ टकटकी लगाकर एक-दो मिनट तक देखता रहा। इतने में आश्चर्य! टेप अपने-आप चल पड़ी और केवल ये तीन वाक्य सुनने को मिलेः ‘आत्मा चैतन्य है। शरीर जड़ है। शरीर पर अभिमान मत करो।’
टेप स्वतः बंद हो गयी और पूरे कमरे में यह आवाज गूँज उठी। दूसरे कमरे में मेरी पत्नी की भी आँखें खुल गयीं और उसने तो यहाँ तक महसूस किया, जैसे कोई चल रहा है। वे गुरुजी के सिवाय और कोई नहीं हो सकते।
मैंने कमरे की लाइट जलायी और दौड़ता हुआ पत्नी के पास गया। मैंने पूछाः ‘सुना?’ वह बोलीः ‘हाँ।’
उस समय सुबह के ठीक चार बजे थे। स्नान करके मैं ध्यान में बैठा तो डेढ़ घण्टे तक बैठा रहा। इतना लंबा ध्यान तो मेरा कभी नहीं लगा। इस घटना के बाद तो ऐसा लगता है कि गुरुजी साक्षात् ब्रह्मस्वरूप हैं। उनको जो जिस रूप में देखता है वैसे वे दिखते हैं।
मेरा मित्र पाश्चात्य विचारधारावाला है। उसने गुरुजी का प्रवचन सुना और बोलाः ‘मुझे तो ये एक बहुत अच्छे लेक्चरर लगते हैं।’
मैंने कहाः ‘आज जरूर इस पर गुरुजी कुछ कहेंगे।’
यह सूरत आश्रम में मनायी जा रही जन्माष्टमी के समय की बात है। हम कथा में बैठे। गुरुजी ने कथा के बीच में ही कहाः ‘कुछ लोगों को मैं लैक्चरर दिखता हूँ, कुछ को ‘प्रोफेसर’ दिखता हूँ, कुछ को ‘गुरु’ दिखता हूँ और वैसा ही वह मुझे पाता है।’
मेरे मित्र का सिर शर्म से झुक गया। फिर भी वह नास्तिक तो था ही। उसने हमारे निवास पर मजाक में गुरुजी के लिए कुछ कहा, तब मैंने कहाः "यह ठीक नहीं है। अबकी बार मान जा, नहीं तो गुरु जी तुझे सजा देंगे।"
15 मिनट में ही उसके घर से फोन आ गया कि "बच्चे की तबीयत बहुत खराब है उसे अस्पताल में दाखिल करना पड़ रहा है।"
तब मेरे मित्र की सूरत देखने लायक थी। वह बोलाः "गल्ती हो गयी। अब मैं गुरु जी के लिए कुछ नहीं कहूँगा, मुझे चाहे विश्वास हो या न हो।"
अखबारों में गुरु जी की निंदा लिखनेवाले अज्ञानी लोग नहीं जानते कि जो महापुरुष भारतीय संस्कृति को एक नया रूप दे रहे हैं, कई संतों की वाणियों को पुनर्जीवित कर रहे हैं, लोगों के शराब-कबाब छुड़वा रहे हैं, जिनसे समाज का कल्याण हो रहा है उनके ही बारे में हम हलकी बातें लिख रहे हैं। यह हमारे देश के लिए बहुत ही शर्मजनक बात है। ऐसे संतों का तो जितना आदर किया जाये, वह कम है। गुरुजी के बारे में कुछ भी बखान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।
(डॉ. सतवीर सिंह छाबड़ा, बी.बी.ई.एम., आकाशवाणी, इन्दौर।)
मुझे निर्व्यसनी बना दिया....
"मैं पिछले कई वर्षों से तम्बाकू का व्यसनी था और इस दुर्गुण को छोड़ने के लिए मैंने कितने ही प्रयत्न किये, पर मैं निष्फल रहा। जनवरी 1995 में पूज्य बापू जब प्रकाशा आश्रम (महा.) पधारे तो मैं भी उनके दर्शनार्थ वहाँ पहुँचा और उनसे अनुऱोध कियाः
"बापू! विगत 32 वर्षों से तम्बाकू का सेवन कर रहा हूँ। अनेक प्रयत्नों के बाद भी इस दुर्गुण से मैं मुक्त न हो सका। अब आप ही कृपा कीजिए।’
पूज्य बापू ने कहाः ‘लाओ तम्बाकू की डिब्बी और तीन बार थूककर कहो कि आज से मैं तम्बाकू नहीं खाऊँगा।’
मैंने पूज्य बापू जी के निर्देशानुसार वही किया और महान आश्चर्य! उसी दिन से मेरा तम्बाकू खाने का व्यसन छूट गया। पूज्य बापू की ऐसी कृपादृष्टि हुई कि वर्ष पूरा होने पर भी मुझे कभी तम्बाकू खाने की तलब नहीं लगी।
मैं किन शब्दों में पूज्य बापू का आभार व्यक्त करूँ! मेरे पास शब्द ही नहीं हैं। मुझे आनन्द है कि इन राष्ट्रसंत ने बरबाद व नष्ट होते हुए मेरे जीवन को बचाकर मुझे निर्व्यसनी दिया।"
(श्री लखन भटवाल, जि.धुलिया, महाराष्ट्र)
गुरुजी की तस्वीर ने प्राण बचा लिये
"कुछ ही दिनों पहले मेरा दूसरा बेटा एम. ए. पास करके नौकरी के लिये बहुत जगह घूमा, बहुत जगह आवेदन-पत्र भेजा किन्तु उसे नौकरी नहीं मिली | फिर उसने बापूजी से दीक्षा ली | मैंने आश्रम का कुछ सामान कैसेट, सतसाहित्य लाकर उसको देते हुए कहा: 'शहर में जहाँ मंदिर है, जहाँ मेले लगते हैं तथा जहाँ हनुमानजी का प्रसिद्ध दक्षिणमुखी मंदिर है वहां स्टाल लगाओ |' बेटे ने स्टाल लगाना शुरु किया | ऐसे ही एक स्टाल पर जलगांव के एक प्रसिद्ध व्यापारी अग्रवालजी आये, बापूजी की कुछ कैसेट खरीदीं और 'ईश्वर की ओर' नामक पुस्तक भी साथ में ले गये, पुस्तक पढ़ी और कैसेट सुनी | दूसरे दिन वे फिर आये और कुछ सतसाहित्य खरीद कर ले गये, वे पान के थोक विक्रता हैं | उनको पान खाने की आदत है | पुस्तक पढ़कर उन्हें लगा: 'मैं पान छोड़ दूँ |' उनकी दुकान पर एक आदमी आया | पांचसौ रुपयों का सामान खरीदा और उनका फोन नम्बर ले गया | एक घंटे के बाद उसने दुकान पर फोन किया: 'सेठ अग्रवालजी ! मुझे आपका खून करने का काम सौंपा गया था | काफी पैसे (सुपारी) भी दिये गये थे और मैं तैयार भी हो गया था, पर जब में आपकी दुकान पर पहुंचा तो परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू के चित्र पर मेरी नजर पड़ी | मुझे ऐसा लगा मानो, साक्षात बापू बैठे हों और मुझे नेक इन्सान बनने की प्रेरणा दे रहे हों ! गुरुजी की तस्वीर ने (तस्वीर के रुप में साक्षात गुरुदेव ने आकर) आपके प्राण बचा लिये |' अदभुत चमत्कार है ! मुम्बई की पार्टी ने उसको पैसे भी दिये थे और वह आया भी था खून करने के इरादे से, परन्तु जाको राखे सांइयाँ.... चित्र के द्वार भी अपनी कृपा बरसाने वाले ऐसे गुरुदेव के प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये वह यहाँ भी आया है |"
-बालकृष्ण अग्रवाल,
जलगांव, महाराष्ट्र
सदगुरू शिष्य का साथ कभी नहीं छोड़ते
"एक रात मैं दुकान से स्कूटर द्वारा अपने घर जा रहा था | स्कूटर की डिक्की में काफी रूपये रखे हुए थे | ज्यों ही घर के पास पहुंचा तो गली में तीन बदमाश मिले | उन्होंने मुझे घेर लिया और पिस्तौल दिखायी | स्कूटर रूकवाकर मेरे सिर पर तमंचे का बट मार दिया और धक्के मार कर मुझे एक तरफ गिरा दिया | उन्होंने सोचा होगा कि मैं अकेला हूं, पर शिष्य जब सदगुरू से मंत्र लेता है, श्रद्धा-विश्वास रखकर उसका जप करता है तब सदगुरू उसका साथ नहीं छोड़ते | मैंने सोचा "डिक्की में बहुत रूपये हैं और ये बदमाश तो स्कूटर ले जा रहे हैं | मैंने गुरूदेव से प्रार्थना की | इतने में वे तीनों बदमाश स्कूटर छोड़कर थैला ले भागे | घर जाकर खोला होगा तो सब्जी और खाली टिफ़िन देखकर सिर कूटा, पता नहीं पर बड़ा मजा आया होगा | मेरे पैसे बच गये...उनका सब्जी का खर्च बच गया |"
-गोकुलचन्द्र गोयल,
आगरा
गुरूकृपा से अंधापन दूर हुआ
"मुझे ग्लुकोमा हो गया था | लगभग पैंतीस साल से यह तकलीफ़ थी | करीब छः साल तक तो मैं अंधा रहा | कोलकाता, चेन्नई आदि सब जगहों पर गया, शंकर नेत्रालय में भी गया किन्तु वहां भी निराशा हाथ लगी | कोलकाता के सबसे बड़े नेत्र-विशेषज्ञ के पास गया | उसने भी मना कर दिया और कहा | 'धरती पर ऐसा कोई इन्सान नहीं जो तुम्हें ठीक कर सके |' ...लेकिन सूरत आश्रम में मुझे गुरूदेव से मंत्र मिला | वह मंत्र मैंने खूब  श्रद्धा-विश्वासपूर्वक जपा क्योंकि सक्षात ब्रह्मस्वरूप गुरूदेव से वह मंत्र मिला था | करीब छः-सात महीने ही जप हुआ था कि मुझे थोड़ा-थोड़ा दिखायी देने लगा | डॉक्टर कहते थे कि तुमको भ्रांति हो गयी है, पर मुझे तो अब भी अच्छी तरह दिखता है | एक बार एक अन्य भंयकर दुर्घटना से भी गुरूदेव ने मुझे बचाया था | ऐसे गुरूदेव का ॠण हम जन्मों-जन्मों तक नहीं चुका सकते |"
-शंकरलाल महेश्वरी,  कोलकाता
और डकैत घबराकर भाग गये
"१४ जुलाई '९९ को करीब साढ़े तीन बजे मेरे मकान में छः डकैत घुस आये और उस समय दुर्भाग्य से बाहर का दरवाजा खुला हुआ था | दो डकैत बाहर मारूति चालू रखकर खड़े थे | एक डकैत ने धक्का देकर मेरी माँ का मुँह बंद कर दिया और अलमारी की चाबी माँगने लगा | इस घटना के दौरान मैं दुकान पर था | मेरी पत्नी को भी डकैत धमकाने लगे और आवाज न करने को कहा | मेरी पत्नी ने पूज्य बापूजी के चित्र के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना की  'अब आप ही रक्षा करो ...'  इतना ही कहा तो आश्चर्य ! आश्चर्य ! परम आश्चर्य !! वे सब डकैत घबराकर भागने लगे | उनकी हड़बड़ाहट देखकर ऐसा लग रहा था मानों उन्हें कुछ दिखायी नहीं दे रहा था | वे भाग गये | मेरा परिवार गुरुदेव का ॠणी है | बापूजी के आशीर्वाद से सब सकुशल हैं | हमने १५ नवम्बर '९८ को वाराणसी में मंत्रदीक्षा ली थी |"
-मनोहरलाल तलरेजा,
४, झुलेलाल नगर, शिवाजी नगर,
वाराणसी
मंत्र द्वारा मृतदेह में प्राण-संचार
"मैं श्री योग वेदान्त सेवा समिति, आमेट से जीप द्वारा रवाना हुआ था | ११ जुलाई १९९४ को मध्यान्ह बारह बजे हमारी जीप किसी तकनीकी त्रुटि के कारण नियंत्रण से बाहर होकर तीन पल्टियाँ खा गयी | मेरा पूरा शरीर जीप के नीचे दब गया | किसी तरह मुझे बाहर निकाला गया | एक तो दुबला पतला शरीर और ऊपर से पूरी जीप का वजन ऊपर आ जाने के कारण मेरे शरीर के प्रत्येक हिस्से में असह्य दर्द होने लगा | मुझे पहले तो केसरियाजी अस्पताल में दाखिल कराया गया | ज्यों-ज्यों उपचार किया गया, कष्ट बढ़ता ही गया क्योंकि चोट बाहर नहीं, शरीर के भीतरी हिस्सों में लगी थी और भीतर तक डॉक्टरों का कोई उपचार काम नहीं कर रहा था | जीप के नीचे दबने से मेरा सीना व पेट विशेष प्रभावित हुए थे और हाथ-पैर में काँच के टुकड़े घुस गये थे | दर्द के मारे मुझे साँस लेने में भी तकलीफ हो रही थी | ऑक्सीजन दिये जाने के बाद भी दम घुट रहा था और मृत्यु की घडियाँ नजदीक दिखायी पड़ने लगीं | मैं मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया | मेरा मृत्यु-प्रमाणपत्र बनाने की तैयारियाँ कि जाने लगीं व मुझे घर ले जाने को कहा गया | इसके पूर्व मेरा मित्र पूज्य बापू से फ़ोन पर मेरी स्थिति के सम्बन्ध में बात कर चुका था | प्राणीमात्र के परम हितैषी, दयालु स्वभाव के संत पूज्य बापू ने उसे एक गुप्त मंत्र प्रदान करते हुए कहा था कि 'पानी में निहारते हुए इस मंत्र का एक सौ आठ बार (एक माला) जप करके वह पानी मनोज को एवं दुर्घटना में घायल अन्य लोगों को भी पिला देना |' जैसे ही वह अभिमंत्रित जल मेरे मुँह में डाला गया, मेरे शरीर में हलचल होने के साथ ही वमन हुआ | इस अदभुत चमत्कार से विस्मित होकर डॉक्टरों ने मुझे तुरंत ही विशेष मशीनों के नीचे ले जाकर लिटाया | गहन चिकित्सकीय परीक्षण के बाद डॉक्टरों को पता चला कि जीप के नीचे दबने से मेरा पूरा खून काला पड़ गया था तथा नाड़ी-चालन (पल्स), हृदयगति व रक्त प्रवाह भी बंद हो चुके थे | मेरे शरीर का सम्पूर्ण रक्त बदल दिया गया तथा आपरेशन भी हुआ | उसके ७२ घंटे बाद मुझे होश आया | बेहोशी में मुझे केवल इतना ही याद था की मेरे भीतर पूज्य बापू द्वारा प्रदत्त गुरूमंत्र का जप चल रहा है | होश में आने पर डॉक्टरों ने पूछा : 'तुम आपरेशन के समय 'बापू...बापू...' पुकार रहे थे | ये 'बापू' कौन हैं ? मैंने बताया :'वे मेरे गुरूदेव प्रातः स्मरणीय परम पूज्य संत श्री असारामजी बापू हैं |' डॉक्टरों ने पुनः मुझसे प्रश्न किया : 'क्या तुम कोई व्यायाम करते हो ?' मैंने कहा :'मैं अपने गुरूदेव द्वारा सिखायी गयी विधि से आसन व प्राणायाम करता हूँ |' वे बोले : 'इसीलिये तुम्हारे इस दुबले-पतले शरीर ने यह सब सहन कर लिया और तुम मरकर भी पुनः जिन्दा हो उठे दूसरा कोई होता तो तुरंत घटनास्थल पर ही उसकी हड्डियाँ बाहर निकल जातीं और वह मर जाता |' मेरे शरीर में आठ-आठ नलियाँ लगी हुई थीं | किसीसे खून चढ़ रहा था तो किसी से कृत्रिम ऑक्सीजन दिया जा रहा था | यद्यपि मेरे शरीर के कुछ हिस्सों में अभी-भी काँच के टुकड़े मौजूद हैं लेकिन गुरूकृपा से आज में पूर्ण स्वस्थ होकर अपना व्यवसाय व गुरूसेवा दोनों कार्य कर रह हूँ | मेरा जीवन तो गुरूदेव का ही दिया हुआ है | इन मंत्रदृष्टा महर्षि ने उस दिन मेरे मित्र को मंत्र न दिया होता तो मेरा पुनर्जीवन तो सम्भव नहीं था | पूज्य बापू मानव-देह में दिखते हुए भी अति असाधारण महापुरूष हैं | टेलिफ़ोन पर दिये हुए उनके एक मंत्र से ही मेरे मृत शरीर में पुनः प्राणों का संचार हो गया तो जिन पर बापू की प्रत्यक्ष दृष्टि पड़ती होगी वे लोग कितने भाग्यशाली होते होंगे ! ऐसे दयालु जीवनदाता सदगुरू के श्रीचरणों में कोटि-कोटि दंडवत प्रणाम..."
-मनोज कुमार सोनी,
ज्योति टेलर्स, लक्ष्मी बाजार, आमेट, राजस्थान
सदगुरूदेव की कृपा से नेत्रज्योति वापस मिली
"मेरी दाहिनी आँख से कम दिखायी देता था तथा उसमें तकलीफ़ भी थी | ध्यानयोग शिविर, दिल्ली में पूज्य गुरूदेव मेवा बाँट रहे थे, तब एक मेवा मेरी दाहिनी आँख पर आ लगा | आँख से पानी निकलने लगा |... पर आश्चर्य ! दूसरे ही दिन से आँख की तकलीफ मिट गयी और अच्छी तरह दिखायी देने लगा |"
-राजकली देवी,
असैनापुर, लालगंज अजारा, जि. प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
बड़दादा की मिट्टी व जल से जीवनदान
"अगस्त '९८ में मुझे मलेरिया हुआ | उसके बाद पीलिया हो गया | मेरे बड़े भाई ने आश्रम से प्रकाशित 'आरोग्यनिधि' पुस्तक में से पीलिया का मंत्र पढ़कर पीलिया तो उतार दिया परंतु कुछ ही दिनों बाद अंग्रेजी दवाओं के 'रिएक्षन' से दोनो किडनियाँ 'फेल' (निष्क्रिय) हो गईं | मेरा 'हार्ट' (हृदय) और 'लीवर' (यकृत) भी 'फेल' होने लगे | डॉक्टरों ने तो कह दिया 'यह लड़का बच नहीं सकता |' फिर मुझे गोंदिया से नागपुर हॉस्पिटल में ले जाया गया लेकिन वहाँ भी डॉक्टरों ने जवाब दे दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता | मेरे भाई मुझे वहीं छोड़कर सूरत आश्रम आये, वैद्यजी से मिले और बड़दादा की परिक्रमा करके प्रार्थना की तथा वहाँ की मिट्टी और जल लिया | ८ तारीख को डॉक्टर मेरी किडनी बदलने वाले थे | जब मेरे भाई बड़दादा को प्रार्थना कर रहे थे, तभी से मुझे आराम मिलना शुरू हो गया था | भाई ने ७ तारीख को आकर मुझे बड़दादा कि मिट्टी लगाई और जल पिलाया तो मेरी दोनों किडनीयाँ स्वस्थ हो गयी | मुझे जीवनदान मिल गया | अब मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ |"
-प्रवीण पटेल,
गोंदिया, महाराष्ट्र
पूज्य बापू ने फेंका कृपा-प्रसाद
"कुछ वर्ष पूर्व पूज्य बापू राजकोट आश्रम में पधारे थे | मुझे उन दिनों निकट से दर्शन करने का सौभाग्य मिला | उस समय मुझे छाती में ' एन्जायना पेक्त्टोरिस' के कारण दर्द रहता था | सत्संग पूरा होने के बाद कुछ लोग पूज्य बापू के पास एक-एक करके जा रहे थे | मैं कुछ फल-फूल नहीं लाया था इसलिए श्रद्धा के फूल लिये बैठा था | पूज्य बापू कृपा-प्रसाद फेंक रहे थे कि इतने मैं एक चीकू मेरी छाती पर आ लगा और छाती का वह दर्द हमेशा के लिए मिट गया |"
-अरविंदभाई वसावड़ा,
राजकोट
बेटी ने मनौती मानी और गुरुकृपा हुई
"मेरी बेटी को शादी किये आठ साल हो गये थे | पहली बार जब वह गर्भवती हुई तब बच्चा पेट में ही मर गया | दूसरी बार बच्ची जन्मी, पर छः महीने में वह भी चल बसी | फिर मेरी पत्नी ने बेटी से कहा : 'अगर तू संकल्प करे कि जब तीसरी बार प्रसूती होगी तब तुम बालक की जीभ पर बापूजी के बताने के मुताबिक ‘ॐ’ लिखोगी तो तेरा बालक जीवित रहेगा, ऐसा मुझे विश्वास है क्योंकि ॐकार मंत्र में परमानंदस्वरूप प्रभु विराजमान हैं |' मेरी बेटी ने इस प्रकार मनौती मानी और समय पाकर वह गर्भवती हुई | सोनोग्राफ़ी करवायी गयी तो डॉक्टरों ने बताया : 'गर्भ में बच्ची है और उसके दिमाग में पानी भरा हुआ है | वह जिंदा नहीं रह सकेगी | गर्भपात करवा दो | मेरी बेटी ने अपनी माँ से सलाह की | उसकी माँ ने कहा : ' गर्भपात का महापाप नहीं करवाना है | जो होगा, देखा जायेगा | गुरुदेव कृपा करेंगे |' जब प्रसूती हुई तो बिल्कुल प्राकृतिक ढ़ंग से हुई और उस बच्ची की जीभ पर शहद एवं मिश्री से ॐ लिखा गया | आज वह बिल्कुल ठीक है | जब उसकी डॉक्टरी जाँच करवायी गयी तो डॉक्टर आश्चर्य में पड़ गये ! सोनोग्राफ़ी में जो बीमारियाँ दिख रही थीं वे कहाँ चली गयीं ? दिमाग का पानी कहाँ चला गया ? हिन्दुजा हॉस्पिटलवाले यह करिश्मा देखकर दंग रह गये ! अब घर में जब कोई दूसरी कोई कैसेट चलती है तो वह बच्ची इशारा करके कहती है : 'ॐवाली कैसेट चलाओ |' पिछली पूनम को हम मुंबई से 'टाटा सुमो' में आ रहे थे | बाढ़ के पानी के कारण रास्ता बंद था | हम सोच में पड़ गये कि पूनम का नियम टूटेगा | हमने गुरूदेव का स्मरण किया | इतने में हमारे ड्राइवर ने हमसे पूछा :'जाने दूँ ?' हमने भी गुरूदेव का स्मरण करके कहा : 'जाने दो और 'हरि हरि ॐ...' कीर्तन की कैसेट लगा दो |' गाड़ी आगे चली | इतना पानी कि हम जहाँ बैठे थे वहाँ तक पानी आ गया | फिर भी हम गुरुदेव के पास सकुशल पहुँच गये और उनके दर्शन किये|"
-मुरारीलाल अग्रवाल,
सांताक्रूज, मुंबई
और गुरुदेव की कृपा बरसी
"जबसे सूरत आश्रम की स्थापना हुई तबसे मैं गुरुदेव के दर्शन करते आ रहा हूँ, उनकी अमृतवाणी सुनता आ रहा हूँ | मुझे पूज्यश्री से मंत्रदीक्षा भी मिली है | प्रारब्धवश एक दिन मेरे साथ एक भयंकर दुर्घटना घटी | डॉक्टर कहते थे: आपका एक हाथ अब काम नहीं करेगा |' मैं अपना मानसिक जप मनोबल से करता रहा | अब हाथ बिल्कुल ठीक है | उससे मैं ७० कि.ग्रा. वजन उठा सकता हूँ | मेरी समस्या थी कि शादी होने के बाद मुझे कोई संतान नहीं थी | डॉक्टर कहते थे कि संतान नहीं हो सकती | हम लोगों ने गुरुकृपा एवं गुरूमंत्र का सहारा लिया, ध्यानयोग शिविर में आये और गुरुदेव की कृपा बरसी | अब हमारी तीन संताने है: दो पुत्रियाँ और एक पुत्र | गुरूदेव ने ही बड़ी बेटी का नाम गोपी और बेटे का नाम हरिकिशन रखा है | जय हो सदगुरुदेव की..."
-हँसमुख कांतिलाल मोदी,
५७, 'अपना घर' सोसायटी, संदेर रोड़, सूरत
गुरुदेव ने भेजा अक्षयपात्र
"हमें प्रचारयात्रा के दौरान गुरुकृपा का जो अदभुत अनुभव हुआ वह अवर्णनीय है | यात्रा की शुरूआत से पहले दिनांक : ८-११-९९ को हम पूज्य गुरूदेव के आशीर्वाद लेने गये | गुरूदेव ने कार्यक्रम के विषय में पूछा और कहा "पंचेड़ आश्रम (रतलाम) में भंडारा था | उसमें बहुत सामान बच गया है | गाड़ी भेजकर मँगवा लेना... गरीबों में बाँटना | हम झाबुआ जिले के आस-पास के गरीब आदिवासी इलाकों में जानेवाले थे | वहाँ से रतलाम के लिए गाड़ी भेजी | गिनकर सामान भरा गया | दो दिन चले उतना सामान था | एक दिन में दो भंडारे होते थे | अतः चार भंडारे का सामान था | सबने खुल्ले हाथों बर्तन, कपड़े, साड़ियाँ धोती, आदि सामान छः दिनों तक बाँटा फिर भी सामान बचा रहा | सबको आश्चर्य हुआ ! हम लोग सामान फिर से गिनने लगे परंतु गुरूदेव की लीला के विषय में क्या कहें ? केवल दो दिन चले उतना सामान छः दिनों तक खुल्ले हाथों बाँटा, फिर भी अंत में तीन बोरे बर्तन बच गये, मानों गुरूदेव ने अक्षयपात्र भेजा हो ! एक दिन शाम को भंडारा पूरा हुआ तब देखा कि एक पतीला चावल बच गया है | करीब १००-१२५ लोग खा सके उतने चावल थे | हमने सोचा : 'चावल गाँव में बांट देते है |'... परंतु गुरूदेव की लीला देखो ! एक गाँव के बदले पाँच गाँवों में बाँटे फिर भी चावल बचे रहे | आखिर रात्रि में ९ बजे के बाद सेवाधारियों ने थककर गुरूदेव से प्रार्थना की कि 'गुरुदेव ! अब जंगल का विस्तार है... हम पर कृपा करो |'... और चावल खत्म हुए | फिर सेवाधारी निवास पर पहुँचे |"
-संत श्री आसारामजी भक्तमंडल,
कतारगाम, सूरत
स्वप्न में दिये हुए वरदान से पुत्रप्राप्ति
"मेरे ग्रहस्थ जीवन में एक-एक करके तीन कन्याएँ जन्मी | पुत्रप्राप्ति के लिए मेरी धर्मपत्नी ने गुरूदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था | चौथी प्रसूति होने के पहले जब उसने वलसाड़ में सोनोग्राफ़ी करवायी तो रिपोर्ट में लड़की बताया गया | यह सुनकर हम निराश हो गये | एक रात पत्नी को स्वप्न में गुरूदेव ने दर्शन दिये और कहा : 'बेटी चिंता मत कर | घबराना मत धीरज रख | लड़का ही होगा |' हमने सूरत आश्रम में बड़दादा की परिक्रमा करके मनौती मानी थी, वह भी फ़लीभूत हुई और गुरूदेव का ब्रह्मवाक्य भी सत्य साबित हुआ, जब प्रसूति होने पर लड़का हुआ | सभी गुरूदेव की जय-जयकार करने लगे |"
-सुनील कुमार राधेश्याम चौरसिया,
दीपकवाड़ी, किल्ला पारड़ी, जि. वलसाड़
'श्री आसारामायण' के पाठ से जीवनदान
"मेरा दस वर्षीय पुत्र एक रात अचानक बीमार हो गया | साँस भी मुश्किल से ले रहा था | जब उसे हॉस्पिटल में भर्ती किया तब डॉक्टर बोले | 'बच्चा गंभीर हालत में है | ऑपरेशन करना पड़ेगा |' मैं बच्चे को हॉस्पिटल में ही छोड़कर पैसे लेने के लिए घर गया और घर में सभी को कहा : “आप लोग 'श्री आसारामायण' का पाठ शुरू करो |” पाठ होने लगा | थोड़ी देर बाद मैं हॉस्पिटल पहुँचा | वहाँ देखा तो बच्चा हँस-खेल रहा था | यह देख मेरी और घरवालों की खुशी का ठिकाना न रहा ! यह सब बापूजी की असीम कृपा, गुरू-गोविन्द की कृपा और श्री आसारामायण-पाठ का फल है |"
-सुनील चांडक,
अमरावती, महाराष्ट्र
गुरूवाणी पर विश्वास से अवर्णीय लाभ
"शादी होने पर एक पुत्री के बाद सात साल तक कोई संतान नहीं हुई | हमारे मन में पुत्रप्राप्ति की इच्छा थी | १९९९ के शिविर में हम संतानप्राप्ति का आशीर्वाद लेनेवालों की पंक्ति में बैठे | बापूजी आशीर्वाद देने के लिए साधकों के बीच आये तो कुछ साधक नासमझी से कुछ ऐसे प्रश्न कर बैठे, जो उन्हें नहीं करने चाहिए थे | गुरूदेव नाराज होकर यह कहकर चले गये कि 'तुमको संतवाणी पर विश्वास नहीं है तो तुम लोग यहाँ क्यों आये ? तुम्हें डॉक्टर के पास जाना चाहिए था |' फिर गुरूदेव हमारे पास नहीं आये | सभी प्रार्थना करते रहे, पर गुरूदेव व्यासपीठ से बोले : 'दुबारा तीन शिविर भरना |' मैं मन में सोच रहा था कि कुछ साधकों के कारण मुझे आशीर्वाद नहीं मिल पाया परंतु 'वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि...' बाहर से वज्र से भी कठोर दिखने वाले सदगुरू भीतर से फूल से भी कोमल होते हैं | तुरंत गुरूदेव विनोद करते हुए बोले : 'देखो ! ये लोग संतानप्राप्ति का आशीर्वाद लेने आये हैं | कैसे ठनठनपाल-से बैठे हैं ! अब जाओ... झूला-झुनझुना लेकर घर जाओ |' मैंने और मेरी पत्नी ने आपस में विचार किया : 'दयालु गुरूदेव ने आखिर आशीर्वाद दे ही दिया | अब गुरूदेव ने कहा है कि झूला-झुनझुना ले जाओ |' ... तो मैंने गुरूवचन मानकर रेलवे स्टेशन से एक झुनझुना खरीद लिया और ग्वालियर आकर गुरूदेव के चित्र के पास रख दिया | मुझे वहाँ से आने के १५ दिन बाद डॉक्टर द्वारा मालूम हुआ कि पत्नी गर्भवती है | मैंने गुरूदेव को मन-ही-मन प्रणाम किया | इस बीच डॉक्टरों ने सलाह दी कि 'लड़का है या लड़की, इसकी जाँच करा लो |' मैंने बड़े विश्वास से कहा कि 'लड़का ही होगा | अगर लड़की भी हुई तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है | मुझे गर्भपात का पाप अपने सिर पर नहीं लेना है |' नौ माह तक मेरी पत्नी भी स्वस्थ रही | हरिद्वार शिविर में भी हम लोग गये | समय आने पर गुरूदेव द्वारा बताये गये इलाज के मुताबिक गाय के गोबर का रस पत्नी को दिया और दिनांक २७ अक्तूबर १९९९ को एक स्वस्थ बालक का जन्म हुआ |"
-राजेन्द्र कुमार वाजपेयी, अर्चना वाजपेयी,
बलवंत नगर, ढाढीपुर, मुरारा, ग्वालियर
सेवफल के दो टुकड़ों से दो संतानें
"मैंने सन १९९१ में चेटीचंड शिविर, अमदावाद में पूज्य बापूजी से मंत्रदीक्षा ली थी | मेरी शादी के १० वर्ष तक मुखे कोई संतान नहीं हुई | बहुत इलाज करवाये लेकिन सभी डॉक्टरों ने बताया कि बालक होने की कोई संभावना नहीं है | तब मैंने पूज्य बापूजी के पूनम दर्शन का व्रत लिया और बाँसवाड़ा में पूनम दर्शन के लिए गया | पूज्य बापूजी सबको प्रसाद दे रहे थे | मैंने मन में सोचा | 'क्या मैं इतना पापी हूँ कि बापूजी मेरी तरफ देखते तक नहीं ?' इतने में पूज्य बापूजी कि दृष्टि मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे दो मिनट तक देखा | फिर उन्होंने एक सेवफल लेकर मुझ पर फेंका जो मेरे दायें कंधे पर लगकर दो टुकड़ों में बँट गया | घर जाकर मैंने उस सेवफल के दोनों भाग अपनी पत्नी को खिला दिये | पूज्यश्री का कृपापूर्ण प्रसाद खाने से मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी | निरीक्षण कराने पर पता चला कि उसको दो सिर वाला बालक उत्पन्न होगा | डॉक्टरों ने बताया " 'उसका 'सिजेरियन' करना पड़ेगा अन्यथा आपकी पत्नी के बचने की सम्भावना नहीं है | 'सिजेरियन में लगभग बीस हजार रूपयों का खर्च आयेगा |' मैंने पूज्य बापूजी से प्रार्थना की "है बापूजी ! आपने ही फल दिया था | अब आप ही इस संकट का निवारण कीजिये |' फिर मैंने बड़ बादशाह के सामने भी प्रार्थना की : 'जब मैं अस्पताल पहुँचूँ तो मेरी पत्नी की प्रसूती सकुशल हो जाय... |' उसके बाद जब मैं अस्पताल पहूँचा तो मेरी पत्नी एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दे चुकी थी | पूज्यश्री के द्वारा दिये गये फल से मुझे एक की जगह दो संतानों की प्राप्ति हुई |"
-मुकेशभाई सोलंकी,
शारदा मंदिर स्कूल के पीछे,
बावन चाल, वड़ोदरा
साइकिल से गुरूधाम जाने पर खराब टाँग ठीक हो गयी
"मेरी बाँयी टाँग घुटने से उपर पतली हो गयी थी | 'ऑल इणिडया मेडिकल इन्स्टीट्यूट, दिल्ली' में मैं छः दिन तक रहा | वहाँ जाँच के बाद बतलाया गया कि 'तुम्हारी रीढ़ की हड्डी के पास कुछ नसें मर गयी हैं जिससे यह टाँग पतली हो गयी है | यह ठीक तो हो ही नहीं सकती | हम तुम्हें विटामिन 'ई' के कैप्सूल दे रहे हैं | तुम इन्हें खाते रहना | इससे टांग और ज्यादा पतली नहीं होगी |' मैंने एक साल तक कैप्सूल खाये | उसके बाद २२ जून, १९९७ को मुजफ़्फ़रनगर में मैंने गुरूजी से मंत्रदीक्षा ली और दवाई खाना बंद कर दी | जब एक साधक भाई राहुल गुप्ता ने कहा कि सहारनपुर से साइकिल द्वारा उत्तरायण शिविर, अमदावाद जाने का कार्यक्रम बन रहा है, तब मैंने टाँग के बारे में सोचे बिना साइकिल यात्रा में भाग लेने के लिए अपनी सहमति दे दी | जब मेरे घर पर पता चला कि मैंने साइकिल से गुरुधाम, अमदावाद जाने का विचार बनाया है, अतः तुम ११५० कि.मी. तक साइकिल नहीं चला पाओगे |' ... लेकिन मैंने कहा : 'मैं साइकिल से ही गुरुधाम जाऊँगा, चाहे कितनी भी दूरी क्यों न हो ?' ... और हम आठ साधक भाई सहारनपूर से २६ दिसम्बर '९७ को साइकिलों से रवाना हुए | मार्ग में चढ़ाई पर मुझे जब भी कोइ दिक्कत होती तो ऐसा लगता जैसे मेरी साइकिल को कोई पीछे से धकेल रहा है | मैं मुड़कर पीछे देखता तो कोई दिखायी नहीं पड़ता | ९ जनवरी को जब हम अमदावाद गुरूआश्रम में पहूँचे और मैंने सुबह अपनी टाँग देखी तो मैं दंग रह गये ! जो टाँग पतली हो गयी थी और डॉक्टरों ने उसे ठीक होने से मना कर दिया था वह टाँग बिल्कुल ठीक हो गयी थी | इस कृपा को देखकर मैं चकित रह गया ! मेरे साथी भी दंग रह गये ! यह सब गुरूकृपा के प्रसाद का चमत्कार था | मेरे आठों साथी, मेरी पत्नी तथा ऑल इणिडया मेडिकल इन्स्टीट्यूट, दिल्ली द्वारा जाँच के प्रमाणपत्र इस बात के साक्षी हैं |"
-निरंकार अग्रवाल,
विष्णुपुरी, न्यूमाधोनगर, सहारनपुर (उ.प्र.)
अदभुत रही मौनमंदिर की साधना !
"परम पूज्य सदगुरूदेव की कृपा से मुझे दिनांक १८ से २४ मई १९९९ तक अमदावाद आश्रम के मौनमंदिर में साधना करने का सुअवसर मिला | मौनमंदिर में साधना के पाँचवें दिन यानी २२ मई की रात्रि को लगभग २ बजे नींद में ही मुझे एक झटका लगा | लेटे रहने कि स्थिति में ही मुझे महसूस हुआ कि कोई अदृश्य शक्ति मुझे ऊपर... बहुत ऊपर उड़ये ले जा रही है | ऊपर उड़ते हुए जब मैंने नीचे झाँककर देखा तो अपने शरीर को उसी मौनमंदिर में चित्त लेटा हुआ, बेखबर सोता हुआ पाया | ऊपर जहाँ मुझे ले जाया गया वहाँ अलग ही छटा थी... अजीब और अवर्णीय ! आकाश को भी भेदकर मुझे ऐसे स्थान पर पहुँचाया गया था जहाँ चारों तरफ कोहरा-ही-कोहरा था, जैसे, शीशे की छत पर ओस फैली हो ! इतने में देखता हूँ कि एक सभा लगी है, बिना शरीर की, केवल आकृतियों की | जैसे रेखाओं से मनुष्यरूपी आकृतियाँ बनी हों | यह सब क्या चल रहा था... समझ से परे था | कुछ पल के बाद वे आकृतियाँ स्पष्ट होने लगी | देवी-देवताओं के पुंज के मध्य शीर्ष में एक उच्च आसन पर साक्षात बापूजी शंकर भगवान बने हुए कैलास पर्वत पर विराजमान थे और देवी-देवता कतार में हाथ बाँधे खड़े थे | मैं मूक-सा होकर अपलक नेत्रों से उन्हें देखता ही रहा, फिर मंत्रमुग्ध हो उनके चरणों मैं गिर पड़ा | प्रातः के ४ बजे थे | अहा ! मन और शरीर हल्का-फ़ुल्का लग रहा था ! यही स्थिति २४ मई की मध्यरात्रि में भी दोहरायी गयी | दूसरे दिन सुबह पता चला कि आज तो बाहर निकलने का दिन है यानी रविवार २५ मई की सुबह | बाहर निकलने पर भावभरा हृदय, गदगद कंठ और आखों में आँसू ! यों लग रहा था कि जैसे निजधाम से बेघर किया जा रहा हूँ | धन्य है वह भूमि, मौनमंदिर में साधना की वह व्यवस्था, जहां से परम आनंद के सागर में डूबने की कुंजी मिलती है ! जी करता है, भगवान ऐसा अवसर फिर से लायें जिससे कि उसी मौनमंदिर में पुनः आंतरिक आनंद का रसपान कर पाऊँ |"
-इन्द्रनारायण शाह,
१०३, रतनदीप-२, निराला नगर, कानपुर
असाध्य रोग से मुक्ति
"सन १९९४ में मेरी पुत्री हिरल को शरद पूर्णिमा के दिन बुखार आया | डॉक्टरों को दिखाया तो किसीने मलेरिया कहकर दवाइयाँ दी तो किसीने टायफायड कहकर इलाज शुरू किया तो किसीने टायफायड और मलेरिया दोनों कहा | दवाई की एक खुराक लेने से शरीर नीला पड़ गया और सूज गया | शरीर में खून की कमी से उसे छः बोतलें खून चढ़ाया गया | इंजेक्षन देने से पूरे शरीर को लकवा मार गया | पीठ के पीछे शैयाव्रण जैसा हो गया | पीठ और पैर का एक्स-रे लिया गया | पैर पर वजन बाँधकर रखा गया | डॉक्टरों ने उसे वायु का बुखार तथा रक्त का कैंसर बताया और कहा कि उसके हृदय तो वाल्व चौड़ा हो गया है | अब हम हिम्मत हार गये | अब पूज्यश्री के सिवाय और कोई सहारा नहीं था | उस समय हिरल ने कहा :'मम्मी ! मुझे पूज्य बापू के पास ले चलो | वहाँ ठीक हो जाऊगी |' पाँच दिन तक हिरल पूज्यश्री की रट लगाती रही | हम उसे अमदावाद आश्रम में बापू के पास ले गये | बापू ने कहा: 'इसे कुछ नहीं हुआ है |' उन्होंने मुझे और हिरल को मंत्र दिया एवं बड़दादा की प्रदक्षिणा करने को कहा | हमने प्रदक्षिणा की और हिरल पन्द्रह दिन में चलने-फ़िरने लगी | हम बापू की इस करूणा-कृपा का ॠण कैसे चुकायें ! अभी तो हम आश्रम में पूज्यश्री के श्रीचरणों में सपरिवार रहकर धन्य हो रहे हैं |"
-प्रफुल्ल व्यास,
भावनगर
वर्तमान में अमदावाद आश्रम में सपरिवार समर्पित
कैसेट का चमत्कार
"व्यापार उधारी में चले जाने से मैं हताश हो गया था एवं अपनी जिंदगी से तंग आकर आत्महत्या करने की बात सोचने लगा था | मुझे साधु-महात्माओं व समाज के लोगों से घृणा-सी हो गयी थी : धर्म व समाज से मेरा विश्वास उठ चुका था | एक दिन मेरी साली बापूजी के सत्संग कि दो कैसेटें 'विधि का विधान' एवं 'आखिर कब तक ?' ले आयी और उसने मुझे सुनने के लिए कहा | उसके कई प्रयास के बाद भी मैंने वे कैसेटें नहीं सुनीं एवं मन-ही-मन उन्हें 'ढ़ोंग' कहकर कैसेटों के डिब्बे में दाल दिया | मन इतना परेशान था कि रात को नींद आना बंद हो गया था | एक रात फ़िल्मी गाना सुनने का मन हुआ | अँधेरा होने की वजह से कैसेटे पहचान न सका और गलती से बापूजी के सत्संग की कैसेट हाथ में आ गयी | मैंने उसीको सुनना शुरू किया | फिर क्या था ? मेरी आशा बँधने लगी | मन शाँत होने लगा | धीरे-धीरे सारी पीड़ाएँ दूर होती चली गयीं | मेरे जीवन में रोशनी-ही-रोशनी हो गयी | फिर तो मैंने पूज्य बापूजी के सत्संग की कई कैसेटें सुनीं और सबको सुनायीं | तदनंतर मैंने गाजियाबाद में बापूजी से दीक्षा भी ग्रहण की | व्यापार की उधारी भी चुकता हो गयी | बापूजी की कृपा से अब मुझे कोई दुःख नहीं है | हे गुरूदेव ! बस, एक आप ही मेरे होकर रहें और मैं आपका ही होकर रहूँ |"
-ओमप्रकाश बजाज,
दिल्ली रोड़, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
मुझ पर बरसी संत की कृपा
"सन १९९५ के जून माह में मैं अपने लड़के और भतीजे के साथ हरिद्वार ध्यानयोग शिविर में भाग लेने गया | एक दिन जब मैं 'हर की पौड़ी' पर स्नान करने गया तो पानी के तेज बहाव के कारण पैर फिसलने से मेरा लड़का और भतीजा दोनों अपना संतुलन खो बैठे और गंगा में बह गये | ऐसी संकट की घड़ी में मैं अपना होश खो बैठा | क्या करूँ ? मैं फूट-फूटकर रोने लगा और बापूजी से प्रार्थना करने लगा कि ' हे नाथ ! हे गुरुदेव ! रक्षा कीजिये... मेरे बच्चों को बचा लीजिये | अब आपका ही सहारा है | पूज्यश्री ने मेरे सच्चे हृदय से निकली पुकार सुन ली और उसी समय मेरा लड़का मुझे दिखायी दिया | मैंने झपटकर उसको बाहर खींच लिया लेकिन मेरा भतीजा तो पता नहीं कहाँ बह गया ! मैं निरंतर रो रहा था और मन में बार-बार विचार उठ रहा था कि 'बापूजी ! मेरा लड़का बह जाता तो कोई बात नहीं थी लेकिन अपने भाई की अमानत के बिना मैं घर क्या मुँह लेकर जाऊँगा ? बापूजी ! आपही इस भक्त की लाज बचाओ |' तभी गंगाजी की एक तेज लहर उस बच्चे को भी बाहर छोड़ गयी | मैंने लपककर उसे पकड़ लिया | आज भी उस हादसे को स्मरण करता हूँ तो अपने-आपको सँभाल नहीं पाता हूँ और मेरी आँखों से निरंतर प्रेम की अश्रुधारा बहने लगती हैं | धन्य हुआ मैं ऐसे गुरुदेव को पाकर ! ऐसे सदगुरुदेव के श्रीचरणों में मेरे बार-बार शत-शत प्रणाम !"
-सुमालखाँ,
पानीपत, हरियाणा
गुरूकृपा से जीवनदान
"दिनांक १५-१-९६ की घटना है | मैंने धातु के तार पर सूखने के लिए कपड़े फैला रखे थे | बारिश होने के कारण उस तार में करंट आ गया था | मेरा छोटा पुत्र विशाल, जो कि ११ वीं कक्षा में पढ़ता है, आकर उस तार से छू गया और बिजली का करंट लगते ही वह बेहोश हो गया, शव के समान हो गया | हमने उसे तुरंत बड़े अस्पताल में दाखिल करवाया | डॉक्टर ने बच्चे की हालत गंभीर बतायी | ऐसी परिस्थिति देखकर मेरी आँखों से अश्रुधाराएँ बह निकली | मैं निजानंद की मस्ती में मस्त रहने वाले पूज्य सदगुरूदेव को मन-ही-मन याद किया और प्रार्थना कि :'हे गुरुदेव ! अब तो इस बच्चे का जीवन आपके ही हाथों में है | हे मेरे प्रभु ! आप जो चाहे सो कर सकते है |' और आखिर मेरी प्रार्थना सफल हुई | बच्चे में एक नवीन चेतना का संचार हुआ एवं धीरे-धीरे बच्चे के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा | कुछ ही दिनों में वह पूर्णतः स्वस्थ हो गया | डॉक्टर ने तो उपचार किया लेकिन जो जीवनदान उस प्यारे प्रभु की कृपा से, सदगुरूदेव की कृपा से मिला, उसका वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है | बस, ईश्वर से में यही प्रार्थना करता हूँ कि ऐसे ब्रह्मनिष्ठ संत-महापुरुषों के प्रति हमारी श्रद्धा में वृद्धि होती रहे |" -
डॉ. वाय. पी. कालरा,
शामलदास कॉलेज, भावनगर, गुजरात
पूज्य बापू जैसे संत दुनिया को स्वर्ग में बदल सकते हैं
मई १९९८ के अंतिम दिनों में पूज्यश्री के इंदौर प्रवास के दौरान ईरान के विख्यात फ़िजिशियन श्री बबाक अग्रानी भारत में अध्यात्मिक अनुभवों की प्राप्ति आये हुए थे | पूज्यश्री के दर्शन पाकर जब उन्होंने अध्यात्मिक अनुभवों को फलीभूत होते देखा तो वे पंचेड़ आश्रम में आयोजित ध्यानयोग शिविर में भी पहुँच गये | श्री अग्रानी जो दो दिन रुककर वापस लौटने वाले थे, वे पूरे ग्यारह दिन तक पंचेड़ आश्रम में रूके रहे | उन्होंने विधार्थी शिविर में सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा ली एवं विशिष्ट ध्यानयोग साधना शिविर (४ -१० जून १९९८) का भी लाभ लिया | शिविर के दौरान श्री अग्रानी ने पूज्यश्री से मंत्रदीक्षा भी ले ली | पूज्यश्री के सान्निध्य मे संप्राप्त अनुभूतियों के बारे में क्षेत्रिय समाचार पत्र 'चेतना' को दी हुई भेंटवार्ता में श्री अग्रानी कहते है : "यदि पूज्य बापू जैसे संत हर देश में हो जायें तो यह दुनिया स्वर्ग बन सकती है | ऐसे शांति से बैठ पाना हमारे लिए कठिन है, लेकिन जब पूज्य बापूजी जैसे महापुरूषों के श्रीचरणों में बैठकर सत्संग सुनते है तो ऐसा आनंद आता है कि समय का कुछ पता ही नहीं चलता | सचमुच, पूज्य बापू कोई साधारण संत नहीं है |"
-श्री बबाक अग्रानी,
विश्वविख्यात फ़िजिशियन, ईरान
भौतिक युग के अंधकार में ज्ञान की ज्योति : पूज्य बापू
मादक नियंत्रण ब्यूरो भारत सरकार के महानिदेशक श्री एच.पी. कुमार ९ मई को अमदावाद आश्रम में सत्संग-कार्यक्रम के दौरान पूज्य बापू से आशीर्वाद लेने पहुँचे | बड़ी विनम्रता एवं श्रद्धा के साथ उन्होंने पूज्य बापू के प्रति अपने उदगार में कहा : "जिस व्यक्ति के पास विवेक नहीं है वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता है और विवेक को प्राप्त करने का साधन पूज्य आसारामजी बापू जैसे महान संतों का सत्संग है | पूज्य बापू से मेरा प्रथम परिचय टी.वी. के माध्यम से हुआ | तत्पश्चात मुझे आश्रम द्वार प्रकाशित 'ॠषि प्रसाद' मासिक प्राप्त हुआ | उस समय मुझे लगा कि एक ओर जहाँ इस भौतिक युग के अंधकार में मानव भटक रहा है वहीं दूसरी ओर शांति की मंद-मंद सुगंधित वायु भी चल रही है | यह पूज्य बापू के सत्संग का ही प्रभाव है | पूज्यश्री के दर्शन करने का जो सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है इससे मैं अपने को कृतकृत्य मानता हूँ | पूज्य बापू के श्रीमुख से जो अमृत वर्षा होती है तथा इनके सत्संग से करोड़ों हृदयों में जो ज्योति जगती है, व इसी प्रकार से जगती रहे और आने वाले लंबे समय तक पूज्यश्री हम सब का मार्गदर्शन करते रहे यही मेरी कामना है | पूज्य बापू के श्रीचरणों में मेरे प्रणाम..."
-श्री एच.पी. कुमार,
महानिदेशक, मादक नियंत्रण ब्यूरो, भारत सरकार
मुस्लिम महिला को प्राणदान
२७ सितम्बर २००० को जयपुर में मेरे निवास पर पूज्य बापू का 'आत्म-साक्षात्कार दिवस' मनाया गया, जिसमें मेरे पड़ोस की मुस्लिम महिला नाथी बहन के पति, श्री माँगू खाँ, ने भी पूज्य बापू की आरती की और चरणामृत लिया | ३-४ दिन बाद ही वे मुस्लिम दंपति ख्वाजा साहिब के उर्स में अजमेर चले गये | दिनांक ४ अक्टूबर २००० को अजमेर के उर्स में असामाजिक तत्वों ने प्रसाद में जहर बाँट दिया, जिससे उर्स मेले में आये कई दर्शनार्थी अस्वस्थ हो गये और कई मर भी गये | मेरे पड़ोस की नाथी बहन ने भी वह प्रसाद खाया और थोड़ी देर में ही वह बेहोश हो गयी | अजमेर में उसका उपचार किया गया किंतु उसे होश न आया | दूसरे दिन ही उसका पति उसे अपने घर ले आया | कॉलोनी के सभी निवासी उसकी हालत देखकर कह रहे थे कि अब इसका बचना मुश्किल है | मैं भी उसे देखने गया | वह बेहोश पड़ी थी | मैं जोर-जोर से हरि ॐ... हरि ॐ... का उच्चारण किया तो वह थोड़ा हिलने लगी | मुझे प्रेरणा हुई और मैं पुनः घर गया | पूज्य बापू से प्रार्थना की | ३-४ घंटे बाद ही वह महिला ऐसे उठकर खड़ी हो गयी मानों, सोकर उठी हो | उस महिला ने बताया कि मेरे चाचा ससुर पीर हैं और उन्होंने मेरे पति के मुँह से बोलकर बताया कि तुमने २७ सितम्बर २००० को जिनके सत्संग में पानी पिया था, उन्हीं सफेद दाढ़ीवाले बाबा ने तुम्हें बचाया है ! कैसी करूणा है गुरूदेव की !
-जे.एल. पुरोहित,
८७, सुल्तान नगर, जयपुर (राज.)
उस महिला का पता है: -श्रीमती नाथी
पत्नी श्री माँगू खाँ,
१००, सुल्तान नगर,
गुर्जर की धड़ी,
न्यू सांगानेर रोड़,
जयपूर (राज.)
हरिनाम की प्याली ने छुड़ायी शराब की बोतल
सौभाग्यवश, गत २६ दिसम्बर १९९८ को पूज्यश्री के १६ शिष्यों की एक टोली दिल्ली से हमारे गाँव में हरिनाम का प्रचार-प्रसार करने पहूँची | मैं बचपन से ही मदिरापान, धूम्रपान व शिकार करने का शौकीन था | पूज्य बापू के शिष्यों द्वारा हमारे गाँव में जगह-जगह पर तीन दिन तक लगातार हरिनाम का कीर्तन करने से मुझे भी हरिनाम का रंग लगता जा रहा था | उनके जाने के एक दिन के पश्चात शाम के समय रोज की भांति मैंने शराब की बोतल निकाली | जैसे ही बोतल खोलने के लिए ढक्कन घुमाया तो उस ढक्कन के घुमने से मुझे 'हरि ॐ... हरि ॐ' की ध्वनि सुनायी दी | इस प्रकार मैंने दो-तीन बार ढक्कन घुमाया और हर बार मुझे 'हरि ॐ' की ध्वनि सुनायी दी | कुछ देर बाद मैं उठा तथा पूज्यश्री के एक शिष्य के घर गया | उन्होंने थोड़ी देर मुझे पूज्यश्री की अमृतवाणी सुनायी | अमृतवाणी सुनने के बाद मेरा हृदय पुकारने लगा कि इन दुर्व्यसनों को त्याग दूँ | मैंने तुरंत बोतल उठायी तथा जोर-से दूर खेत में फेंक दी | ऐसे समर्थ व परम कृपालु सदगुरुदेव को मैं हृदय से प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा से यह अनोखी घटना मेरे जीवन में घटी, जिससे मेरा जीवन परिवर्तित हुआ |
-मोहन सिंह बिष्ट,
भिख्यासैन, अल्मोड़ा (उ.प्र.)
पूरे गाँव की कायापलट !
पूज्यश्री से दिनांक २७.६.९१ को दीक्षा लेने के बाद मैंने व्यवसनमुक्ति के प्रचार-प्रसार का लक्ष्य बना लिया | मैं एक बार कौशलपुर (जि. शाजापुर) पहुँचा | वहाँ के लोगों के व्यवसनी और लड़ाई-झगड़े युक्त जीवन को देखकर मैंने कहा: "आप लोग मनुष्य-जीवन सही अर्थ ही नहीं समझते हैं | एक बार आप लोग पूज्य बापूजी के दर्शन कर लें तो आपको सही जीवन जीने की कुंजी मिल जायेगी |" गाँव वालों ने मेरी बात मान ली और दस व्यक्ति मेरे गाँव ताजपुर आये | मैंने एक साधक को उनके साथ जन्माष्टमी महोत्सव में सूरत भेजा | पूज्य बापूजी की उन पर कृपा बरसी और सबको गुरूदीक्षा मिल गयी | जब वे लोग अपने गाँव पहुँचे तो सभी गाँववासियों को बड़ा कौतूहल था कि पूज्य बापूजी कैसे हैं ? बापूजी की लीलाएँ सुनकर गाँव के अन्य लोगों में भी पूज्य बापूजी के प्रति श्रद्धा जगी | उन दीक्षित साधकों ने सभी गाँववालों को सुविधानुसार पूज्य बापूजी के अलग-अलग आश्रमों मे भेजकर दीक्षा दिलवा दी | गाँव के सभी व्यक्ति अपने पूरे परिवार सहित दीक्षित हो चुके हैं | प्रत्येक गुरूवार को पूरे गाँव में एक समय भोजन बनता है | सभी लोग गुरूवार का व्रत रखते है | कौशलपुर गाँव के प्रभाव से आस-पास के गाँववाले एवं उनके रिश्तेदारों सहित १००० व्यक्तियों शराब छोड़कर दीक्षा ले ली है | गाँव के इतिहास में तीन-तीन पीढ़ी से कोई मंदिर नहीं था | गाँववालों ने ५ लाख रूपये लगाकर दो मंदिर बनवायें हैं | पूरा गाँव व्यवसनमुक्त एवं भगवतभक्त बन गया है, यह पूज्य बापूजी की कृपा नहीं तो और क्या हैं ? सबके तारणहार पूज्य बापूजी के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम...
-श्याम प्रजापति (सुपरवाइजर, तिलहन संघ) ताजपुर,
उज्जैन (म.प्र.)
पूज्यश्री की तस्वीर से मिली प्रेरणा
सर्वसमर्थ परम पूज्य श्री बापूजी के चरणकमलों में मेरा कोटि-कोटि नमन... १९८४ के भूकंप से सम्पूर्ण उत्तर बिहार में काफी नुकसान हुआ था, जिसकी चपेट में हमारा घर भी था | परिस्थितिवश मुझे नौंवी कक्षा में पढ़ायी छोड़ देनी पड़ी | किसी मित्र की सलाह से मैं नौकरी ढूँढ़ने के लिए दिल्ली गया लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी | मैं दो दिन से  भूखा तो था ही, ऊपर से नौकरी की चिंता | अतः आत्महत्या का विचार करके रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़ा | रानीबाग बाजार में एक दुकान पर पूज्यश्री का सत्साहित्य, कैसेट आदि रखा हुआ था एवं पूज्यश्री की बड़े आकार की तस्वीर भी टँगी थी | पूज्यश्री की हँसमुख एवं आशीर्वाद की मुद्रावाली उस तस्वीर पर मेरी नजर पड़ी तो १० मिनट तक मैं वहीं सड़क पर से ही खड़े-खड़े उसे देखता रहा | उस वक्त न जाने मुझे क्या मिल गया ! मैं काम भले मजदूरी का ही करता हूँ लेकिन तबसे लेकर आज तक मेरे चित्त में बड़ी प्रसन्नता बनी हुई है | न जाने मेरी जिन्दगी की क्या दशा होती अगर पूज्य बापूजी की 'युवाधन सुरक्षा', 'ईश्वर की ओर', 'निश्चिन्त जीवन' पुस्तकें और 'ॠषि प्रसाद' पत्रिका हाथ न लगती ! पूज्यश्री की तस्वीर से मिली प्रेरणा एवं उनके सत्साहित्य ने मेरी डूबती नैया को मानो, मझदार से बचा लिया | धनभागी है साहित्य की सेवा करने वाले ! जिन्होंने मुझे आत्महत्या के पाप से बचाया | 
-महेश शाह,
नारायणपुर, दुमरा, जि. सीतामढ़ी (बिहार)
नेत्रबिंदु का चमत्कार
मेरा सौभाग्य है कि मुझे 'संतकृपा नेत्रबिंदु' (आई ड्रॉप्स) का चमत्कार देखने को मिला | एक संत बाबा शिवरामदास उम्र ८० वर्ष, गीता कुटिर, तपोवन झाड़ी, सप्तसरोवर, हरिद्वार में रहते हैं | उनकी दाहिनी आँख के सफेद मोतिये का ऑपरेशन शाँतिकुंज हरिद्वार आयोजित कैम्प में हुआ | केस बिगड़ गया और काल मोतिया बन गया | दर्द रहने लगा और रोशनी घटने लगी | दोबारा भूमानन्द नेत्र चिकित्सालय में ऑपरेशन हुआ | एब्सल्यूट ग्लूकोमा बताते हुए कहा कि ऑपरेशन से सिरदर्द ठीक हो जायेगा पर रोशनी जाती रहेगी | परंतु अब वे बाबा संत श्री आसारामजी आश्रम द्वार निर्मित 'संतकृपा नेत्रबिंदु' सुबह-शाम डाल रहे हैं | मैंने उनके नेत्रों का परीक्षण किया | उनकी दाहिनी आँख में उँगली गिनने लायक रोशनी वापस आ गयी है | काले मोतिये का प्रेशर नॉर्मल है | कोर्निया में सूजन नहीं है | वे काफी संतुष्ट हैं | वे बताते हैं : 'आँख पहले लाल रहती थी परंतु अब नहीं है | आश्रम के 'नेत्रबिंदु' से कल्पनातीत लाभ हुआ |' बायीं आँख में भी उन्हें सफेद मोतिया बताया गया था और संशय था कि शायद काला मोतिया भी है | पर आज बायीं आँख भी ठीक है और दोनों आँखों का प्रेशर भी नॉर्मल है | सफेद मोतिया नहीं है और रोशनी काफी अच्छी है | यह 'संतकृपा नेत्रबंदु' का विलक्षण प्रभाव देखकर मैं भी अपने मरीजों को इसका उपयोग करने की सलाह दूँगा |
-डॉ. अनन्त कुमार अग्रवाल (नेत्ररोग विशेषज्ञ)
एम.बी.बी.एस., एम.एस. (नेत्र), डी.ओ.एम.एस. (आई),
सीतापुर, सहारनपुर (उ.प्र.)
मंत्र से लाभ
मेरी माँ की हालत अचानक पागल जैसी हो गयी थी मानों, कोई भूत-प्रेत-डाकिनी या आसुरी तत्व उनमें घुस गया | मैं बहुत चिंतित हो गया एवं एक साधिका बहन को फोन किया | उन्होंने भूत-प्रेत भगाने का मंत्र बताया, जिसका वर्णन आश्रम से प्रकाशित 'आरोग्यनिधि' पुस्तक में भी है | वह मंत्र इस प्रकार है:
ॐ नमो भगवते रूरू भैरवाय भूतप्रेत क्षय कुरू कुरू हूं फट स्वाहा |
इस मंत्र का पानी में निहारकर १०८ बार जप किया और वही पानी माँ को पिला दिया | तुरंत ही माँ शांति से सो गयीं | दूसरे दिन भी इस मंत्र की पाँच माला करके माँ को वह जल पिलाया तो माँ बिल्कुल ठीक हो गयीं | हे मेरे साधक भाई-बहनो ! भूत-प्रेत भगाने के लिए 'अला बाँधूँ... बला बाँधूँ... ' ऐसा करके झाड़-फ़ूँक करनेवालों के चक्कर में पड़ने की जरूरत नहीं हैं | इसके लिए तो पूज्य बापूजी का मंत्र ही तारणहार है | पूज्य बापूजी के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
-चंपकभाई एन. पटेल (अमेरिका)
(अनुक्रम) पावन उदगार
काम क्रोध पर विजय पायी
एक दिन 'मुंबई मेल' में टिकट चेकिंग करते हुए मैं वातानुकूलित बोगी में पहुँचा | देखा तो मखमल की गद्दी पर टाट का आसन बिछाकर स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज समाधिस्थ हैं | मुझे आश्चर्य हुआ कि जिन प्रथम श्रेणी की वातानुकूलित बोगियों में राजा-महाराजा यात्रा करते हैं ऐसी बोगी और तीसरी श्रेणी की बोगी के बीच इन संत को कोई भेद नहीं लगता | ऐसी बोगियों में भी वे समाधिस्थ होते है यह देखकर सिर झुक जाता है | मैंने पूज्य महाराजश्री को प्रणाम करके कहा : "आप जैसे संतों के लिए तो सब एक समान है | हर हाल में एकरस रहकर आप मुक्ति का आनंद ले सकते हैं | लेकिन हमारे जैसे ग्रहस्थों को क्या करना चाहिए ताकि हम भी आप जैसी समता बनाये रखकर जीवन जी सकें ?" पूज्य महाराजजी ने कहा : "काम और क्रोध को तू छोड़ दे तो तू भी जीवन्मुक्त हो सकता है | जहाँ राम तहँ नहीं काम, जहाँ काम तहँ नहीं राम | ... और क्रोध तो, भाई ! भस्मासुर है | वह तमाम पुण्य को जलाकर भस्म कर देता है, अंतःकरण को मलिन कर देता है |" मैंने कहा : " प्रभु ! अगर आपकी कृपा होगी तो मैं काम-क्रोध को छोड़ पाऊँगा |" पूज्य महाराजजी ने कहा : "भाई ! कृपा ऐसे थोड़े ही की जाती है ! संतकृपा के साथ तेरा पुरूषार्थ और दृढ़ता भी चाहिए | पहले तू प्रतिज्ञा कर कि तू जीवनपर्यन्त काम और क्रोध से दूर रहेगा... तो मैं तुझे आशीर्वाद दूँ |" मैंने कहा : "महाराजजी मैं जीवनभर के लिए प्रतिज्ञा तो करूँ लेकिन उसका पालन न कर पाऊँ तो झूठा माना जाऊँगा |" पूज्य महाराजजी ने कहा : "अच्छा, पहले तू मेरे समक्ष आठ दिन के लिए प्रतिज्ञा कर | फिर प्रतिज्ञा को एक-एक दिन बढ़ते जाना | इस प्रकार तू उन बलाओं से बच सकेगा | है कबूल ?" मैंने हाथ जोड़कर कबूल किया | पूज्य महाराजजी ने आशीर्वाद देकर दो-चार फूल प्रसाद में दिये | पूज्य महाराजजी ने मेरी जो दो कमजोरियाँ थीं उन पर ही सीधा हमला किया था | मुझे आश्चर्य हुआ कि अन्य कोई भी दुर्गुण छोड़ने का न कहकर इन दो दुर्गुणों के लिए ही उन्होंने प्रतिज्ञा क्यों करवायी ? बाद में मैं इस राज से अवगत हुआ |
दूसरे दिन मैं पैसेन्जर ट्रेन में कानपुर से आगे जा रहा था | सुबह के करीब नौ बजे थे | तीसरी श्रेणी की बोगी में जाकर मैंने यात्रियों के टिकट जाँचने का कार्य शुरू किया | सबसे पहले बर्थ पर सोये हुए एक यात्री के पास जाकर मैंने एक यात्री के पास जाकर मैंने टिकट दिखाने को कहा तो वह गुस्सा होकर मुझे कहने लगा : "अंधा है ? देखता नहीं कि मैं सो गया हूँ ? मुझे नींद से जगाने का तुझे क्या अधिकार है ? यह कोई रीत है टिकट के बारे में पूछने की ? ऐसी ही अक्ल है तेरी ?" ऐसा कुछ-का-कुछ वह बोलता ही गया... बोलता ही गया | मैं भी क्रोधाविष्ट होने लगा किंतु पूज्य महाराजजी के समक्ष ली हुई प्रतिज्ञा मुझे याद थी, अतः क्रोध को ऐसे पी गया मानों, विष की पुड़िया ! मैंने उसे कहा : "महाशय ! आप ठीक ही कहते हैं कि मुझे बोलने की अक्ल नहीं है, भान नहीं है | देखो, मेरे ये बाल धूप में सफेद हो गये हैं | आपमें बोलने की अक्ल अधिक है, नम्रता है तो कृपा करके सिखाओं कि टिकट के लिए मुझे किस प्रकार आपसे पूछना चाहिए | मैं लाचार हूँ कि 'डयूटी' के कारण मुझे टिकट चेक करना पड़ रहा है इसलिए मैं आपको कष्ट दे रहा हूँ|" ... और फ़िर मैंने खूब प्रेम से हाथ जोड़कर विनती की : "भैया ! कृपा करके कष्ट के लिए मुझे क्षमा करो | मुझे अपना टिकट दिखायेंगे ?" मेरी नम्रता देखकर वह लज्जित हो गया एवं तुरंत उठ बैठा | जल्दी-जल्दी नीचे उतरकर मुझसे क्षमा माँगते हुए कहने लगा :"मुझे माफ करना | मैं नींद में था | मैंने आपको पहचाना नहीं था | अब आप अपने मुँह से मुझे कहें कि आपने मुझे माफ़ किया ?" यह देखकर मुझे आनंद और संतोष हुआ | मैं सोचने लगा कि संतों की आज्ञा मानने में कितनी शक्ति और हित निहित है ! संतों की करुणा कैसा चमत्कारिक परिणाम लाती है ! वह व्यक्ति के प्राकृतिक स्वभाव को भी जड़-मूल से बदल सकती है | अन्यथा, मुझमें क्रोध को नियंत्रण में रखने की कोई शक्ति नहीं थी | मैं पूर्णतया असहाय था फिर भी मुझे महाराजजी की कृपा ने ही समर्थ बनाया | ऐसे संतों के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमस्कार !
-श्री रीजुमल,
रिटायर्ड टी.टी. आई., कानपुर
जला हुआ कागज पूर्व रूप में
पूर्व रूप में एक बार परमहंस विशुद्धानंदजी से आनंदमयी माँ की निकटता पानेवाले सुप्रसिद्ध पंडित गोपीनाथ कविराज ने निवेदन किया: "तरणीकान्त ठाकुर को अलौकिक सिद्धि प्राप्त हुई है | वे बिना देखे या बिना छुए ही कागज में लिखी हुई बातें पढ़ लेते हैं |" गुरुदेव बोले :"तुम एक कागज पर कुछ लिखो और उसमें आग लगाकर जला दो |" कविराजजी ने कागज पर कुछ लिखा और पूरी तरह कागज जलाकर हवा में उड़ा दिया | उसके बाद गुरूदेव ने अपने तकिये के नीचे से वही कागज निकालकर कविराजजी के आगे रख दिया | यह देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह कागज वही था एवं जो उन्होंने लिखा था वह भी उस पर उन्हीं के सुलेख में लिखा था और साथ ही उसका उत्तर भी लिखा हुआ देखा |
जड़ता, पशुता और ईश्वरता का मेल हमारा शरीर है | जड़ शरीर को 'मैं-मेरा' मानने की वृत्ति जितनी मिटती है, पाशवी वासनाओं की गुलामी उतनी हटती है और हमारा ईश्वरीय अंश जितना अधिक विकसित होता है उतना ही योग-सामर्थ्य, ईश्वरीय सामर्थ्य प्रकट होता है | भारत के ऐसे कई भक्तों, संतों और योगियों के जीवन में ईश्वरीय सामर्थ्य देखा गया है, अनुभव किया गया है, उसके विषय में सुना गया है | धन्य हैं भारतभूमि में रहनेवाले... भारतीय संस्कृति में श्रद्धा-विश्वास रखनेवाले... अपने ईश्वरीय अंश को जगाने की सेवा-साधना करनेवाले ! स्वामी विशुद्धानंदजी वर्षों की एकांत साधना और वर्षों-वर्षों की गुरुसेवा से अपना देहाध्यास और पाशवी वासनाएँ मिटाकर अपने ईश्वरीय अंश को विकसित करनेवाले भारत के अनेक महापुरूषों में से थे | उनके जीवन की और भी अलौकिक घटनाओं का वर्णन आता है | ऐसे सत्पुरूषों के जीवन-चरित्र और उनके जीवन में घटित घटनाएँ पढ़ने-सुनने से हम लोग भी अपनी जड़ता एवं पशुता से ऊपर उठकर ईश्वरीय अंश को उभारने में उत्साहित होते है | बहुत ऊँचा काम है... बड़ी श्रद्धा, बड़ी समझ, बड़ा धैर्य चाहिए ईश्वरीय सामर्थ्य को पूर्ण रूप से विकसित करने में |
नदी की धारा मुड़ गयी
आद्य शंकराचार्य की माता विशिष्टा देवी अपने कुलदेवता केशव की पूजा करने जाती थीं | वे पहले नदी में स्नान करतीं और फ़िर मंदिर में जाकर पूजन करतीं | एक दिन वे प्रातःकाल ही पूजन-सामग्री लेकर मंदिर की ओर गयीं, किंतु सायंकाल तक घर नहीं लौटीं | शंकराचार्य की आयु अभी सात-आठ वर्ष के मध्य में ही थी | वे ईश्वर के परम भक्त और निष्ठावान थे | सायंकाल तक माता के वापस न लौटने पर आचार्य को बड़ी चिन्ता हुई और वे उन्हें खोजने के लिए निकल पड़े | मंदिर के निकट पहुँचकर उन्होंने माता को मार्ग में ही मूर्च्छित पड़े देखा | उन्होंने बहुत देर तक माता का उपचार किया तब वे होश में आ सकीं | नदी अधिक दूर थी | वहाँ तक पहुँचने में माता को बड़ा कष्ट होता था | आचार्य ने भगवान से मन-ही-मन प्रार्थना की कि "प्रभो ! किसी प्रकार नदी की धारा को मोड़ दो, जिससे कि माता निकट ही स्नान कर सकें |" वे इस प्रकार की प्रार्थना नित्य करने लगे | एक दिन उन्होंने देखा कि नदी की धारा किनारे की धरती को काटती-काटती मुड़ने लगी है तथा कुछ दिनों में ही वह आचार्य शंकर के घर के पास बहने लगी | इस घटना ने आचार्य का अलौकिक शक्तिसम्पन्न होना प्रसिद्ध कर दिया |
सदगुरू-महिमा
गुरु बिनु भव निधि तरै न कोई |
जौं बरंचि संकर सम होई ||
-संत तुलसीदासजी
हरिहर आदिक जगत में पूज्यदेव जो कोय |
सदगुरू की पूजा किये सबकी पूजा होय ||
-निश्चलदासजी महाराज
सहजो कारज संसार को गुरू बिन होत नाँही |
हरि तो गुरू बिन क्या मिले, समझ ले मन माँही ||
-संत कबीरजी संत
सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहार |
संत की निंदा नानका बहुरि बहुरि अवतार ||
-गुरू नानक देवजी
"गुरूसेवा सब भाग्यों की जन्मभूमि है और वह शोकाकुल लोगों को ब्रह्ममय कर देती है | गुरुरूपी सूर्य अविद्यारूपी रात्रि का नाश करता है और ज्ञानाज्ञान रूपी सितारों का लोप करके बुद्धिमानों को आत्मबोध का सुदिन दिखाता है |"
-संत ज्ञानेश्वर महाराज
"सत्य के कंटकमय मार्ग में आपको गुरू के सिवाय और कोई मार्गदर्शन नहीं दे सकता |"
- स्वामी शिवानंद सरस्वती
"कितने ही राजा-महाराजा हो गये और होंगे, सायुज्य मुक्ति कोई नहीं दे सकता | सच्चे राजा-महाराज तो संत ही हैं | जो उनकी शरण जाता है वही सच्चा सुख और सायुज्य मुक्ति पाता है |"
-समर्थ श्री रामदास स्वामी
"मनुष्य चाहे कितना भी जप-तप करे, यम-नियमों का पालन करे परंतु जब तक सदगुरू की कृपादृष्टि नहीं मिलती तब तक सब व्यर्थ है |"
-स्वामी रामतीर्थ
प्लेटो कहते है कि : "सुकरात जैसे गुरू पाकर मैं धन्य हुआ |"
इमर्सन ने अपने गुरू थोरो से जो प्राप्त किया उसके महिमागान में वे भावविभोर हो जाते थे |
श्री रामकृष्ण परमहंस पूर्णता का अनुभव करानेवाले अपने सदगुरूदेव की प्रशंसा करते नहीं अघाते थे |
पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज भी अपने सदगुरूदेव की याद में स्नेह के आँसू बहाकर गदगद कंठ हो जाते थे |
पूज्य बापूजी भी अपने सदगुरूदेव की याद में कैसे हो जाते हैं यह तो देखते ही बनता है | अब हम उनकी याद में कैसे होते हैं यह प्रश्न है | बहिर्मुख निगुरे लोग कुछ भी कहें, साधक को अपने सदगुरू से क्या मिलता है इसे तो साधक ही जानते हैं |
लेडी मार्टिन के सुहाग की रक्षा करने अफगानिस्तान में प्रकटे शिवजी
साधू संग संसार में, दुर्लभ मनुष्य शरीर |
सत्संग सवित तत्व है, त्रिविध ताप की पीर ||
मानव-देह मिलना दुर्लभ है और मिल भी जाय तो आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक ये तीन ताप मनुष्य को तपाते रहते है | किंतु मनुष्य-देह में भी पवित्रता हो, सच्चाई हो, शुद्धता हो और साधु-संग मिल जाय तो ये त्रिविध ताप मिट जाते हैं |
सन १८७९ की बात है | भारत में ब्रिटिश शासन था, उन्हीं दिनों अंग्रेजों ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया | इस युद्ध का संचालन आगर मालवा ब्रिटिश छावनी के लेफ़्टिनेंट कर्नल मार्टिन को सौंपा गया था | कर्नल मार्टिन समय-समय पर युद्ध-क्षेत्र से अपनी पत्नी को कुशलता के समाचार भेजता रहता था | युद्ध लंबा चला और अब तो संदेश आने भी बंद हो गये | लेडी मार्टिन को चिंता सताने लगी कि 'कहीं कुछ अनर्थ न हो गया हो, अफगानी सैनिकों ने मेरे पति को मार न डाला हो | कदाचित पति युद्ध में शहीद हो गये तो मैं जीकर क्या करूँगी ?'-यह सोचकर वह अनेक शंका-कुशंकाओं से घिरी रहती थी | चिन्तातुर बनी वह एक दिन घोड़े पर बैठकर घूमने जा रही थी | मार्ग में किसी मंदिर से आती हुई शंख व मंत्र ध्वनि ने उसे आकर्षित किया | वह एक पेड़ से अपना घोड़ा बाँधकर मंदिर में गयी | बैजनाथ महादेव के इस मंदिर में शिवपूजन में निमग्न पंडितों से उसने पूछा :"आप लोग क्या कर रहे हैं ?" एक व्रद्ध ब्राह्मण ने कहा : " हम भगवान शिव का पूजन कर रहे हैं |" लेडी मार्टिन : 'शिवपूजन की क्या महत्ता है ?' ब्राह्मण :'बेटी ! भगवान शिव तो औढरदानी हैं, भोलेनाथ हैं | अपने भक्तों के संकट-निवारण करने में वे तनिक भी देर नहीं करते हैं | भक्त उनके दरबार में जो भी मनोकामना लेकर के आता है, उसे वे शीघ्र पूरी करते हैं, किंतु बेटी ! तुम बहुत चिन्तित और उदास नजर आ रही हो ! क्या बात है ?" लेडी मार्टिन :" मेरे पतिदेव युद्ध में गये हैं और विगत कई दिनों से उनका कोई समाचार नहीं आया है | वे युद्ध में फँस गये हैं या मारे गये है, कुछ पता नहीं चल रहा | मैं उनकी ओर से बहुत चिन्तित हूँ |" इतना कहते हुए लेडी मार्टिन की आँखे नम हो गयीं | ब्राह्मण : "तुम चिन्ता मत करो, बेटी ! शिवजी का पूजन करो, उनसे प्रार्थना करो, लघुरूद्री करवाओ | भगवान शिव तुम्हारे पति का रक्षण अवश्य करेंगे | "
पंडितों की सलाह पर उसने वहाँ ग्यारह दिन का 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र से लघुरूद्री अनुष्ठान प्रारंभ किया तथा प्रतिदिन भगवान शिव से अपने पति की रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगी कि "हे भगवान शिव ! हे बैजनाथ महादेव ! यदि मेरे पति युद्ध से सकुशल लौट आये तो मैं आपका शिखरबंद मंदिर बनवाऊँगी |" लघुरूद्री की पूर्णाहुति के दिन भागता हुआ एक संदेशवाहक शिवमंदिर में आया और लेडी मार्टिन को एक लिफाफा दिया | उसने घबराते-घबराते वह लिफाफा खोला और पढ़ने लगी |
पत्र में उसके पति ने लिखा था :"हम युद्ध में रत थे और तुम तक संदेश भी भेजते रहे लेकिन आक पठानी सेना ने घेर लिया | ब्रिटिश सेना कट मरती और मैं भी मर जाता | ऐसी विकट परिस्थिति में हम घिर गये थे कि प्राण बचाकर भागना भी अत्याधिक कठिन था | इतने में मैंने देखा कि युद्धभूमि में भारत के कोई एक योगी, जिनकी बड़ी लम्बी जटाएँ हैं, हाथ में तीन नोंकवाला एक हथियार (त्रिशूल) इतनी तीव्र गति से घुम रहा था कि पठान सैनिक उन्हें देखकर भागने लगे | उनकी कृपा से घेरे से हमें निकलकर पठानों पर वार करने का मौका मिल गया और हमारी हार की घड़ियाँ अचानक जीत में बदल गयीं | यह सब भारत के उन बाघाम्बरधारी एवं तीन नोंकवाला हथियार धारण किये हुए (त्रिशूलधारी) योगी के कारण ही सम्भव हुआ | उनके महातेजस्वी व्यक्तित्व के प्रभाव से देखते-ही-देखते अफगानिस्तान की पठानी सेना भाग खड़ी हुई और वे परम योगी मुझे हिम्मत देते हुए कहने लगे | घबराओं नहीं | मैं भगवान शिव हूँ तथा तुम्हारी पत्नी की पूजा से प्रसन्न होकर तुम्हारी रक्षा करने आया हूँ, उसके सुहाग की रक्षा करने आया हूँ |"
पत्र पढ़ते हुए लेडी मार्टिन की आँखों से अविरत अश्रुधारा बहती जा रही थी, उसका हृदय अहोभाव से भर गया और वह भगवान शिव की प्रतिमा के सम्मुख सिर रखकर प्रार्थना करते-करते रो पड़ी | कुछ सप्ताह बाद उसका पति कर्नल मार्टिन आगर छावनी लौटा | पत्नी ने उसे सारी बातें सुनाते हुए कहा : "आपके संदेश के अभाव में मैं चिन्तित हो उठी थी लेकिन ब्राह्मणों की सलाह से शिवपूजा में लग गयी और आपकी रक्षा के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करने लगी | उन दुःखभंजक महादेव ने मेरी प्रार्थना सुनी और आपको सकुशल लौटा दिया |" अब तो पति-पत्नी दोनों ही नियमित रूप से बैजनाथ महादेव के मंदिर में पूजा-अर्चना करने लगे | अपनी पत्नी की इच्छा पर कर्नल मार्टिन मे सन १८८३ में पंद्रह हजार रूपये देकर बैजनाथ महादेव मंदिर का जीर्णोंद्वार करवाया, जिसका शिलालेख आज भी आगर मालवा के इस मंदिर में लगा है | पूरे भारतभर में अंग्रेजों द्वार निर्मित यह एकमात्र हिन्दू मंदिर है |
यूरोप जाने से पूर्व लेडी मार्टिन ने पड़ितों से कहा : "हम अपने घर में भी भगवान शिव का मंदिर बनायेंगे तथा इन दुःख-निवारक देव की आजीवन पूजा करते रहेंगे |"
भगवान शिव में... भगवान कृष्ण में... माँ अम्बा में... आत्मवेत्ता सदगुरू में.. सत्ता तो एक ही है | आवश्यकता है अटल विश्वास की | एकलव्य ने गुरूमूर्ति में विश्वास कर वह प्राप्त कर लिया जो अर्जुन को कठिन लगा | आरूणि, उपमन्यु, ध्रुव, प्रहलाद आदि अन्य सैकड़ों उदारहण हमारे सामने प्रत्यक्ष हैं | आज भी इस प्रकार का सहयोग हजारों भक्तों को, साधकों को भगवान व आत्मवेत्ता सदगुरूओं के द्वारा निरन्तर प्राप्त होता रहता है | आवश्यकता है तो बस, केवल विश्वास की |
सुखपूर्वक प्रसवकारक मंत्र
पहला उपाय
"एं ह्रीं भगवति भगमालिनि चल चल भ्रामय भ्रामय पुष्पं विकासय विकासय स्वाहा |"
इस मंत्र द्वारा अभिमंत्रित दूध गर्भिणी स्त्री को पिलायें तो सुखपूर्वक प्रसव होगा |
दूसरा उपाय
गर्भिणी स्त्री स्वयं प्रसव के समय 'जम्भला-जम्भला' जप करे |
तीसरा उपाय
देशी गाय के गोबर का १२ से १५ मि.ली. रस 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का २१ बार जप करके पीने से भी प्रसव-बाधाएँ दूर होंगी और बिना ऑपरेशन के प्रसव होगा |
प्रसुति के समय अमंगल की आशंका हो तो निम्न मंत्र का जप करें :
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके |
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोSस्तुते ||
(दुर्गासप्तशती)
सर्वांगीण विकास की कुंजियाँ
यादशक्ति बढ़ाने हेतुः प्रतिदिन 15 से 20 मि.ली. तुलसी रस व एक चम्मच च्यवनप्राश का थोड़ा सा घोल बना के सारस्वत्य मंत्र अथवा गुरुमंत्र जप कर पीयें। 40 दिन में चमत्कारिक लाभ होगा।
भोजन के बाद एक लड्डू चबा-चबाकर खायें।
100 ग्राम सौंफ, 100 ग्राम बादाम  200 ग्राम मिश्री तीनों को कूटकर मिला लें। सुबह यह मिश्रण 3 से 5 ग्राम चबा-चबाकर खायें, ऊपर से दूध पी लें। (दूध के साथ भी ले सकते हैं)। इससे भी यादशक्ति बढ़ेगी।
पढ़ा हुआ पाठ याद रहे, इस हेतुः अध्ययन के समय पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके सीधे बैठें।
सारस्वत्य मंत्र का जप करके, फिर जीभ की नोक को तालू में लगाकर पढ़ें।
अध्ययन के बीच-बीच में अंत में शांत हों और पढ़े हुए का मनन करें। ॐ शांति... राम..राम.. या गुरुमंत्र का स्मरण करके शांत हों।
कद बढ़ाने हेतुः प्रातःकाल दौड़ लगायें, पुल-अप्स व ताड़ासन करें तथा 2 काली मिर्च के टुकड़े करके मक्खन में मिलाकर निगल जायें। देशी गाय का दूध कदवृद्धि में विशेष सहायक है।
शरीरपुष्टि हेतुः भोजन के पहले हरड़ चूसें व भोजन के साथ भी खायें।
रात्रि में एक गिलास पानी में एक नींबू निचोड़कर उसमें दो किशमिश भिगो दें। सुबह पानी छानकर पी जायें व किशमिश चबाकर खा लें।
नेत्रज्योति बढ़ाने हेतुः सौंफ व मिश्री 1-1 चम्मच मिलाकर रात को सोते समय खायें। यह प्रयोग नियमित रूप से 5-6 माह तक करें।
नेत्ररोगों से रक्षा हेतुः पैरों के तलुवों व अँगूठों की सरसों के तेल से मालिश करें। ॐ अरुणाय हूँ फट् स्वाहा। इसे जपते हुए आँखें धोने से अर्थात आँखों में धीरे-धीरे पानी छाँटने से आँखों की असह्य पीड़ा मिटती है।
डरावने, बुरे स्वप्नों से बचाव हेतुः ॐ हरये नमः। मंत्र जपते हुए सोयें। सिरहाने आश्रम की निःशुल्क प्रसादी 'ग्रहदोष-बाधा निवारक यंत्र' रख दें।
दुःख मुसीबतें एवं ग्रहबाधा निवारण हेतुः जन्मदिवस के अवसर पर महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करते हुए घी, दूध, शहद और दूर्वा घास के मिश्रण की आहूतियाँ डालते हुए हवन करें। इससे जीवन में दुःख आदि का प्रभाव शांत हो जायेगा व नया उत्साह प्राप्त होगा।
घर में सुख, स्वास्थय व शांति हेतुः रोज प्रातः व सांय देशी गाय के गोबर से बने कण्डे का एक छोटा टुकड़ा जला लें उस पर देशी गौघृत मिश्रित चावल के कुछ दाने डाल दें ताकि वे जल जायें। इससे घर में स्वास्थ्य व शांति बनी रहती है तथा वास्तुदोषों का निवारण होता है।
आध्यात्मिक उन्नति हेतुः चलते फिरते, दैनिक कार्य करते हुए भगवन्नाम का जप, सब में भगवन्नाम, हर दो कार्यों के बीच थोड़ा शांत होना, सबकी भलाई में अपना भला मानना, मन के विचारों पर निगरानी रखना, आदरपूर्वक सत्संग व स्वाध्याय करना आदि शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के उपाय हैं।